अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*समाजवादी नेता राज नारायण : जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए  कभी कोई समझौता किया ही नहीं*

Share

धर्मेन्द्र श्रीवास्तव, शहडोल 

जेल गए 80 बार |  जेल में बिताए कुल 17 साल , जिसमें तीन साल आजादी से पहले और 14 साल आजादी के बाद | वही शख्स , जिससे लौह महिला इंदिरा गांधी बुरी तरह डर गईं थीं | इतनी आतंकित हो गईं कि इमरजेंसी लगा दी | वो राजनारायण थे | वो ऐसी शख्सियत भी हैं , जिसके कारण केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकारें बननीं शुरू हुई | 

आजाद भारत में समता, बंधुत्व, और सदभाव की खातिर कम लोगों ने जीवन में इतनी प्रताड़ना सही होगी |  जो राजनीति के फक्कड़ नेता थे |  वह राममनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थे |  हर किसी के लिए उपलब्ध और हर किसी के मददगार |

60 के दशक के खत्म होते होते इंदिरा मजबूत प्रधानमंत्री बन चुकी थीं | कांग्रेस के ताकतवर नेता उनके सामने पानी मांग रहे थे | विपक्ष बहुत कमजोर स्थिति में था | ऐसे में जब इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 में दोबारा चुनाव जीतकर आईं तो किसी बड़े नेता में उनसे टकराने की हिम्मत नहीं थी | 

ऐसे में राजनारायण ना केवल उनसे भिड़े बल्कि विपक्ष को एक करने की जमीन भी बनाई | अगर वह इंदिरा को मुकदमे में टक्कर नहीं देते तो ना जयप्रकाश नारायण संपूर्ण क्रांति का आंदोलन कर पाते , ना आपातकाल लगता और ना ही 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ता |

राजनारायण का जन्म बनारस के उस जमींदार परिवार में हुआ था , जो वहां के राजघराने से जुड़ा हुआ था |  बहुतायत में जमीनें थीं | लंबी चौड़ी खेती | रसूख और रूतबा |  वह अलग मिट्टी के बने थे | 

समाजवाद में तपे और ढले हुए | उन्होंने अपने हिस्से की 950 बीघे जमीन गरीबों को दे दी | उनके खुद के परिवार में बहुत विरोध हुआ | भाइयों ने बुरा माना |  वह टस से मस नहींं हुए | यहां तक कि अपने बेटों के लिए कोई संपत्ति नहीं छोड़ी | 

        समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ लड़ाई हर जगह लड़ी | संसद में और सड़क पर भी | चुनाव के मैदान में और अदालत में भी | कोई मोर्चा छोड़ा नहीं | 1969 में जिन समाजवादियों को लगता था कि इंदिरा सही काम कर रही हैं , उनका मोहभंग हो चुका था | 1971 के चुनावों में रायबरेली से इंदिरा के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार खड़ा किया जाना था | कोई तैयार नहीं था | न चंद्रभानु गुप्ता तैयार हुए और न चंद्रशेखर की हिम्मत हुई |  न किसी अन्य दिग्गज नेता की |  ऐसे में राजनारायण संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार बने | 

राजनारायण 1971 का चुनाव हार गए | चुनाव जीतीं इंदिरा गांधी |  राजनारायण ने चुनाव जीतने के लिए इंदिरा जी के सारे गलत हथकंडों पर नजर रखी | उसे संवैधानिक और असंवैधानिक रूप दिया |  उनके एक–एक भ्रष्टाचार को गिनते रहे |  चुनाव खत्म होते ही न्यायालय पहुंचे | उन्होंने सात आरोप लगाए | मुकदमा शुरू हुआ |  लंबा चला | एक समय ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी को खुद अदालत में हाजिर होना पड़ा |  सफाई देनी पड़ी |  उनसे छह घंटे तक पूछताछ हुई | 

