मध्य प्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है, लेकिन अवैध खनन, नदियों में गिरता सीधा सीवेज और अतिक्रमण से इस पहचान पर गंभीर संकट
अवैध खनन, नदियों में गिरता सीधा सीवेज और अतिक्रमण के चलते भारत, विशेषकर मध्य प्रदेश की नदियों (जैसे नर्मदा, महानदी, हलाली) पर अस्तित्व का गंभीर संकट मंडरा रहा है। “नदियों का मायका” कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में 200 से अधिक नदियां दम तोड़ने की कगार पर हैं, क्योंकि अनियंत्रित रेत खनन ने जलीय जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को नष्ट कर दिया है।
प्रमुख संकट के कारक और प्रभाव इस प्रकार हैं:
- अवैध और अंधाधुंध रेत खनन: नर्मदा, बेलकुंड और अन्य नदियों में भारी मशीनों से अवैध खनन के कारण नदियों के प्रवाह बाधित हो रहे हैं, किनारे टूट रहे हैं और जलीय जीवन खत्म हो रहा है। इससे कई नदियां सूखकर मैदान में तब्दील हो रही हैं।
- सीधा सीवेज और प्रदूषण: नदियों में बिना उपचारित (Untreated) सीवेज का सीधा गिरना पानी को अशुद्ध कर रहा है, जिससे खतरनाक बैक्टीरिया पनप रहे हैं। मध्य प्रदेश में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं, जिससे बड़ा जल संकट गहरा रहा है।
- अतिक्रमण: नदी के किनारों पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण ने नदी के चैनल को सिकोड़ दिया है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
- पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान: यह अंधाधुंध खनन और प्रदूषण न केवल पानी की गुणवत्ता को खराब कर रहा है, बल्कि जैव विविधता (Biodiversity) को भी खत्म कर रहा है, जिससे जलीय जंतुओं की ब्रीडिंग रुक गई है।
- अस्तित्व पर खतरा: पर्यावरणविदों के अनुसार, यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में नदियां बारहमासी न रहकर केवल बरसाती नाले बनकर रह जाएंगी।
इस संकट को रोकने के लिए एनजीटी (NGT) ने जांच और कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, लेकिन खनन माफिया और अपर्याप्त सीवेज उपचार के कारण नदियां अभी भी संकट में हैं।

भोपाल. मध्य प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली मां नर्मदा ही नहीं, बल्कि प्रदेश में बहने वाली 200 से अधिक नदियां आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं. एमपी को नदियों का मायका कहा जाता है, लेकिन अवैध खनन, नदियों में गिरता सीधा सीवेज और अतिक्रमण ने इस पहचान को गंभीर संकट में डाल दिया है. हालात इतने चिंताजनक हैं कि अमेरिका के वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट ने नर्मदा को दुनिया की उन 6 नदियों में शामिल किया है, जिनका भविष्य खतरे में बताया गया है. यह चेतावनी सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बड़ा अलार्म है.मध्यप्रदेश की जीवन रेखा मां नर्मदा समेत 200 से अधिक नदियां गंभीर संकट में हैं. अवैध खनन, सीवेज और अतिक्रमण से नदियों की बायोडायवर्सिटी खत्म हो रही है. वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट ने नर्मदा को दुनिया की संकटग्रस्त नदियों में शामिल किया है. विशेषज्ञों ने चेताया है कि हालात नहीं बदले तो 50 साल में नर्मदा का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है.
श में करीब 450 छोटी-बड़ी नदियां बहती हैं, जिनमें से 200 से ज्यादा नदियां अकेले मध्यप्रदेश में हैं. बावजूद इसके, संरक्षण के दावे जमीन पर कमजोर नजर आते हैं. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश की अधिकांश नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं. नर्मदा जैसी बारहमासी नदी भी अब प्रदूषण और अवैध गतिविधियों की चपेट में है. यदि हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले दशकों में नदियां सिर्फ नक्शों और किताबों में ही बचेंगी.
