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*14 करोड़ लोगों का देश की 65 प्रतिशत संपदा और 58 प्रतिशत आय पर कब्जा*

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डॉ. सिद्धार्थ

वर्ल्ड इनक्वलिटी रिपोर्ट ( 2026) के अनुसार भारत के 10 प्रतिशत ऊपरी लोगों के हाथ में देश की कुल 65 प्रतिशत संपदा केंद्रित हो गई है। स्पष्ट है कि एक तरफ देश के 14 करोड़ लोगों ने देश की कुल संपदा के 65 प्रतिशत पर कब्जा जमा लिया है, दूसरी तरफ देश के 1 अरब 36 करोड़ लोगों के पास कुल मिला कर देश की कुल संपदा का सिर्फ 35 प्रतिशत जीने-मरने के लिए है। (कुल वर्तमान आबादी 1 अरब 40 करोड़ के आधार पर)। सवाल यह है कि आखिर ये 14 करोड़ लोग किस सामाजिक समूह और वर्गीय समूह के हैं?

1- इन 14 करोड़ लोगों में कितने प्रतिशत आदिवासी हैं?

2011 जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में 10.50 करोड़ आदिवासी (एसटी) थे। वर्तमान में कम से कम इनकी आबादी 12 करोड़ है। ऊपर के सबसे धनी 14 करोड़ लोगों में शायद ही कोई आदिवासी हो। इसमें आदिवासी तो नहीं शामिल हैं। 

2- इन 14 करोड़ लोगों में कोई दलित है?

2011 की जनगणना के अनुसार देश में दलितों ( SCs) की कुल आबादी देश की कुल आबादी का 16.6 प्रतिशत थी, यानि 20.13 करोड़।  इस समय करीब 24 करोड़ है। ऊपर के सबसे धनी 10 प्रतिशत में मुश्किल से कुछ अंगुलियों पर गिनने लायक दलित होंगे, शायद न भी हों। 

3- इन 14 करोड़ लोगों में कितने अति पिछड़े हैं?

65 प्रतिशत संपदा के मालिक इन 14 करोड़ लोगों में मुश्किल से कोई अति पिछड़ा मिले। जो देश की कुल आबादी का करीब 30 से 35 प्रतिशत है। मतलब आज की तारीख में 40 करोड़ से अधिक। 

4- इन 14 करोड़ लोगों में कितने अन्य पिछड़े वर्ग हैं? 

हो सकता है कि देश की 65 प्रतिशत संपदा के मालिक ऊपर के 14 करोड़ लोगों में कुछ लोग या ज्यादा से ज्यादा 1 या 2 प्रतिशत लोग अन्य पिछड़े वर्ग हों। जबकि ये देश की कुल आबादी का आधे से अधिक हैं। मतलब आज की तारीख में 70 करोड़ के आसपास। 

साफ है कि इस संपदा के मालिकों में बहुलांश इस देश द्विज-सवर्ण जातियों (अपरकॉस्य) या पिछड़े की अगड़ी जातियों के लोग हैं। उसमें भी इन जातियों का एक बड़ा हिस्सा इससे बाहर होगा। 

5- इन 14 करोड़ लोगों में कितने मजदूर हैं?

देश की 65 प्रतिशत संपदा के मालिक इन 15 करोड़ लोगों में दावे के साथ कहा जा सकता है कि कोई मजदूर तो नहीं होगा। इसे देश में भारत सरकार के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार कुल कार्यरत लोग 64.33 करोड़ लोग थे। इनमें से कोई इन 14 करोड़ ऊपर के सबसे धनिक लोगों में कोई शामिल होगा, मुश्किल ही है।

इन सभी कार्यरत कर्मचारियों- मजदूरों में 31.2 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इसमें से एक भी व्यक्ति इन 14 करोड़ लोगों में शामिल नहीं होगा।

15.9 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं, इसमें से किसी के ऊपर के इन 14 करोड़ लोगों में शामिल होने की कोई दूर-दूर तक संभावना नहीं है। 

6- इन 14 करोड़ लोगों में कितने किसान हैं?