आखिरकार पांच साल बाद फैसला आया | इंदिरा गांधी ने उस दौरान जजों को भयभीत कर रखा था |  इसके बाद भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा के प्रभाव की कोई परवाह नहीं की | खुफिया ब्यूरो (आइबी) के एक अफसर को इलाहाबाद में इस काम में लगाया गया था कि वह बता सके कि फैसला क्या आने वाला है  |जज ने टाइपिस्ट को घर बुलाया |  फैसला लिखवाया | उसे तभी जाने दिया , जब फैसला सुना दिया गया | उन्होंने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित कर दिया | उन पर छह सालों तक चुनाव लड़ने पर रोक लग गई |  पुपुल जयकर ने इंदिरा की जीवनी में लिखा कि इंदिरा को आशंका थी कि फैसला उनके खिलाफ आ सकता है |  12 जून 1975 को फैसला आया |  इसके 14वें दिन इंदिरा ने देशभर में आपातकाल लगा दिया | 

आपातकाल लगने के कुछ ही घंटों के अंदर सबसे पहले राजनारायण को गिरफ्तार कर लिया गया |  उसी दिन जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और अटलबिहारी वाजपेयी की गिरफ्तारी हुई |  देशभर में हजारों लोग जेलों में डाले गए | यकीनन राजनारायण वो शख्स थे , जिन्होंने इंदिरा को बुरी तरह आतंकित कर दिया था कि उन्हें ये कदम उठाना पड़ा |  लेकिन इसने विपक्ष को साथ आने का मौका दिया | 

वर्ष 1977 में पहली बार केंद्र में कांग्रेस के अलावा दूसरी पार्टी सत्तारुढ़ हुई | बेशक जनता पार्टी की सरकार अपने अंतरविरोधों की वजह से जल्दी ढह गई लेकिन देश में गैरकांग्रेसी आंदोलन को नई ऑक्सीजन मिली |  1977 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाकर चुनाव कराया तो रायबरेली सीट पर उनके खिलाफ फिर एकबार राजनारायण सामने थे |  इस बार उन्होंने इंदिरा गांधीको बुरी शिकस्त दी | अपने पूरे राजनीतिक करियर में इंदिरा ने सही मायनों में एक ही शख्स से शिकस्त पाई |  वो राजनारायण थे | 

        ताजिंदगी राज नारायण जी समाजवादी नेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया के करीबी रहे | उनके प्रिय पात्र |  ‘राम मनोहर लोहिया   जी अक्सर कहते थे जब तक राजनारायण जिंदा हैं , देश में लोकतंत्र मर नहीं सकता | 

       राजनारायण जी ने काशी विश्वनाथ मंदिर का दरवाजा दलितों के लिए खुलवाया |  काशी में उनका विरोध भी हुआ, मगर वह टस से मस ना हुए । वह जो ठान लेते थे ,पूरा करके दम लेते थे |   उनकी अगुवाई में बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों औऱ अनुसूचित जाति के प्रवेश के लिए आंदोलन हुआ | विरोधियों को झुकना पड़ा और दलितों का काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश हुआ उनके दरवाजे हमेशा जरूरतमंदों के लिए खुले होते थे |

      राज नारायण जी दिल्ली में जब रहते थे तो कोई खाली हाथ नहीं लौटता था | किसी के पास किराया नहीं होता था तो किसी के पास भोजन-हर किसी की वह मदद करते थे |  उनका जीवन हमेशा सादगी से भरा रहा | साधारण कपड़ा पहनते थे |  जीवन में कोई लग्जरी नहीं थी |  हां, बस वह खाने के शौकीन थे |  उनके पास जो भी पैसा आता था, वो जरूरतमंदों में बंट जाता था | कभी अपने लिए एक पैसा नहीं जुटाया | 

          लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता किया ही नहीं |  राजनारायण फकीर की भांति दुनिया से विदा हुए | 31 दिसंबर 1986 को उनका निधन हो गया |  न मकान, न जमीन, न बैंक–बैलेंस | मुझे फक्र है कि वह शहडोल हमारे घर पर आए थे मेरी मां ने उनका घर पर स्वागत किया अब यादें ही हमारी स्मृति में रह गई है उनको शत-शत नमन🙏🙏🌹

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें