अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*भाजपा प्रदेश अध्यक्ष खंडेलवाल का एक माह मेल-मिलाप मेंहदी बीता*

Share

कार्यकर्ताओं और जिला स्तर के नेताओं में मन में सवाल- आखिर भाजपा की रणनीति और संगठन की संरचना में कब आयेगी गति?

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की एक महीना लंबी “शुभारंभ यात्रा”

विजया पाठक
हेमंत खंडेलवाल को मध्यप्रदेश भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त हुए एक महीना पूरा होने को आया है। यह समयावधि किसी भी नए अध्यक्ष के लिए संगठन को दिशा देने, रणनीति तय करने और कार्यकारिणी के गठन की प्रक्रिया को गति देने के लिए महत्वपूर्ण होती है। किंतु अभी तक खंडेलवाल केवल नेताओं, कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से “शिष्टाचार मुलाकातों” तक ही सीमित रहे हैं। कार्यकर्ताओं में उत्साह तो है पर स्पष्ट दिशा नहीं दिख रही। यह प्रश्न तेजी से उभर रहा है कि क्या खंडेलवाल संगठनात्मक कसौटी पर खरे उतर पाएंगे?

मुलाकातों का महीना स्वागत, माला और यात्रा
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत खंडेलवाल लगातार प्रदेश के अलग-अलग जिलों का दौरा कर रहे हैं। यह संगठनात्मक दृष्टि से एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो किसी भी नए अध्यक्ष के लिए जरूरी मानी जाती है। लेकिन इस “यात्रा कार्यक्रम” में अब तक केवल नेताओं से मिलना, स्वागत समारोहों में शामिल होना, माला पहनना और पारंपरिक भाषणों तक ही गतिविधियाँ सिमटी हैं। आम कार्यकर्ताओं को अभी तक यह अनुभव नहीं हो पाया है कि पार्टी की दिशा या रणनीति में कोई ठोस बदलाव हो रहा है या कोई नया मार्गदर्शन मिल रहा है।

न प्रदेश कार्यकारिणी बनी, न निगम-मंडलों में नियुक्तियाँ हुईं
एक महीना होने को है लेकिन अभी तक प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया है। इसके अलावा राज्य के विभिन्न निगम-मंडलों में भाजपा की सरकार होते हुए भी राजनीतिक नियुक्तियों की गति शून्य जैसी बनी हुई है। यह सवाल आम कार्यकर्ताओं से लेकर जिला स्तर के नेताओं तक के बीच गूंज रहा है कि आखिर संगठन की संरचना को कब गति मिलेगी? प्रदेश कार्यकारिणी का गठन केवल औपचारिकता नहीं होता, बल्कि यह संगठन का रीढ़ होता है। प्रदेश के सभी क्षेत्रों से संतुलित प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए इस गठन की प्रतीक्षा की जा रही है। कार्यकारिणी ही नीतिगत दिशा तय करती है और आगामी चुनावी रणनीति की जमीन तैयार करती है। ऐसे में इसकी देरी पार्टी की गति को बाधित कर रही है।
संगठन की सुस्ती और आगामी राजनीतिक चुनौतियाँ
आने वाले महीनों में कई अहम राजनीतिक चुनौतियाँ हैं। नगरीय निकायों के चुनाव, संगठनात्मक पुनर्गठन, लोकसभा चुनाव की तैयारी और विपक्षी दलों की सक्रियता– इन सभी मोर्चों पर पार्टी को निर्णायक रूप से सजग और सशक्त रहना होगा।
यदि प्रदेश अध्यक्ष पद पर ही सुस्ती और अनिर्णय की स्थिति बनी रही तो यह संगठन की कार्यक्षमता पर भी प्रभाव डालेगी। कार्यकर्ताओं का मनोबल घटेगा और जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है। भाजपा की पहचान एक अनुशासन पार्टी के रूप में रही है, जहां नेतृत्व तेजी से निर्णय लेकर कार्यों को गति देता हैं। ऐसे में खंडेलवाल से अपेक्षा है कि वे नेतृत्व की उस परंपरा को निभाएं।