रिसर्च इंस्टीट्यूट PRICE की रिपोर्ट के अनुसार 6.84 करोड़ परिवार पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं। एक परिवार का औसत आकार 4.9 मानने पर इनकी कुल संख्या 33.5 करोड़ हैं। इन 33.5 करोड़ लोगों में कोई उन 14 करोड़ लोगों में शामिल होगा, जो देश की संपदा के 65 प्रतिशत के मालिक बन गए हैं, नामुमकिन है। 

स्पष्ट ही है कि इन देश की 65 प्रतिशत संपदा के मालिक इन 14 करोड़ लोगों में देश के बहुसंख्यक मेहनतकश हिस्से का कोई शामिल नहीं है। 

इसी वर्ल्ड इनक्वलिटी रिपोर्ट (2026) के अनुसार भारत के 1 प्रतिशत लोगों के हाथ में देश की कुल संपदा का 40 प्रतिशत केंद्रित हो गया है। मतलब 1 करोड़ 40 लाख लोग इस कुल 40 प्रतिशत संपदा के मालिक बन चुके हैं। इनमें कोई आदिवासी होगा, दलित होगा, अति पिछड़ा होगा या अन्य पिछड़ा होगा यह करीब-करीब नामुमकिन सा है। पिछड़ी जातियों की अगड़ी ऐतिहासिक तौर पर शासक जातियों (महाराष्ट्र के मराठा या गुजरात के पटेल और जाट आदि) में से हो सकता है कि कुछ लोग हों। ये 1 करोड़ 40 लाख लोग पूरी संभावना है कि द्विज-सवर्ण जातियों ( अपरकॉस्ट) के लोग हैं। यह कहने की कोई जरूरत नहीं है कि इसमें मेहनतकश किसानों-मजदूरों में से किसी के होने की कोई संभावना नहीं है। 

यह सामाजिक-वर्गीय असमानता सिर्फ संपदा के मालिकाने तक सीमित नहीं है। आय के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। देश के ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों की जेब में देश की कुल आय का 58 प्रतिशत जा रहा है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत लोगों की जेब में कुल आय का सिर्फ 15 प्रतिशत जा रहा है। 

यह सामाजिक-वर्गीय असमानता सार-दर-साल चौड़ी होती जा रही है। आज इस करीब 3 वर्ष पहले ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में सिर्फ देश की कुल संपदा का 58 प्रतिशत ही था, जो इस समय 65 प्रतिशत हो गया है। मतलब तीन सालों में 7 प्रतिशत की वृद्धि। साफ है कि दो तरह से हो रहा है-पहला देश में जो संपदा साल-दर-साल सृजित हो रही है, उसका बड़ा हिस्सा ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में जा रहा है। दूसरा नीचे के लोगों की संपदा का भी ऊपर के लोगों के हाथों हस्तानान्तरण हो रहा है। 

क्या यह सिर्फ गरीबी-अमीरी या संपदा-आय के अंतर का मामला है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह गरीबी-अमीरी और उससे जुड़े सुख-दुख और शोषण-उत्पीड़न का मामला तो है, लेकिन इस कम बड़ा मामला यह नहीं है कि जब देश की करीब तो तिहाई संपदा और आय 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में केंद्रित हो जाएगी, तो वह इस देश आर्थिक नीतियों, प्राथमिकताओं और भविष्य की योजनाओं को निर्णायक तरीके से प्रभावित करेंगे। इन सब चीजों को अपने हितों-लाभों के अनुसार चलाएंगे। 