नर्मदा समेत प्रदेश की नदियां अंतिम सांस पर
देश के वरिष्ठ पर्यावरणविद डॉ सुभाष पांडे के अनुसार मध्यप्रदेश में नदियां अपनी अंतिम सांस ले रही हैं. उन्होंने बताया कि फिलहाल नर्मदा ही एकमात्र बारहमासी नदी बची है, लेकिन उस पर भी खतरा लगातार बढ़ रहा है. नर्मदा में नालों और सहायक नदियों का गंदा पानी मिल रहा है, जिससे पानी की गुणवत्ता तेजी से गिर रही है. अवैध रेत खनन ने नदी के इकोसिस्टम को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है.
अवैध खनन से खत्म होती बायोडायवर्सिटी
विशेषज्ञों के मुताबिक रेत के अंदर जलीय जीव-जंतुओं की ब्रीडिंग होती है. जब अवैध खनन होता है तो सिर्फ रेत ही नहीं, बल्कि पूरी वाटर लाइफ नष्ट हो जाती है. इसका सीधा असर मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय प्रजातियों पर पड़ता है. यही जीव नदियों को स्वाभाविक रूप से साफ रखने में मदद करते हैं. इनके खत्म होने से नदी खुद को रिवाइव नहीं कर पाती.
50 साल में सिर्फ पॉइंट्स में दिखेगी नर्मदा
डॉ सुभाष पांडे ने चेतावनी दी है कि अगर यही हाल रहा तो 50 साल बाद नर्मदा एक सतत नदी के रूप में नहीं दिखेगी. जगह-जगह सिर्फ पानी के छोटे-छोटे हिस्से रह जाएंगे. अतिक्रमण, जलस्तर में गिरावट और प्रदूषण इसकी मुख्य वजहें होंगी. वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट भी इस आशंका को मजबूत करती है.
सिर्फ खनन नहीं, सीवेज भी बड़ा खतरा
मध्यप्रदेश में नदियों के प्रदूषण का दूसरा बड़ा कारण सीधा सीवेज है. कांग्रेस का आरोप है कि नर्मदा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए 28 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की योजना बनी थी, लेकिन सिर्फ नेमावर का एक प्लांट ही आंशिक क्षमता से काम कर रहा है. कांग्रेस नेता भूपेंद्र गुप्ता का कहना है कि सरकार संरक्षण से ज्यादा रेत से होने वाली कमाई पर ध्यान दे रही है.
तालाबों की हालत भी चिंताजनक
नदियों के साथ-साथ तालाबों की स्थिति भी खराब है. भोपाल का बड़ा तालाब, जो शहर की पहचान है, उसका पानी सी कैटेगरी में पहुंच चुका है. डॉ सुभाष पांडे के अनुसार भोपाल का कोई भी तालाब पीने योग्य नहीं बचा है. करीब 12 लाख लोग इसी पानी पर निर्भर हैं, जिसे किसी तरह ट्रीट करके सप्लाई किया जा रहा है.
सरकार का दावा, कार्रवाई जारी
भाजपा प्रवक्ता अजय सिंह यादव का कहना है कि राज्य सरकार अवैध खनन बर्दाश्त नहीं करेगी. रेत माफियाओं के खिलाफ लगातार कार्रवाई हो रही है और नदियों के संरक्षण के लिए सरकार संकल्पित है. उनका दावा है कि आने वाले समय में निगरानी और सख्त होगी.
नदियां और जंगल ही एमपी की असली पहचान
विशेषज्ञों का मानना है कि जल, जंगल और नदियां ही मध्यप्रदेश की असली पहचान हैं. इन्हीं के सहारे आदिवासी संस्कृति, कृषि, उद्योग और इकोलॉजिकल बैलेंस टिका है. अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसका सीधा असर प्रदेश की जनता की जिंदगी पर पड़ेगा.





