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*आरएसएस के 100 वर्ष:गांधी बनाम आर एस एस*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

 

          2 अक्टूबर भारतीय इतिहास और समाज के लिए एक गहरे प्रतीक का दिन है। यह वह दिन है जब पूरी दुनिया महात्मा गांधी को याद करती है—अहिंसा, सत्य और करुणा के प्रतीक। लेकिन वर्ष 2025 में यह दिन एक और दृष्टि से ऐतिहासिक होगा। इस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करेगा। संयोग यह है कि 2 अक्टूबर को दशहरा भी होगा, जब आरएसएस पारंपरिक रूप से “शस्त्र पूजा” करता है और अपने संगठन की शक्ति का प्रदर्शन करता है।

          गांधी के देश में एक ऐसा संगठन 100 वर्ष पूरे कर रहा है, जिसकी वैचारिकी को लेकर सबसे अधिक विवाद है। कोई इसे “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” का प्रतिनिधि मानता है, तो कोई “फासीवादी प्रवृत्ति” का प्रतीक। कुछ आलोचक इसे “आतंकवादी संगठन” तक कह देते हैं, जबकि इसके समर्थक इसे “राष्ट्रनिर्माण” का आधार मानते हैं। सवाल यह है कि 1925 से 2025 तक का यह सफर भारतीय लोकतंत्र और समाज के लिए क्या मायने रखता है? क्या यह 100 साल गर्व का विषय हैं, या फिर चिंतन और आत्ममंथन का अवसर?

इस लेख में आरएसएस के इतिहास, विचारधारा, संगठनात्मक विस्तार, विवाद, आलोचना और भविष्य की दिशा पर विचार किया जा रहा है, ताकि 100 साल के इस पड़ाव को एक संतुलित नज़रिए से समझा जा सके।

 

आरएसएस की स्थापना और 100 साल का पड़ाव:

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। संगठन का घोषित उद्देश्य था हिंदू समाज को एकजुट और संगठित करना। शुरुआती दौर में शाखा प्रणाली, शारीरिक प्रशिक्षण और अनुशासन पर ज़ोर दिया गया। 2025 में आरएसएस अपने 100 वर्ष पूरे करेगा।       इस दौरान यह संगठन न केवल सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी अत्यधिक प्रभावशाली हुआ। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा भारतीय जनसंघ की स्थापना और बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गठन आरएसएस के वैचारिक प्रभाव से ही हुआ। आज भाजपा सत्ता में है और आरएसएस का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।

 

आरएसएस की स्थापना और विचारधारा:

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की। हेडगेवार का मानना था कि भारतीय समाज का सबसे बड़ा संकट उसकी “विभाजित मानसिकता” और “कमज़ोर संगठन” है। उनका तर्क था कि जब तक हिंदू समाज एकजुट नहीं होगा, तब तक विदेशी ताक़तें और आंतरिक मतभेद भारत को कमज़ोर करते रहेंगे।

आरएसएस का मूल मंत्र था—“संघटन शक्ति के बिना राष्ट्र निर्माण असंभव है।” इसके लिए उन्होंने शाखा पद्धति शुरू की, जहाँ युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण, व्यायाम, खेल और राष्ट्रभक्ति के संस्कार दिए जाते थे। धीरे-धीरे यह शाखाएँ केवल शारीरिक प्रशिक्षण तक सीमित न रहकर वैचारिक चर्चा और अनुशासन का केंद्र भी बन गईं।

          संघ का घोषित लक्ष्य था—“हिंदू राष्ट्र” का निर्माण। हालांकि “हिंदू राष्ट्र” की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही, लेकिन उसका आधार हमेशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद रहा, जिसमें भारत की पहचान हिंदू सभ्यता से जोड़कर देखी जाती है। आलोचक कहते हैं कि यह परिभाषा बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष भारत की अवधारणा से टकराती है।

स्वतंत्रता संग्राम और गांधी के साथ टकराव:

          आरएसएस की स्थापना उस समय हुई जब स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम की ओर बढ़ रहा था। कांग्रेस के नेतृत्व में गांधीजी का अहिंसक आंदोलन देशभर में जनता को जोड़ रहा था। लेकिन आरएसएस ने प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया। हेडगेवार स्वयं कांग्रेस से जुड़े रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने संगठन को स्वतंत्र रूप से चलाने का निर्णय लिया। आरएसएस का मानना था कि स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस केवल “राजनीतिक स्वतंत्रता” पर ज़ोर दे रही है, जबकि सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की अनदेखी कर रही है।  यहीं से गांधी और आरएसएस की राहें अलग हो गईं। गांधीजी का दर्शन था—“अहिंसा, सत्य और सभी धर्मों का सम्मान।” जबकि आरएसएस एक “हिंदू राष्ट्र” की परिकल्पना पर ज़ोर देता रहा। आलोचकों का कहना है कि यही वैचारिक दूरी बाद में दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास में बदल गई।

गांधी और आरएसएस: ऐतिहासिक टकराव:

          महात्मा गांधी की हत्या (30 जनवरी 1948) के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी आरएसएस की गतिविधियों पर सवाल उठाए थे। हालांकि बाद में अदालत और जांच प्रक्रियाओं के बाद 1949 में प्रतिबंध हटा लिया गया, लेकिन इस घटना ने आरएसएस की छवि पर गहरा असर डाला। आरएसएस यह दावा करता है कि वह गांधीजी के विचारों का सम्मान करता है, पर आलोचक मानते हैं कि उसकी वैचारिकी गांधी की समावेशी और बहुलतावादी सोच के विपरीत है।

 

गांधी की हत्या, प्रतिबंध और पुनर्जीवन:                                                                      

        30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी। गोडसे आरएसएस से जुड़े रहे थे, हालांकि बाद में उन्होंने हिंदू महासभा में सक्रियता दिखाई। इस हत्या के बाद आरएसएस पर संदेह की उंगली उठी। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया और पत्रों में स्पष्ट कहा कि यह संगठन सांप्रदायिक वातावरण को भड़काता है। हालांकि 1949 में जब आरएसएस ने संविधान के प्रति निष्ठा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करने की लिखित आश्वासन दिया, तब उस पर से प्रतिबंध हटा लिया गया।

यह घटना आरएसएस के इतिहास की निर्णायक मोड़ थी। एक ओर यह संगठन “गांधी हत्या की छाया” से आज तक जूझता रहा, दूसरी ओर प्रतिबंध हटने के बाद इसे अपनी वैचारिकी फैलाने का और बड़ा अवसर मिला।

संगठनात्मक विस्तार और भाजपा का उदय:

          आरएसएस का सबसे बड़ा योगदान उसका संगठनात्मक विस्तार है। समय के साथ उसने शिक्षा (विद्या भारती), मज़दूर (भारतीय मज़दूर संघ), किसान (भारतीय किसान संघ), महिला (राष्ट्र सेविका समिति), छात्र (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद), जनमाध्यम और सेवा संगठनों तक अपने पैर पसारे।

          1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जो बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बनी। भाजपा की वैचारिक रीढ़ हमेशा से आरएसएस ही रही है। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता में वापसी ने आरएसएस के प्रभाव को अप्रत्यक्ष रूप से शासन तक पहुँचा दिया। आज आरएसएस का नेटवर्क केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर भी गहराई तक फैला हुआ है। यही वजह है कि आरएसएस के समर्थक इसे “राष्ट्रनिर्माण का संगठन” कहते हैं।

संगठनात्मक शक्ति और आलोचना:

          अक्सर कहा जाता है कि आरएसएस का सबसे बड़ा गुण उसका “संगठन कौशल” है। देशभर में लाखों शाखाएँ, हजारों अनुषांगिक संगठन और करोड़ों कार्यकर्ता इस संगठन को बहुत मज़बूत बनाते हैं। शिक्षा, मज़दूर, किसान, महिला और छात्र संगठनों से लेकर मीडिया और सेवा संस्थानों तक, आरएसएस ने अपना नेटवर्क फैला रखा है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह “संगठन कौशल” लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करने की बजाय, एक विशेष विचारधारा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को थोपने की दिशा में प्रयुक्त हुआ है। यही कारण है कि इसे कभी “सांस्कृतिक संगठन” कहा जाता है तो कभी “फासीवादी प्रवृत्ति वाला संगठन” भी बताया जाता है।