चुनाव में अपनी इस अकूत संपदा और आय का इस्तेमाल ऐसी पार्टी या पार्टियों के लिए करेंगे जो उनकी इस संपदा और आय को बढ़ाने में मदद करें या बनाए रखने में मदद करें। वे मीडिया का मालिक बनकर और विज्ञापनदाता बनकर तय करेंगे कि कौन सी सूचना और सामग्री लोगों के पास जाए और कौन सी न जाए। किस चीज को मुद्दा बनाया जाए और किस चीज को नहीं। कौन सा मुद्दा उछाला जाए और किसे कब्र में दफ्न कर दिया जाए। वे सोशल मीडिया को भी निर्णायक तरीके से प्रभावित करने की स्थिति में हैं, क्योंकि सोशल मीडिया के मालिकों और उससे आय प्राप्त करने वालों का सारा कारोबार इसी धन से जुड़ा हुआ है। 

वे यहां तक कि देश की क्या प्राथमिकता और क्या नहीं हो, इसे भी तय करेंगे। यह सब वह सरकार बनाने वाली पार्टी या पार्टियों या विपक्ष की पार्टियों को चंदा देकर या न देकर करेंगे। वे नेताओं और नौकरशाहों को अपने अनुकूल और अपने फायदे के लिए काम करने के लिए, नीति बनाने के लिए और नीतियों को लागू करके लिए निर्णायक तरीके से प्रभावित और संचालित करने की स्थिति में होंगे। वे अपने इस अकूत संपदा और आय से देश के लोकतंत्र को हाईजैक करने की स्थिति में पहुंच गए हैं। ये सारे काम वे कानूनी और गैर-कानूनी सभी तरीकों का इस्तेमाल करके करते हैं और करेंगे। 

इसको भाजपा को मिलने वाले चंदे से समझा जा सकता है। 2023-24 में भाजपा को 2, 243 करोड़ चंदा मिला, जबकि इसके पहले के वर्ष में सिर्फ 719 करोड़ चंदा मिला था। एक साल में भाजपा को मिलने वाले चंदे में 211 प्रतिशत की वृद्धि। देश में सभी पार्टियों को मिले कुल चंदे का 88 प्रतिशत चंदा अकेले भाजपा को मिला। जब भाजपा को 2022-23 में 2, 243 करोड़ चंदा मिला, तो उसी वर्ष कांग्रेस को सिर्फ 281 करोड़ का सिर्फ चंदा मिला। कहां 2 हजार 243 करोड़ और कहां सिर्फ 281 करोड़।

जैसे-जैसे देश के धनिकों की संपदा और आय में वृद्धि हो रही है, उसी दर से भाजपा के चंदे में तेजी से वृद्धि हो रही है। 2004 में भाजपा को सिर्फ 88 करोड़ चंदा मिला था। 2014 में यह 295 करोड़ हो गया। 2019 में यह छलांग लगाकर 3 हजार 562 करोड़ रूपया हो गया और 2024 में और तेजी से छलांग लगाकर 10 हजार 107 करोड़ हो गया। 

देश के मुट्ठी भर धनिकों की तेजी से बढ़ती आय और संपदा और भाजपा की तेजी से बढ़ती आय (कानून सम्मत चंदा) के बीच का आनुपातिक रिश्ता क्या अकारण है? क्या यह सहज- स्वाभाविक परिघटना है?

अकारण ही नहीं, संविधान सभा में संविधान का अंतिम प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डॉ. आंबेडकर ने यह चेतावनी दिया था कि हम संविधान के माध्यम से जिस राजनीतिक लोकतंत्र को स्थापित कर रहे हैं, उसे सामाजिक और आर्थिक असमानता निगल जाएगी, यदि हम इसे खत्म करने में सफल नहीं हुए। सामाजिक असमानता खत्म तो नहीं हुई, लेकिन आर्थिक असमानता बढ़ती गई और अब तो छलांग लगाकर बढ़ रही है। यह आर्थिक असमानता वहां पहुंच गई है, जहां से वह देश, समाज और लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुकी है।

Ramswaroop Mantri

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