नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू से डरे मोदी और शाह ऊपर से चाहे जो भी करते और कहते दिख रहे हों लेकिन भीतर से ये काफी डरे हुए हैं। बिहार की जीत में भी इनकी हार दिख रही है और हार गए तो बड़ा खेल पहले ही संभव हो सकता है। इसलिए जिस तरह से एसआईआऱ के जरिये मुस्लिम वोट बैंक को टारगेट किया जा रहा है, चंद्रबाबू को पता है कि अगले चुनाव में मुस्लिमों के टारगेट पर वही चढ़ने वाले हैं और ऐसा हुआ तो बीजेपी के खेल से लड़ना उनके लिए भी मुश्किल ही होगा। ठीक वही मुश्किल जो अभी नीतीश कुमार झेलने को अभिशप्त हो गए हैं।
अखिलेश अखिल
बिहार में चुनावी अभियान जोरों पर है। दो चरणों में होने जा रहे चुनाव की पहली तारीख 6 नवम्बर और दूसरी तारीख 11 नवम्बर को तय की गई है। 14 तारीख को चुनावी परिणाम आने हैं। बड़ी बात तो यह है कि चुनावी परिणाम चाहे जो भी हों लेकिन एक बात तय है कि बिहार के जो परिणाम आएंगे उसका असर केंद्र की सरकार पर पड़ना तय माना जा रहा है। यह असर भी किस तरह का होगा, देखना दिलचस्प हो सकता है।
कहने वाले कह रहे हैं कि अगर एसआईआर के बाद बिहार में फिर से इंडिया गठबंधन की हार हो गई तो सबसे पहले आंध्र प्रदेश की राजनीति में खलबली मचेगी और चंद्रबाबू नायडू सतर्क हो जायेंगे। गैर बीजेपी शासित राज्यों में आंध्र प्रदेश भी है लेकिन बीजेपी की यह कूटनीति है कि वह दो चार विधायकों के साथ नायडू की सरकार में शामिल है और कहती फिर रही है कि आंध्रा में भी एनडीए की सरकार है। लेकिन टीडीपी के लोग ऐसा नहीं मानते।
सच यही है कि टीडीपी वहां अपने बल बूते पर मजबूती से सरकार चलाने के लायक है लेकिन चंद्रबाबू की मज़बूरी यह है कि उन्हें आंध्रा के निर्माण और नयी राजधानी के लिए बहुत ही पैसे की ज़रूरत है। इसी ज़रूरत के लिए वह मोदी सरकार के समर्थन में खड़े हैं और बहुत कुछ सहते भी जा रहे हैं। नायडू को यह पता है कि मौजूदा बीजेपी नेतृत्व भविष्य में उसके साथ क्या कुछ कर सकता है लेकिन चालाक नायडू मोदी और शाह कुछ करें उससे पहले ही आंध्रा का निर्माण कर लेना चाहते हैं ताकि इतिहास उन्हें याद करे कि भारत के विकसित राज्यों में शामिल आंध्रा को गढ़ने का काम चंद्रबाबू ने ही किया था।
अब चंद्रबाबू की नजर बिहार के चुनावी परिणाम पर हैं। अगर इस बार भी बीजेपी और जदयू की जोड़ी कोई कमाल कर जाती है तो चंद्रबाबू झट
से कोई बड़ा निर्णय ले सकते हैं क्योंकि बिहार में एसआईआऱ के बाद के चुनावी परिणाम के असर कई राज्यों में फ़ैल सकते हैं। बीजेपी वाले पहले से ही आंध्र प्रदेश में अपनी एक छोटी इकाई या टूलकिट के रूप में चन्द्रबाबू के ही सहयोगी को खड़ा किये हुए हैं। चंद्रबाबू को यह सब पता है लेकिन राजनीति के धुरंधर चंद्रबाबू समय का इन्तजार कर रहे हैं।
लेकिन यह तो बिहार में एनडीए की जीत की कहानी है। अगर इस कहानी को पलट दिया जाए और यह मान लिया जाए कि इस बार इंडिया गठबंधन के सामने एनडीए टिक नहीं पायेगी और सत्ता से बाहर हो जाएगी तब क्या होगा? अगर राजनीति एक गेम है तो कुछ भी हो सकता है। अगर बिहार चुनाव में इंडिया वालों की जीत होती है तो तय है कि जदयू का खात्मा हो जाएगा। नीतीश कुमार की राजनीति अब ख़त्म हो जाएगी और बड़ी बात कि जदयू कई खंडों में बिखर सकती है। कुछ बड़े नेता बीजेपी के साथ जा सकते हैं तो कुछ राजद के साथ हो सकते हैं। यह भी संभव है कि कुछ लोग जदयू को आगे भी चलाने का दावा कर सकते हैं।
