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*यदि दलबदल नहीं होता तो 1957 में ही मध्यप्रदेश में मुख्य विपक्षी दल होती सोशलिस्ट पार्टी*

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प्रवीण मल्होत्रा 

1962 की मध्यप्रदेश की दूसरी विधानसभा में (म.प्र. का गठन 1 नवम्बर 1957 को हुआ था) प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा) के 33 तथा सोशलिस्ट पार्टी (सोपा) के 14 विधायक चुन कर आये थे. 1964 में दोनों दलों के विलय से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई थी. जिसके विधायकों की संख्या 47 थी.

जनसंघ के 41 विधायक थे. संसोपा विधायक दल के नेता श्री राम प्रकाश मल्होत्रा चुने गए थे. यदि दलबदल नहीं होता तो श्री मल्होत्रा विपक्ष के नेता मनोनीत होते. लेकिन तब तक भारत के लोकतंत्र को दलबदल की बीमारी लग चुकी थी. हिन्दू महासभा (HMS) के 06 और राम राज्य परिषद (RRP) के 10,  स्वतंत्र पार्टी के 02और सीपीआई के एक विधायक चुन कर आये थे. 39 निर्दलीय भी थे. विपक्ष के नेता पद का निर्णय होने से ठीक पहले बस्तर के भूतपूर्व राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव ने अपने 5 विधायकों को जनसंघ में शामिल करवा दिया. हिन्दू महासभा और राम राज्य परिषद के कुछ विधायक भी जनसंघ में शामिल हो गए. इससे जनसंघ के विधायकों की संख्या बढ़कर 49 हो गयी जबकि समाजवादियों की संख्या 47 ही थी. परिणामस्वरूप श्री मल्होत्रा की जगह जनसंघ के श्री वीरेंद्रकुमार सखलेचा विपक्ष के नेता मनोनीत हुए. कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र थे.

कांग्रेस के विधायकों की संख्या 142 थी. उनकी सरकार के विरुद्ध मध्यप्रदेश विधानसभा में पहला अविश्वास  प्रस्ताव  श्री सखलेचा और श्री मल्होत्रा ने संयुक्तरूप से प्रस्तुत किया था. अविश्वास प्रस्ताव पर तीन -चार दिन जोरदार बहस हुई थी. अब विधानसभाओं में उस स्तर की बहस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. दर्शक दीर्घाएं खचाखच भरी होती थीं. इसी विधानसभा में पं. मिश्र ने कई सोशलिस्ट विधायकों को तोड़ कर कॉंग्रेस में मिला लिया था और मंत्री पद देकर पुरस्कृत किया था. लेकिन वे श्री मल्होत्रा को नहीं तोड़ पाए थे. जबकि उन्होंने उन्हें बहुत आकर्षक प्रस्ताव दिए थे.

मल्होत्राजी ने उनके सभी प्रस्ताव विनम्रतापूर्व अस्वीकार कर दिए थे यह कहते हुए कि मैं अपने नेता डॉ. लोहिया का साथ नहीं छोड़ सकता. उस विधानसभा के जो सोशलिस्ट सदस्य दलबदल कर कांग्रेस में गए उन्हें कैबिनेट मंत्री पद मिले. श्री कृष्णपाल सिंह तो बाद में गुजरात के राजयपाल भी रहे. कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि जिन्होंने दलबदल कर अवसर का लाभ उठाया वे सत्ता सुख भोगते रहे और जो सिद्धांतवादी बने रहे उन्हें हमेशा विपक्ष की राजनीति ही मिली. 

नीचे 1962 की विधानसभा की दलीय स्थिति का चार्ट दिया गया है.

प्रवीण मल्होत्रा 

Ramswaroop Mantri

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