व्यंग्य – न्याय के सपने
अपुन ऐसा कुछ भी नहीं लिखना चाहता है कि बाद में अपुन को लिखना पड़े-अपुन का स्वास्थ्य खराब है इसलिए अपुन “मेरा कोना-विवेक मेहता” अब चालू नहीं रख सकता। वैसे अपुन यह लिख भी देगा तो अपुन का संपादक अपुन के वक्तव्य को भाव ही नहीं देगा। वह सीधा अपुन को डिलीट मारेगा। रिसाइकल बिन में भी नहीं पड़ा रखेगा। जो-जो मुद्दे खतरनाक हो सकते हैं,अपुन का स्वास्थ्य खराब घोषित करवा सकते हैं अपुन उन पर बात करने के बजाय समझदार, स्वार्थी आदमी की तरह श्वासन लगा लेता है। बाबा से अपुन ने एक यही योग सीखा है। यकीन मानिए इससे ही तबीयत थोड़ी ठीक-ठाक रहती है। आप लोग तो और भी ज्यादा समझदार हैं। गांधी को मानते-न मानते हुए भी उसके तीन बंदरों में से दो को अपनी अंतरात्मा में बसा कर चरित्र में उतारें हुए हो। उनका- ना बुरा देख सकते हो, ना बुरा सुन सकते हो। तीसरी के बारे में अपुन क्या कहें आप समझदार हो।
इन दिनों जलें नोटों के बंडल वाले जज साहब फिर रोशनी में है। नोट जल गए तो जल गए। जलने-जलाने जितने थे इसलिए जल गए। जिन लोगों के यहां तो दो वक्त की रोटी खरीदने के लिए भी नोट नहीं होते उनके यहां क्या खाक जलेंगे! जज पर अभियोग की तैयारी चाहते-ना चाहते चल रही है। अपुन कुछ बोलेगा तो अवमानना का डंडा घूम सकता है। अपुन चुप ही रहेगा।
स्वयंभू भगवान रजनीश बोल गए की अतृप्त इच्छा हो तो उसके सपने दिखते हैं। अपुन साला सोया तो सपने में खुद को टिम्बकटू राज में पाया। और वह भी न्यायालय के बाहर। वहां टेग लाइन लगी थी- “ जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड / न्याय में देरी करना न्याय से इंकार करना हैं ” देखकर मन खुश हो गया। चलो कहीं तो न्याय के प्रति कुछ सम्मान है। अपुन की चाय पीने की इच्छा हुई तो ठेले पर चाय का आर्डर दिया। दो लोग अखबार हाथ में लेकर बात कर रहे थे- “ 20 साल जेल में बिताने के बाद विष्णु बलात्कार के मामले में बा-इज्जत बरी हो गया। ” अपुन चकरा गया। 20 साल की जेल की सजा भुगतने के बाद बरी ! अपुन ने टेग लाइन पर फिर नजर डाली। अपुन का ध्यान उनकी बातों की ओर था। वह बोले- “ सब पैसे का खेल है। पैसा है तो अपराधी फैसले तक जमानत पर और फैसला उसके जीवनकाल तक आएगा ही नहीं। पैसा नहीं है तो अपराधी न भी हो, जमानत भी नहीं होगी। ” जाने क्यों दिमाग में खालिद का नाम चमका और अपुन ने कहना चाहा कि पैसा नहीं पावर भी बहुत खेल दिखाता हैं। पर अनजान देश में चुप रहना ज्यादा अच्छा था। ‘ सो काल्ड ’ राष्ट्रवादी कब अपुन को विदेश में देश का नाम खराब करने के लिए अपराधी ठहरा दे, क्या ठिकाना। उनमें से एक फिर बोला- “ साला मंत्री चुनाव में गड़बड़ी कर 300 वोटो से जीत गया। गड़बड़ी के आरोप में केस चला। हाई कोर्ट में हार गया तो सुप्रीम कोर्ट में चला गया। वहां तारीख पर तारीख पड़ती रही और मंत्री ने कार्यकाल पूरा कर लिया। कुर्सी पर बैठ कर अपने निर्णयों से लोगों का जीवन प्रभावित करता रहा। यह तो न्याय के हाल है! ” अपुन को तसल्ली हुई। जम्बूद्वीप हो या टिम्बकटू हाथी के दांत सभी जगह एक जैसे ही होते हैं। अपुन ने सोचा चलो यहां के न्यायालय की कार्रवाई भी देख ले। यूट्यूब पर लाईव प्रसारण हो रहा था। जज अपनी कुर्सी पर बैठा था। हरे कोटों में वकीलों की भीड़ खड़ी थी। कोर्ट मास्टर पुकार लग रहा था। केस नम्बर 1 से 10, 10 से 20, ऐसे वह 300 से ऊपर तक गया। आश्चर्य के मारे अपुन बोल ही पड़ा- “ एक दिन में इतने केसों की सुनवाई करते है जज यहां! ” पास बैठा व्यक्ति बोला- “ यह सब कोहनी पर गुड चिपकाने के लिए है ताकि कब्र की ओर बढ़ते लोगों को अपना केस जिंदा देख कर जीने की उम्मीद बंधी रहे। ”
अपुन ने देखा ज्यादातर केसो में वकील तो आए ही नहीं। एक दो वकीलों ने बीच में जल्दी सुनवाई का अनुरोध किया तो जज साहब बोले- “ प्रायोरिटी क्या है? ”
“ मिलार्ड 10 साल से केस चल रहा है। सामने वाली पार्टी ने जवाब भी नहीं दिया। ”
“ तो? चलो ठीक है। 2 महीने के बात की तारीख दे दो। ”
एक केस में वकील को उसके मुर्गे ने डंडा लगाया होगा। वकील बोल- “ मिलार्ड, मेरा मुकविल 75 साल का हो गया। ” (वह जो नहीं बोला पर अपुन को लगा वह बोलना चाहता था- जाने कब निकल लें। उसकी न्याय पाने की बड़ी इच्छा है।)
“ तो? इससे पहले के कई केस उससे बड़ी उम्र वालों के हैं। वे भी कतार में हैं। इसका केस पहले लेना न्याय नहीं होगा। ”
अचानक अपुन की श्रीमती जी ने उठा दिया। अपुन खुश था। साला दुख तो तब होता है जब टिम्बकटू में इस तरीके से न्याय नहीं हो रहा होता।