लेकिन बिहार से एनडीए की सरकार जाती है तो इसका बड़ा असर मोदी की कुर्सी और उनकी राजनीति पर पड़ सकती है। यह संभव है कि कुछ कम सीटों के आने के बाद जदयू के लोग इंडिया वालों के साथ जाकर भी सरकार बना लें। ऐसी हालत में मोदी की केंद्र सरकार भले ही गिरे नहीं लेकिन उनकी साख तो खराब होगी ही। उनका इकबाल तो गिरेगा ही और बड़ी बात यह है कि केंद्र की मोदी सरकार काफी कमजोर भी हो जाएगी। ऐसी स्थिति में अगर चंद्रबाबू कोई फैसला लेते हैं तब मोदी सरकार का बचना मुश्किल हो सकता है। इस बात की भी सम्भावना जतायी जा रही है कि महाराष्ट्र की सरकार में शामिल कुछ दल भी कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। अजित पवार आगे क्या करेंगे यह भला कौन जानता है?
जाहिर सी बात है कि बिहार का चुनाव जहां नीतीश कुमार और जदयू का भविष्य तय करने वाला है वहीं मोदी की सरकार के लिए यह सुखद और दुखद भी हो सकता है। यही वजह है कि बीजेपी इस बार बिहार में बड़ी -बड़ी बातें करती फिर रही है। सिर्फ बातें ही नहीं हर तरह के समीकरण को भी भिड़ा रही है और ध्रुवीकरण करने से बाज नहीं आ रही है।
लेकिन इन सबके बीच बिहार के बहुतेरे युवा जो कल तक बीजेपी के साथ अच्छे दिन आएंगे के समर्थन में खड़े हो कर अब तक मोदी के नारे लगा रहे थे अब मोदी और बीजेपी के साथ ही नीतीश के खिलाफ खड़े हो गए हैं। वे खुलकर अब कहने लगे हैं कि बीजेपी वालों और खासकर मोदी और शाह को बिहार से केवल वोट चाहिए ताकि उनकी सत्ता बची रहे और गुजरात में वे औद्योगिक क्रांति कर रहे हैं।
बिहारी युवाओं के ये बोल अब कुछ ज्यादा ही उग्र हो रहे हैं। दरअसल पिछले दिनों बिहार की चुनावी यात्रा पर गए मोदी और शाह ने कई बातों का जिक्र किया है। कई संभावनाओं की चर्चा बिहार के लोगों से की है। कई वादों को फिर से दोहराया है और कई सुविधाएं बिहार को देने की बात कही है। लेकिन कोई भी बात बिहारी युवाओं को पच नहीं रही है। इसी बीच अभी हाल में ही अमित शाह ने एक टीवी इंटरव्यू में यह कह दिया कि अगर हमारी सरकार बिहार में फिर से बनती है तो दस सालों के भीतर बिहार को एआई और आईटी हब बनाया जाएगा। चूंकि यहाँ जमीन की कमी है इसलिए बड़े उद्योग नहीं लगाए जा सकते इसलिए बिहार को एआई हब बनाया जाएगा। शाह के इस बयान से बिहारी युवा कुछ ज्यादा ही बिफर गए हैं और उनके पुराने बयान से लेकर पिछले घोषणा पत्रों के पन्नों को पढ़ने लगे हैं।
बिहार को एआई हब बनाने वाला अमित शाह का बयान अब वायरल हो रहा है। और कई हैरान बिहारियों ने कहा कि यह असल में एक मज़ाक था। दूसरों ने तुरंत बताया कि बीजेपी पिछले 10 सालों से यही वादा कर रही है। 2020 में बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में बिहार को आईटी हब बनाने और राज्य में पांच लाख IT नौकरियां पैदा करने के लिए 2025 की डेडलाइन तय की गई थी। तब से बिहार में एक भी आईटी पार्क नहीं बना है, और राज्य के कई हज़ार इंजीनियरिंग ग्रेजुएट गुरुग्राम, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसी जगहों पर काम कर रहे हैं।
