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प्रजातंत्र बनाम स्वार्थतंत्र स्तंभों में टकराव- गति में ठहराव…?

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ओमप्रकाश मेहता

अगले स्वतंत्रता दिवस पर हमारा प्रजातंत्र बुजुर्गियत के हिसाब से अठहत्तर साल का हो जाएगा, यद्यपि इतने लम्बें जीवनकाल में प्रजातंत्र के कथित संरक्षकों ने इसकी सेहत पर कभी ध्यान नही दिया, ध्यान दिया तो सिर्फ सत्ता और उससे जुड़े स्वार्थ पर, इसी कारण आज हमारा बुजुर्ग प्रजातंत्र कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है और कोई आश्चर्य नही कि यह कब ‘परलोक’ सिधार जाए? इसके अभिकर्ताओं की इसी स्वार्थ प्रवृत्ति के कारण आज इसके स्तंभों में टकराव तथा गति में ठहराव नजर आ रहा है और आज यदि प्रजातंत्र की इस दुर्दशा से कोई चिंतित है तो वह सिर्फ और सिर्फ इस देश की जागरूक और शिक्षित जनता है, उनके जनप्रतिनिधि नहीं, लेकिन इससे जुड़ा सबसे अहम् सवाल यह है कि आखिर यह लापरवाह प्रजातंत्र के रक्षक प्रतिनिधि किसके है

? क्यों ऐसे लोगों को चुनकर इतनी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य समझा गया? और जहां तक इन तथाकथित रक्षकों का सवाल है, इनकी सबसे बड़ी चिंता पांच साल में देश को पूरी तरह लूटकर अपना शेष जीवन ‘सुखद’ बनाने की, चूने जाने के बाद न इन्हें देश या जनसेवा से मतलब न राजनीति या उसके दल से, इनका एक ही लक्ष्य ‘लूट सके सो लूट, बाद में पछताएगा जब कुर्सी जाएगी छूट’ और इसी लक्ष्य की पूर्ति में वे सब कुछ भुला देते है। इन्हें न प्रजातंत्र की चिंता है, न देश की और न इन्हें इस योग्य बनाने वाले वोटर की, इनका एक ही लक्ष्य ‘लूट सके सो लूट’, अब ऐसे में कहां देश और कहां उसका प्रजातंत्र? ….यह तो हुई प्रजातंत्र के कथित ‘पहलुओं’ की बात, अब ऐसे में यदि प्रजातंत्र की परिभाषा की बात करें, तो स्वयं के निर्वस्त्र होने की चिंता सताने लगती है, क्योंकि प्रजातंत्र ‘‘जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा’’ की परिभाषा में फंसा है, जो आज ‘‘नेता का, नेता के लिए, नेता द्वारा’’ बन चुका है।

अब ऐसे में यदि सबसे अधिक जिसे दोषी माना वह ‘प्रजा’ ही है, जो ‘तंत्र’ के साथ जुडी है। अब ऐसी दुरावस्था में यदि प्रजातंत्र के अंग विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका अलग-थलग खड़े कर दिए गए है तो इसके लिए कौन दोषी? और अब जब इन स्तंभों के आधार ‘वोटर’ में दीमक लग चुकी है तो फिर स्तंभों का हश्र किसी से भी छुपा थोड़े ही है। ….और आज के प्रजातंत्र की यही सबसे बड़ी बीमारी है जो उसकी बुजुर्गियत की उम्र कम करने पर आमादा है और इन सब चिंताओं का भार बैचारे जागरूक और बुद्धिजीवी मतदाता को वहन करना पड़ रहा है, अब ऐसे में देश के प्रजातंत्र का भविष्य क्या होगा? यह किसी से भी छिपा नही है….!

Ramswaroop Mantri

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