झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, जिन्हें दिशोम गुरु के नाम से भी जाना जाता है, अपने संघर्षपूर्ण जीवन और आदिवासियों के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पैदल चलकर और जंगलों में रातें बिताकर लोगों से जुड़ाव स्थापित किया।
रांचीः झारखंड के पूर्व मुख्यमत्री और दिशोम गुरु शिबू सोरेन को जानने वाले लोग याद करते हैं कि वे दिन भर पैदल चलते थे और रातें जंगलों और पहाड़ों में बिताते थे। वे बिना रुके पुरानी एंबेसडर कार या जीप में 600 किलोमीटर की यात्रा भी कर सकते थे। जेएमएम में विभाजन के बावजूद, वे बाद के चुनावों में पार्टी को सत्ता में वापस लाने में कामयाब रहे हैं।
एक झलक पाने के लिए 20-30 किमी पैदल चलकर सभाओं में पहुंचते थे लोग
आदिवासी इलाकों में लोग शिबू सोरेन की एक झलक पाने, उन्हें छूने के लिए 20-30 किलोमीटर पैदल चलकर सभाओं में पहुंचते देखे गए हैं। आदिवासियों के बीच शिबू सोरेन के लिए प्यार बहुत गहरा है। 1990 के दशक में हुए एक चुनावी कार्यक्रम को याद करते हुए जेएमएम विनोद पांडेय कहते हैं, “शिबू सोरेन दुमका के एक सुदूर गांव में चुनावी सभा को संबोधित करने गए थे। इस दौरान एक-एक करके कई महिलाएं गुरुजी के सामने आतीं, उन्हें कुछ देतीं और चली जातीं। गुरुजी उनका प्रसाद लेते और अपने कुर्ते की जेब में रखते जाते। बाद में मैंने उनसे पूछा, ‘बाबा, वे महिलाएं आपको क्या दे रही थीं?’ उन्होंने अपनी जेब से पैसे निकाले- दो पांच रुपये के नोट और कुछ सिक्के। उन्होंने कहा कि आदिवासी महिलाओं ने उन्हें यह सोचकर पैसे दिए थे कि वे इतनी दूर से आए हैं, अब घर कैसे लौटेंगे।
बेटे शिबू को राशन पहुंचाने निकले पिता को घात लगाकर मारा गया
हेमंत के दादा सोबरन मांझी गोला प्रखंड के नेमरा इलाके के गिने-चुने पढ़े लिखे युवाओं में से एक और पेशे से शिक्षक थे। उनका राजनीति में भी दखल था, लेकिन महाजनों- सूदखोरों से उनकी नहीं पटती थी। उस दौर में शोषण का एक आम तरीका यह था कि महाजन जरूरत पड़ने पर सूद पर धान देते और फसल कटने पर डेढ़ गुना वसूलते। इसे ना चुकाने पर से खेत नाम करवा लेते और उसी से उस जमीन पर बेगार करवाते। एक बार उन्होंने एक महाजन को सरेआम पीटा भी था और इसलिए वे उनकी आंख की किरकिरी बन गए। उन दिनों शिबू गोला के एक स्कूल में पढ़ते थे और वहीं होस्टल में अपने भाई राजाराम के साथ रहते थे। 27 नवंबर 1957 को शोबरन शिबू के लिए राशन पहुंचाने जा रहे थे, तभी घात लगाकर जंगल में उनकी हत्या कर दी गई।
मां सोनामणि ने बच्चों को अपने बलबूते पाला
शिबू की मां सोनामणि जीवट महिला थी। उन्होंने बहुत दिनों तक अपराधियों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटे और बच्चों को अपने बलबूते पाला। कोर्ट की तारीखों पर वे बच्चों को लेकर जाया करती थीं। एक दिन इस संकल्प के साथ लौटीं कि अपने पिता के हत्यारों के साथ उनके बच्चे ही इंसाफ करेंगे। शिबू ने भी उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया। लकड़ी बेचकर परिवार पाला। महाजन प्रथा के खिलाफ ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया।
शिबू सोरेन समर्थकों के साथ साइकिल से प्रचार करते
संतालों ने उन्हें दिशोम गुरु यानी ‘दसों दिशाओं का गुरु’ नाम दिया। तभी से शिबू गुरुजी के नाम से पहचाने जाने लगे। शिबू ने 4 फरवरी 1973 को झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया और अलग राज्य के लिए संघर्ष किया। 1980 में जब पहली बार शिबू सांसद का चुनाव लड़े। तब वे और उनके समर्थक साइकिल पर झोले में लाल मिट्टी और नील रखकर गांव-गांव प्रचार करते और दीवारों पर आदिवासी एकता और समर्थन के नारे लिखते थे। 2000 में झारखंड अस्तित्व में आया तो शिबू का कद बढ़ गया। शिबू राज्य के पहले नेता हैं, जो खुद सीएम बने और बेटे हेमंत को इस पद तक पहुंचाया।





