अग्नि आलोक
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 *व्यंग्य –  घंटा फर्क पड़ता है!*

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 -विवेक मेहता 

                कोई कितनी बार समझाएं। अनपढ़ हो तो फिर भी समझ जाता है। इन पढ़े-लिखे का क्या करें! वे तो समझते ही नहीं। 

               विनम्र रक्षामंत्री राजनाथ जी चीन की हरकतों पर युद्ध के बजाय कड़ी निंदा में विश्वास रखते हैं। वह कह चुके हैं कि- “हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते।” कैलाश जी कहकर हटे ही हैं कि- “फालतू बातें मत करो। इनसे घंटा फर्क पड़ता है।” फिर भी तथाकथित समझदार, कहानीकार, साहित्यकार है कि गुरु घासीराम विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक चक्रवाल के पीछे पड़ गए। उनका इस्तीफा मांग रहे हैं।

          बताते हैं कि चक्रवाल साहब गुजरात से लेक्चर, प्रोफेसर के रास्ते चरण वंदना कर, रीढ़ की हड्डी बेचकर, जेब हल्की कर इस पद तक पहुंचे। पढ़ाते वक्त हर बार विषय की तैयारी तो होती नहीं, इसलिए इधर-उधर की बातें करना पड़ती है। और जो तैयारी कर विषय पर बात करते हैं वह इतनी ऊंचाई तक पहुंच ही नहीं सकते। क्योंकि उन पामर लोगों के पास चरण वंदना का समय होता ही नहीं। रीढ़ की हड्डी तनी होती है तो ऊंचाई कैसे छुएंगे! पैसे खर्च होते नहीं और प्रतीक,बिंब, चरित्र चित्रण, विसंगति, संत्रास, कुंठाओं के जाल में उलझे रहते हैं। इन सबको पचा नहीं पाते तो कहानी कविता या व्यंग्य के रूप में उल्टी कर देते हैं। वह जमाना गया जब साहित्य और साहित्यकारों का महत्व था। अब तो हर कोई कंटेंट राइटर है। चटपटी, मसालेदार सामग्री उसके पास तैयार रहती। नहीं हो तो वल्गर होने में कहा समय लगता। किस्मत और भगवान ने साथ दिया तो वायरल भी हो जाते हैं। ऐसे समकालीन समय में गम्भीर, विचारणीय लेखन का क्या औचित्य!

            वैसे भी हमारे यहां मास्टरी का धंधा बहुत पॉप्युलर है। ट्यूशन, खेती, शेयरमार्केट, नेतागिरी के बीच समय निकालकर लोग मास्टरी भी कर लेते हैं। अब जब समय निकालना हो और समय न निकले तो बिना तैयारी के ही लेक्चर देना होते हैं। लेक्चर यानी वह भाषण जिसे सुनने वाला जानता है कि सामने वाला नहीं समझ रहा और सामने वाला जानता है की यह जाने क्या बोल रहा है। फिर भी दोनों एक दूसरे की कमजोरी जानते हुए भी अनुशासन बनाए रखते हैं। 

           नेहरू की गलतियों का समाज को खामियाजा अभी भी भूगतना पड़ता है। इस कारण साहित्य और साहित्यकारों को मजबूरी में महत्व देना पड़ता है। साहित्य अकादमी के और गुरु घासीराम विश्वविद्यालय के संयुक्त कार्यक्रम- “समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ” के सेमिनार में अपने गुरु की चमचागिरी और कविता की खिल्ली उड़ाते हुए आलोक जी ने देखा कि उनके कक्ष में एक विद्यार्थी बेचैन सा बैठा है। विद्यालय उनका, पैसा विश्वविद्यालय का और वे वहां के राजा। अपनी बातों के प्रति अवहेलना कोई कुलपति कैसे सहन कर सकता है! कुलपति जी ने उनसे पूछा- “भाई साहब, आप बोर तो नहीं हो रहे ना।” 

       भाई साहब आमंत्रित कहानीकार थे साहित्य अकादमी और विश्वविद्यालय द्वारा। अपनी रचनाओं द्वारा समस्या, चीजों को सामने रखकर जनता को विचारशील बनाना चाहते थे। चमचे और अंधभक्त शिष्य तो थे नहीं। बोल दिए- “आप विषय पर आइये ना।” 

      अपने शिष्यों के बीच खुद के ज्ञान की इस तरह बखिया उघाड़े जाना यानी अपने राज्य में, अपनी सभा में, अपना ही चीरहरण होते देखना कौन पसंद करेगा? रूपडा जी तो आज है कल चले जाएंगे। राज्य में राजा को तो हमेशा रहना है। गोष्ठी के विषय- समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ के बारे में भी बताना था। तो विद्यार्थियों के सामने इससे अच्छा प्रैक्टिकल अप्रोच क्या हो सकता था। थ्योरी से विद्यार्थी इतनी जल्दी नहीं समझते जितनी जल्दी प्रैक्टिकल से ज़िन्दगी के बदलते संदर्भ समझाएं जा सकते थे। बदलते समय में सत्ता के नशे और कुर्सी के दंभ को समझाया जा सकता था। उन्होंने वही अपनाया। अपने शिष्यों के सामने आमंत्रित अतिथि से बोले- “यहां आपका स्वागत नहीं है। आप उठिए और बाहर निकलिए।” 

         अब इस बदलते जीवन संदर्भ की कहानी पर साहित्य, साहित्यकारों के अपमान का मुद्दा बना कर लोग इस्तीफा मांग रहे हैं। जब समाज को फर्क नहीं पड़ता तो सत्ता को घंटा फर्क पड़ेगा।

Ramswaroop Mantri

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