-तेजपाल सिंह ‘तेज’
30 जनवरी भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब राष्ट्रपिता के रूप में प्रतिष्ठित महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी; यह उस विचार पर हमला था जिसने भारत को स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नैतिक आधार प्रदान किया। वर्षों तक इस दिन को राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में याद किया जाता रहा, परंतु हाल के वर्षों में एक प्रवृत्ति उभरती दिखाई देती है—जहाँ गांधी की स्मृति के स्थान पर उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को कुछ समूहों द्वारा “वीर” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह परिवर्तन केवल स्मृति का नहीं, बल्कि विचारधाराओं के संघर्ष का संकेत है। प्रश्न उठता है—क्या गांधी की हत्या केवल तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम थी, या उसके पीछे एक गहरी वैचारिक असहमति थी? क्या दलितों, अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों की वकालत गांधी के विरुद्ध आक्रोश का कारण बनी? और क्या विभाजन तथा तथाकथित “55 करोड़ रुपये” का मुद्दा वास्तव में हत्या का कारण था, या यह बाद में गढ़ी गई व्याख्या थी?
विचारों का संघर्ष: दो भारत की परिकल्पना
गांधी जिस भारत की कल्पना करते थे, वह समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित था—एक ऐसा देश जहाँ धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव न हो। दूसरी ओर, कुछ संगठनों और विचारकों की दृष्टि में भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र था, जिसकी पहचान बहुसंख्यक धार्मिक परंपरा से निर्धारित होती थी। विनायक दामोदर सावरकर ने “हिंदुत्व” की अवधारणा को परिभाषित करते हुए हिंदू और मुसलमानों को दो अलग सांस्कृतिक राष्ट्र बताया। 1937 के हिंदू महासभा अधिवेशन में उन्होंने स्पष्ट रूप से यह विचार रखा। यह दृष्टिकोण बाद में मुस्लिम लीग के “दो-राष्ट्र सिद्धांत” से टकराता भी है और किसी हद तक उसे वैचारिक आधार भी देता है। गांधी का आग्रह इसके विपरीत था। वे “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना से प्रेरित थे। उनकी प्रार्थना सभाओं में “ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम” गाया जाता था। उनके लिए धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय था, राजनीतिक विभाजन का नहीं।
दलित अधिकार और सामाजिक सुधार
1932 के पूना पैक्ट के बाद गांधी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाया। 1934 में पुणे में उन पर बम हमला हुआ—यह घटना दर्शाती है कि सामाजिक सुधारों से भी उन्हें तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। मंदिर प्रवेश आंदोलन, अंतर्जातीय विवाह के समर्थन और “हरिजन” शब्द के प्रयोग के माध्यम से वे समाज की जड़ताओं को चुनौती दे रहे थे।
डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर जाति उन्मूलन की अधिक क्रांतिकारी वकालत करते थे। गांधी और अंबेडकर के बीच मतभेद थे, किंतु दोनों का अंतिम लक्ष्य सामाजिक समानता ही था। गांधी का तरीका क्रमिक सुधार का था, जबकि अंबेडकर संरचनात्मक परिवर्तन चाहते थे। यह तर्क दिया जाता है कि गांधी की सामाजिक पहलों से परंपरागत विशेषाधिकारों पर चोट पहुँची। जो वर्ग वर्ण-व्यवस्था से लाभान्वित थे, उनके लिए यह परिवर्तन असुविधाजनक था। कहा जाता है कि दलितों के हितों की बात के कारण RSS और हिंदुत्ववादी गांधी से नाराज़ थे।
55 करोड़ रुपये और विभाजन का प्रश्न
गांधी की हत्या के पीछे “55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को देने” का तर्क अक्सर दोहराया जाता है। तथ्य यह है कि विभाजन के बाद संपत्ति के बँटवारे के अंतर्गत पाकिस्तान को कुल 75 करोड़ रुपये मिलने थे, जिनमें से 20 करोड़ पहले ही दे दिए गए थे। शेष 55 करोड़ रुपये पर कश्मीर संघर्ष के कारण अस्थायी रोक लगी। बाद में मंत्रिमंडल ने, जिसमें डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी सदस्य थे, यह राशि जारी करने का निर्णय लिया। गांधी ने दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए उपवास किया, किंतु 55 करोड़ रुपये का प्रश्न उनके उपवास की प्रत्यक्ष शर्त नहीं था।
विभाजन के संदर्भ में गांधी अंत तक इसके विरोधी रहे। उन्होंने कहा था—“मेरे शव पर ही विभाजन होगा।” किंतु जब राजनीतिक नेतृत्व—जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल—ने विभाजन को अपरिहार्य माना, तब गांधी ने इसका खुला समर्थन नहीं किया, बल्कि कहा कि वे इसका विरोध नहीं करेंगे। उनका प्रयास था कि विभाजन के बाद भी भारत और पाकिस्तान के बीच मानवता का सेतु बना रहे।
20 और 30 जनवरी 1948: सुरक्षा की विफलता
20 जनवरी 1948 को बिरला हाउस में बम विस्फोट हुआ। यह गांधी की हत्या का असफल प्रयास था। इसके बावजूद 30 जनवरी को सुरक्षा में ढील बरती गई और गोडसे ने तीन गोलियाँ दागकर गांधी की हत्या कर दी। मामले में कई लोग गिरफ्तार हुए। सावरकर पर भी आरोप लगा, किंतु पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में वे बरी हो गए। बाद में कपूर आयोग ने इस प्रकरण की पुनः जाँच की और प्रशासनिक चूक की ओर संकेत किया।
स्मृति की राजनीति
समय के साथ गोडसे को “राष्ट्रवादी” या “धर्मरक्षक” के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास हुए। नाटक, पुस्तकें और कुछ राजनीतिक वक्तव्य इस प्रवृत्ति को बल देते हैं। यह केवल ऐतिहासिक पुनर्व्याख्या नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीति में प्रतीकों के पुनर्स्थापन का प्रयास है। गांधी की विरासत—अहिंसा, सत्य, सर्वधर्म समभाव—आज भी प्रासंगिक है। किंतु जब समाज में असहिष्णुता, सांप्रदायिकता और जातीय भेदभाव उभरते हैं, तब गांधी की आलोचना भी तेज हो जाती है।
उपसंहार
गांधी की हत्या को केवल एक व्यक्ति की त्रासदी के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस वैचारिक संघर्ष का परिणाम थी जो स्वतंत्र भारत की आत्मा को लेकर चल रहा था—और आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। एक ओर वह भारत है जो विविधता में एकता, समानता और न्याय को अपना आदर्श मानता है। दूसरी ओर वह दृष्टि है जो सांस्कृतिक एकरूपता और परंपरागत संरचनाओं को राष्ट्र की पहचान से जोड़ती है।
30 जनवरी हमें केवल शोक मनाने का अवसर नहीं देता; यह आत्मचिंतन का भी दिन है। यह प्रश्न उठाता है—हम किस भारत के साथ खड़े हैं? उस भारत के साथ जो गांधी ने देखा था, या उस कल्पना के साथ जो विभाजन और वैमनस्य की रेखाओं पर आधारित है? इतिहास का सम्मान केवल स्मरण से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों को जीवित रखने से होता है। गांधी की विरासत को समझना और आलोचनात्मक दृष्टि से परखना आवश्यक है, परंतु उसे मिथकों और अर्धसत्यों के आधार पर खारिज करना न तो इतिहास के प्रति न्याय है, न ही लोकतंत्र के प्रति।
30 जनवरी की निस्तब्धता में यही प्रश्न गूँजता है—क्या हम शहादत को याद रखेंगे, या स्मृति को वैचारिक संघर्ष का हथियार बना देंगे.
(https://youtu.be/WHvkc7zctZo?si=y4zYPmEnq6I2QILZ: डॉ. पंकज श्रीवास्तव)






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