दूसरों ने इस पर रिएक्शन देते हुए कहा है कि बीजेपी की डबल इंजन सरकारों ने राज्य की 37 चीनी मिलों को फिर से खोलने की कोई कोशिश नहीं की है, जो लंबे समय से बंद हैं। दरभंगा में पेपर मिल, जमालपुर में कोच फैक्ट्री और हाजीपुर में रेलवे यार्ड सरकारी मदद के बिना बंद पड़े हैं। बीजेपी के सीनियर नेता रविशंकर प्रसाद ने 2017 में ही घोषणा की थी कि राज्य में जल्द ही एक आईटी पार्क बनेगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ। बिहार में न ही फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री बनी है और न ही कोई आईटी पार्क ही।
यह बिहार के साथ मजाक ही है कि सत्तू खाने की जब बात आती है तो बिहारी का नाम लिया जाता है लेकिन इसकी ब्रांडिंग भी बिहार के पास नहीं है। पॉपुलर सत्तू या पिसा हुआ चना, जो राज्य के लोगों को कई तरह से पेट भरता है, जिसमें लिट्टी में भरने का काम भी शामिल है, तमिलनाडु में प्रोसेस और पैक किया जा रहा है। मखाना या फॉक्स नट्स को पुणे और औरंगाबाद के अलावा दूसरे इंडस्ट्रियल सेंटर्स में रोस्ट, फ्लेवर और पैक किया जाता है। बिहार, जो देश में मक्का और केला दोनों सबसे ज़्यादा उगाने वाले राज्यों में से एक है, इसी तरह इस मौके से चूक गया है, जबकि केरल से केले के चिप्स की देश भर में बाढ़ आ गई है।
राज्य में इंडस्ट्री को खारिज करने वाला होम मिनिस्टर का कुछ हद तक असंवेदनशील बयान ऐसे समय में आया है जब बिहारी तेज़ी से पूछ रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार में वोट क्यों मांग रहे हैं, जबकि हर महीने गुजरात में इंडस्ट्री का उद्घाटन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री बिहार से गुजरात के लिए नई ट्रेनों की घोषणा कर रहे हैं, जबकि गुजरात में बड़े इंडस्ट्रियल और हाई-टेक प्रोजेक्ट्स की घोषणा कर रहे हैं, वे ज़्यादा बार कह रहे हैं।
“उन्होंने पिछले 10 सालों में बिहार के लिए क्या किया है” यह सवाल बीजेपी के प्रवक्ताओं और उम्मीदवारों से ज़्यादा बार पूछा जा रहा है क्योंकि बिहार के चुनावी अभियान का आखिरी दौर चल रहा है। और जब से यह बात सामने आयी है कि अगला कॉमनेवल्थ गेम भी गुजरात में ही होने जा रहा है ,बिहारी युवाओं को मिर्ची लग गयी है। कई सवाल उठने लगे हैं। यह गेम फिर पटना में क्यों नहीं / या देश के बाकी शहरों में क्यों नहीं? महाराष्ट्र में ही क्यों नहीं?
ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू से डरे मोदी और शाह ऊपर से चाहे जो भी करते और कहते दिख रहे हों लेकिन भीतर से ये काफी डरे हुए हैं। बिहार की जीत में भी इनकी हार दिख रही है और हार गए तो बड़ा खेल पहले ही संभव हो सकता है। इसलिए जिस तरह से एसआईआऱ के जरिये मुस्लिम वोट बैंक को टारगेट किया जा रहा है, चंद्रबाबू को पता है कि अगले चुनाव में मुस्लिमों के टारगेट पर वही चढ़ने वाले हैं और ऐसा हुआ तो बीजेपी के खेल से लड़ना उनके लिए भी मुश्किल ही होगा। ठीक वही मुश्किल जो अभी नीतीश कुमार झेलने को अभिशप्त हो गए हैं।