राजनीतिक समझ और संगठन कौशल की कसौटी
हेमंत स्वयं भी लोकसभा सांसद रह चुके हैं और संगठन में वर्षों से सक्रिय हैं। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष का पद केवल अनुभव से नहीं, बल्कि राजनीतिक समझ, संगठनात्मक कौशल, रणनीतिक दृढ़ता और तत्काल निर्णय लेने की क्षमता से संचालित होता है। प्रदेश की भौगोलिक और सामाजिक विविधता को समझते हुए एक संतुलित कार्यकारिणी बनाना, स्थानीय नेताओं की महत्त्वाकांक्षा को साधना, संगठन के पुराने और नए कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करना– ये सभी कार्य आसान नहीं हैं, लेकिन आवश्यक हैं।

दिल्ली का हस्तक्षेप घटेगा या बढ़ेगा?
यह सवाल स्वाभाविक रूप से उभरता है कि क्या खंडेलवाल की नियुक्ति से दिल्ली का हस्तक्षेप प्रदेश की राजनीति में घटेगा? अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है क्योंकि खंडेलवाल न तो पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से कार्य कर पा रहे हैं और न ही उनकी ओर से कोई बड़ा नीतिगत संकेत आया है जिससे यह आंकलन किया जा सके कि वे प्रदेश संगठन को ‘अपने ढंग’ से चला पा रहे हैं।

सरकार और संगठन का सामंजस्य
भाजपा के लिए सरकार और संगठन का तालमेल हमेशा से उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। लेकिन जब संगठनात्मक ढांचा अधूरा हो, कार्यकारिणी लंबित हो और नियुक्तियाँ रुकी हों तो सरकार भी अकेली पड़ जाती है। कार्यकर्ता भ्रम की स्थिति में आ जाते हैं और विपक्ष को हमले का मौका मिल जाता है।

जनता और कार्यकर्ताओं को परिणाम की अपेक्षा
बिल्कुल, खंडेलवाल के पास अभी भी समय है। एक महीना केवल “परिचय और समझ” के लिए काफी है, लेकिन अब जनता और कार्यकर्ता “परिणाम और दिशा” की अपेक्षा कर रहे हैं। उन्हें चाहिए कि वे अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करें– कार्यकारिणी के गठन से लेकर जमीनी संगठनात्मक मजबूती तक की रूपरेखा घोषित करें। भाजपा का यह विशेषता रही है कि वह समय पर नेतृत्व परिवर्तन करती है और अपेक्षाएं भी उसी के अनुसार रखती है। यदि खंडेलवाल इसे अवसर की तरह लेते हैं, तो यह उनके नेतृत्व की असली परीक्षा होगी।
नि:संदेह हेमंत खंडेलवाल एक अनुभवी नेता हैं, जिनकी ईमानदार छवि और संगठन के प्रति निष्ठा पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष पद केवल अनुभव नहीं, कार्यक्षमता की परीक्षा है। अगर यह पद केवल मुलाकातों, स्वागत भाषणों और औपचारिक दौरों तक सीमित रह गया तो भाजपा को आने वाले चुनावी संघर्षों में नुकसान हो सकता है। प्रदेश की भाजपा इकाई को एक सक्रिय, निर्णायक और रणनीतिक नेतृत्व की जरूरत है, जो कार्यकर्ताओं को दिशा दे सके और पार्टी को मजबूती प्रदान करे। कार्यकारिणी का गठन, नियुक्तियों पर निर्णय, संगठन में ऊर्जा का संचार ये अब टालने योग्य कार्य नहीं है। पार्टी आलाकमान पहले भी खंडेलवाल की संगठनात्‍मक और कार्यक्षमता को परख चुका है। 2020 में जब कांग्रेस के विधायक बीजेपी में आये थे और इन विधायकों को खंडेलवाल के नेतृत्‍व में ही बैंगलुरू ले जाया गया था। इस काम को इन्‍होंने बखूबी अंजाम दिया था।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें