
*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल स्टडी के प्रोफेसर रह चुके पुष्पेश पंत की शख्सियत को चंद लफ्जों में बयां करना मुमकिन नहीं है। मेरे इतिहास शिक्षक रहे प्रोफेसर पंत के बारे में कुछ शब्द जो मुझे सुझ रहे हैं — हरफनमौला, बेबाक, यायावर, इल्मी दुनिया के हर फन के गहरे गोताखोर, किस्सागो ऐसे उस्ताद, जिसको पढ़ने और सुनने वालों में हिंदुस्तान के प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, आईएएस के परीक्षार्थियों तथा चुने जाने के बाद ट्रेनिंग के दौरान सुनने वालों, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों और छात्रों से लेकर चटकारे, चस्के लेकर खाने-पीने के शौकीनों, बड़े-बड़े होटलों के शेफ, डाइटिशियन, पाक कला के विशेषज्ञ, घर की गृहिणियाँ— इन सभी को उनको सुनने और पढ़ने की लालसा रहती है। और साथ ही साथ पलंग तोड़ पान की मर्दानगी में रस लेने वालों की रुचि भी बनी रहती है।
आज के विदेश मंत्री एस. जयशंकर जैसे नामी-गिरामी उनके छात्रों की भी एक लंबी फेहरिस्त है। उनके दिमागी कंप्यूटर में इतिहास, दुनिया भर की पाक कला, भारतीय संस्कृति, साहित्य, संगीत, भारत के प्राचीन ऐतिहासिक स्मारकों, किलों, मकबरों, खंडहरों, महलों, गुफाओं, अवशेषों की ऐतिहासिकता, आर्किटेक्चर से लेकर उससे जुड़े पात्रों की गाथाएँ गहराई से दर्ज हैं। न जाने कितनी डॉक्यूमेंटरीज़ में हिंदी और अंग्रेज़ी में उन्होंने आँखों देखे अनुभव पर टिप्पणी करते हुए रहस्य के पर्दे को खोला है। अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे जटिल विषयों से लेकर भारत की पाक कला के इतिहास पर उनके द्वारा लिखी गई किताबें आज भी रोशनी प्रदान कर रही हैं।
प्रोफेसर पंत के अध्यापन की शुरुआत दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज के इतिहास विभाग से हुई थी। मैं भी इतिहास का विद्यार्थी था। सोशलिस्ट तहरीक के एक सक्रिय कार्यकर्ता होने के कारण वह मुझे पहले से ही जानते थे। क्लास में उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, राजनारायण, कमलेश जी के बारे में ज़िक्र किया—मैं रोमांचित हो उठा। इस नई डोर का एक फ़ायदा यह हुआ कि एम.ए. की परीक्षा में साउथ ईस्ट एशिया के पेपर को सप्रू हाउस के पास जेएनयू के अस्थायी निवास में कई दिनों तक उन्होंने मुझे पढ़ाया।
वे जेएनयू चले गए, मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में ही अध्यापक बन गया। जॉर्ज फर्नांडिस ने एक साप्ताहिक पत्र ‘प्रतिपक्ष’ चलाया, जो दिल्ली सोशलिस्ट पार्टी के कार्यालय — सिद्दीकी बिल्डिंग — में संचालित होता था। इसके संपादक प्रमुख कवि तथा संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सचिव श्री कमलेश जी थे। गिरधर राठी, मंगलेश डबराल भी वहाँ कार्यरत थे। कमलेश जी के साथ प्रोफेसर पंत जी की अति निकटता थी, जिसके कारण मिलने का सिलसिला बना रहा।
जेएनयू के बनते समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। उनकी सरकार को कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन प्राप्त था। उन्होंने नूरुल हसन को शिक्षा मंत्री बनाया। नूरुल हसन मार्क्सवादी थे, इसलिए जेएनयू में उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा के प्रोफेसरों की बहुतायत में नियुक्तियाँ करवाईं। प्रोफेसर पंत भी अपनी ज्ञान की घाक पर जेएनयू में प्रोफेसर नियुक्त हो गए।
डॉ. राममनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले, मधु लिमये और राजनारायण जी के प्रशंसक पुष्पेश पंत को परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ दिया कि वह अब इंटरनेशनल रिलेशंस के साथ-साथ भारत की पाक कला के माहिर प्रवक्ता भी बन गए।
किताबों या भाषणों में ज्ञान के कुल्ले करने वाले ऐसे अनोखे विद्वान मिल जाते हैं, जो किसी भी विधा पर अपनी धाक जमा देते हैं, परंतु व्यावहारिक रूप से क-ख भी उन्हें नहीं आता। परंतु पुष्पेश पंत ने एक ऐसी नज़ीर पेश की कि आज तक मैं हैरान हूँ।
वाक़या यूँ है—मैं और वे रमाशंकर सिंह के घर किसी सेमिनार में भाग लेने के कारण ठहरे हुए थे। सुबह के वक्त मैंने अपने लिए चाय तैयार की और उनसे पूछा, ‘गुरुदेव, आपके लिए कैसी चाय बनाऊँ?’ उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम जैसी पीते हो, वैसी ही लाओ।’ मैंने कहा, ‘सर, आप वैसी पीना शायद पसंद नहीं करेंगे।’ उन्होंने दोबारा कहा, ‘नहीं, वही लाओ।’
आयुर्वेद के सारे नुस्खों—काली मिर्च, लौंग, इलायची, दालचीनी, अदरक, कच्ची हल्दी, ऑर्गेनिक टी, नींबू, शहद—के जमाल-घोटे से बनी चाय मैंने बनाकर उन्हें पीने को दी। आधा कप उन्होंने अभी पूरा भी नहीं किया था कि चाय को सूंघते-सूंघते उन्होंने बताना शुरू कर दिया कि इसमें काली मिर्च, लौंग, इलायची, दालचीनी, अदरक, कच्ची हल्दी, ऑर्गेनिक चाय, शहद और नींबू का मिश्रण है।
मैं अवाक, हक्का-बक्का, अचंभे में था कि चाय के सारे द्रव्यों को इन्होंने पहचान लिया। मुझे और कुछ नहीं सूझा—उनके चरण स्पर्श कर कहा, ‘गुरुदेव, ऐसा प्रैक्टिकल मैंने अपने जीवन में इससे पहले नहीं देखा था।’ परंतु वे अभी भी एक पहलू पर अटके हुए थे—अदरक और दालचीनी में थोड़ा असमंजस रहा।