 

आलोचना और विवाद: “आतंकवादी संगठन?” बहस ;

          आरएसएस हमेशा विवादों के घेरे में रहा है। आलोचक कहते हैं कि यह संगठन लोकतांत्रिक मूल्यों की बजाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर चलता है।

·        सांप्रदायिक हिंसा: कई दंगों और लिंचिंग घटनाओं में आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठनों पर आरोप लगते रहे हैं।

·        ब्राह्मणवाद और जाति: आलोचकों का कहना है कि आरएसएस जाति-व्यवस्था को समाप्त करने के बजाय “ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता” को बढ़ावा देता है।

·        अल्पसंख्यक प्रश्न: मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति संदेह और “घर वापसी” जैसे अभियान इसी सोच को दर्शाते हैं।

·        वैचारिक आधार: कुछ बुद्धिजीवी इसे “फासीवादी” और “आतंकवादी” संगठन कहते हैं, हालांकि कानूनी रूप से इसे कभी आतंकवादी घोषित नहीं किया गया।

          आरएसएस का बचाव यह है कि वह केवल “सांस्कृतिक संगठन” है और समाज सेवा, राष्ट्रभक्ति और अनुशासन की शिक्षा देता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि “सांस्कृतिक संगठन” का दावा केवल एक आवरण है, असल में इसका लक्ष्य राजनीतिक सत्ता और वैचारिक वर्चस्व है।

          कुछ आलोचक, जिनमें कई बुद्धिजीवी और राजनीतिक नेता शामिल हैं, आरएसएस को “आतंकवादी संगठन” की संज्ञा देते हैं। उनका तर्क है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, लिंचिंग, दंगे और घृणा की राजनीति इस संगठन की छाया में होती है। हालांकि, कानूनी रूप से भारत सरकार या सुप्रीम कोर्ट ने आरएसएस को कभी “आतंकवादी संगठन” घोषित नहीं किया है। यह आरोप एक राजनीतिक और वैचारिक बहस का हिस्सा है, न कि विधिक रूप से सिद्ध तथ्य।

कांग्रेस और अन्य दलों की भूमिका:

          सवाल उठता है कि अगर आरएसएस इतना विवादास्पद था, तो फिर 70 साल कांग्रेस की सत्ता में रहते हुए भी यह इतना मज़बूत कैसे हुआ? इसका जवाब जटिल है। एक ओर कांग्रेस ने कई बार आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक समझौतों और लोकतांत्रिक दबावों के चलते वह लंबे समय तक टिक नहीं पाई। दूसरी ओर, कांग्रेस के भीतर भी कई नेता ऐसे रहे जिन्होंने आरएसएस की गतिविधियों को नज़रअंदाज़ किया या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया। कुल मिलाकर, कांग्रेस की यह असमंजसपूर्ण नीति ही आरएसएस की ताक़त बढ़ने का कारण बनी।

दो अक्टूबर का प्रतीकवाद: गांधी बनाम शस्त्र पूजा:

          2025 में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती और दशहरा एक ही दिन आएँगे। यह प्रतीकात्मक रूप से एक बड़ा अवसर है। एक ओर गांधी का संदेश है – अहिंसा, सत्य, करुणा और नैतिक शक्ति। दूसरी ओर, दशहरा शक्ति, शस्त्र और “असत्य पर सत्य की विजय” का पर्व है। आरएसएस इस दिन शस्त्र पूजा करता है। यह विरोधाभास ही आज़ादी के 100 साल बाद भारत के वैचारिक संघर्ष को भी दर्शाता है।

लाल बहादुर शास्त्री जयंती:

·         उन्होंने “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया और किसानों व सैनिकों का मनोबल बढ़ाया।

·         1965 के भारत-पाक युद्ध में देश का नेतृत्व दृढ़ता से किया।

·         हरित क्रांति को प्रोत्साहन देकर अन्न उत्पादन बढ़ाने में योगदान दिया।

·         दुग्ध क्रांति और श्वेत क्रांति की नींव रखी।

·         सादगी, ईमानदारी और नैतिकता को राजनीति में जीवित रखा।

महात्मा गांधी जयंती:

·         सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से आज़ादी की लड़ाई को जन आंदोलन बनाया।

·         चंपारण, खेड़ा और बारदोली आंदोलनों में किसानों को अन्याय से मुक्त कराया।

·         नमक सत्याग्रह (डांडी मार्च) से ब्रिटिश कानून को खुली चुनौती दी।

·        हिन्दू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता के लिए जीवन भर प्रयास किया।

·        स्वदेशी वस्तुओं और खादी को अपनाने का संदेश देकर आत्मनिर्भरता पर बल दिया

·        दशहरा और शस्त्र पूजा: शक्ति, विजय और आरएसएस के लिए संगठनात्मक अनुशासन का प्रदर्शन।

          यह संयोग भारत के वैचारिक संघर्ष को सामने लाता है—क्या देश का भविष्य गांधी की अहिंसा और बहुलतावाद में है, या फिर शक्ति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में?

भविष्य की दिशा :

          आरएसएस के 100 साल पूरे होने का मतलब है कि इस संगठन ने भारतीय समाज और राजनीति पर गहरा असर डाला है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह असर लोकतंत्र, समानता और भाईचारे को मज़बूत करता है या फिर समाज को विभाजित करता है?
गांधीजी ने कहा था – “मैं कायरता से हिंसा को बेहतर मानता हूँ, पर अहिंसा उससे कहीं श्रेष्ठ है।” आज ज़रूरत है कि इस वैचारिक संघर्ष को भावनाओं और आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर समझा जाए। मेरे विचार से, आरएसएस का मूल्यांकन दो स्तरों पर होना चाहिए—

·        संगठनात्मक क्षमता – इसमें निस्संदेह वह एक शक्तिशाली ढांचा खड़ा कर चुका है।

·        वैचारिक और सामाजिक प्रभाव – यही सबसे विवादास्पद है। अगर यह संगठन समावेशिता और बहुलतावाद की ओर बढ़े, तो इसकी ऊर्जा देश के लिए सकारात्मक होगी। लेकिन अगर यह केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर जाता है, तो 100 साल का यह जश्न मानवता के लिए चिंता का कारण ही बनेगा।

          आरएसएस के 100 साल पूरे होना केवल संगठन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज और राजनीति के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। गांधीजी ने कहा था—“मैं कायरता से हिंसा को बेहतर मानता हूँ, पर अहिंसा उससे कहीं श्रेष्ठ है।” यह वाक्य आज और भी प्रासंगिक है।

          अगर आरएसएस अपनी ऊर्जा और संगठनात्मक शक्ति को वास्तव में सामाजिक समानता, शिक्षा, गरीबी उन्मूलन और बहुलतावाद की दिशा में लगाए, तो यह भारत के लिए सकारात्मक हो सकता है। लेकिन अगर यह केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सत्ता विस्तार का साधन बना रहेगा, तो 100 साल का यह जश्न मानवता के लिए शोक का कारण ही बनेगा।

भारत एक लोकतांत्रिक और बहुलतावादी राष्ट्र है। यहाँ गांधी और आरएसएस दोनों की विरासत मौजूद रहेगी। असली सवाल यह है कि आने वाले 100 सालों में भारत किस दिशा में जाएगा—गांधी के मार्ग पर या शस्त्र पूजा की राह पर? यही हमारे लोकतंत्र और मानवता की असली परीक्षा होगी।

          चलतेर-चलते बतादूं कि प्रस्तुत लेख मूलतः Raju Parulekar के साथ एक साक्षात्कार का ट्रांसक्रिप्शन है, जिसमें बहुत सारी भावनात्मक और वैचारिक टिप्पणियाँ हैं। इसमें कई आरोप, ऐतिहासिक प्रसंग और व्यक्तिगत अनुभवों का मिश्रण है। यहाँ इस आधार पर एक परिष्कृत, संतुलित और तथ्यात्मक लेख प्रस्तुत है जिसमें तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों और विश्लेषण के साथ-साथ अपनी ओर से भी कुछ कहने का प्रयास किया गया है । 

Ramswaroop Mantri

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