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भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण दिन है 31 अक्टूबर 

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 31 अक्टूबर की तारीख कई मायनों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। खास तौर से देश के मजदूर वर्ग और आम जनता के लिए।आज के ही दिन लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में भारत के सबसे पुराने श्रम संगठन आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस एटक की स्थापना हुई थी जिसने देश के मजदूर वर्ग को शोषण से मुक्ति दिलाने उन्हें कानूनी और संवैधानिक अधिकार दिलाने, और उनके   जीवन स्तर में सुधार के लिए ऐतिहासिक और निर्णायक लड़ाइयां लड़ी और आज भी वह देश का प्रमुख ट्रेड यूनियन केंद्र है जो निरंतर घोर मजदूर विरोधी फासी वादी सरकार की नीतियों के खिलाफ संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।अगर एटक का एक निहायत गैरजरूरी और संकीर्णता से ग्रस्त श्रमिक एकता विरोधी विभाजन नहीं हुआ होता तो देश का सबसे शक्तिशाली ट्रेड यूनियन केंद्र होता।

  यह एक दुखद संयोग है कि आज के दिन ही एटक के महासचिव और प्रखर कम्युनिस्ट सांसद का गुरु दास दास गुप्ता का निधन हुआ। उनके नेतृत्व में एटक ने न केवल ट्रेड यूनियन आंदोलन में महत्वपूर्ण ऊंचाई छुई बल्कि वैचारिक संकीर्णता से ऊपर उठकर व्यापक मजदूर एकता का निर्माण किया जिसके चलते सरकार को कई मजदूर विरोधी कदमों को पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा।आज जब सभी गैर कम्युनिस्ट दलों में राजनीति एक व्यवसाय बना हुआ है,का गुरु दास गुप्ता ने एक बड़ी टैक्स चोरी पकड़वाई जिसके पुरस्कार स्वरूप मिली करीब ५०लाख रू की राशि उन्होंने पंजाब के आतंकवादियों द्वारा मारे गये लोगों के परिवारों की सहायता के लिए दान कर दी। 

 आज देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल का जन्म दिन और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का शहादत दिवस भी है। सरदार पटेल एक महान और अग्रिम  पंक्ति के स्वतंत्रता सेनानी तो थे ही उनका सबसे बड़ा योगदान स्वतंत्रता के बाद देश की छह सौ से अधिक रियासतों को एकजुट करके भारत में समाहित करना था।

 लेकिन  यह भी एक हकीकत है कि वे राजनैतिक रूप से गांधी जी के समान दक्षिणपंथी नेता और उनके अनुयाई तो थे लेकिन गांधी जी के समान धर्म निरपेक्ष नहीं थे बल्कि मुस्लिम समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त थे इसलिए आजादी के बाद सभी मुसलमानों के पाकिस्तान न जाने पर सवाल उठाए थे बिना इस तथ्य पर विचार किए कि विभाजन के पूर्व भी बड़ी तादाद में मुस्लिम विभाजन विरोधी थे जिनमें ख़ान अब्दुल गफ्फार खां और मौलाना आजाद जैसे नेता शामिल थे। विभाजन के पूर्व कई मुस्लिम बहुल प्रांतीय असेम्बली चुनाव में मुस्लिम लीग के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिली थीं।

यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि धार्मिक आधार पर विभाजन के लिए कोई जनमत संग्रह नहीं कराया गया था और विभाजन की मांग सबसे पहले सावरकर ने उठाई जिसे जिन्ना ने आगे बढ़ाया और विभाजन पर गांधी नेहरू के सहमत होने के पहले सरदार पटेल सहमत हुए थे जैसा कि मौलाना आजाद की पुस्तक INDIA WINS FREEDOM में उल्लेखित है। सरदार पटेल अपनी दक्षिण पंथी विचार धारा के साथ घोर कम्युनिस्ट विरोधी भी थे और तेलंगाना में निजाम के खिलाफ चल रहे सशस्त्र आंदोलन के बाद आये मोड़ के बाद भारतीय सेनाऔर रजाकारों ने चार हजार कम्युनिस्ट कार्य कर्ताओं की हत्या की थी। लेकिन अपनी विचारधारा के बावजूद सरदार पटेल देश के कानून  आजादी की लड़ाई के  मूल्यों और राज्य धर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित थे और इसलिए उन्होंने गांधी जी की हत्या के बाद  संघ पर प्रतिबंध लगाने और उसकी सांप्रदायिक गतिविधियों को दबाने में कोई कोताही नहीं की और अपनी इसी निष्ठा के चलते संविधान में अनुच्छेद ३७०को शामिल करने का प्रस्ताव उनके द्वारा पेश किया गया जबकि नेहरू उस समय विदेश में थे।

 संघ उनकी मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त विचार धारा के कारण अपना आदर्श पुरुष बताकर पेश करता है जिसका एक कुत्सित उद्देश्य नेहरू और उनकी विचारधारा को नीचा दिखाना भी है और इसलिए हर अप्रिय चीज़ के लिए नेहरू को कोसा जाता है जबकि सोचने वाली बात है कि जो व्यक्ति नेहरू के समकक्ष कद का और लौह पुरुष के नाम से जाना जाता हो क्या मंत्री मंडल में उसके रहते नेहरू अपनी मनमानी थोप सकते थे? लेकिन चूंकि संघ भाजपा की खुद की कोई विरासत नहीं है इसलिए सरदार पटेल को ही नेहरू के मुकाबले खड़ा करके जबरन अपना आदर्श पुरुष बना लिया गया है।

 आज इंदिरा गांधी को भी याद करने का दिन है। नेहरू गांधी परिवार के प्रति नफ़रत और तुच्छ और हीन भावना के चलते भले ही मोदी और भाजपा इंदिरा गांधी की कुर्बानी को सम्मान न दे पर इतिहास के पन्नों में अमिट स्याही से इतना कुछ दर्ज है कि चाहकर भी उसे मिटाया नहीं जा सकता।और वैसे भी गांधी को गालियां बकने औरर बदनाम करने वाले अहसान फरामोशों से कोई अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए।

अगर सरदार पटेल लौह पुरुष थे तो इंदिरा गांधी सच्चे अर्थों में लौह महिला थी और उनकी शख्सियत की ताकत को मोदी भी जानते हैं इसलिए वे नेहरू राजीव और सोनिया राहुल पर तो अपशब्दों गालियों की बौछार करते हैं पर इंदिरा गांधी पर हमले से बचते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि इंदिरा गांधी के सामने उनकी हैसियत “क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा” से ज्यादा नहीं है। कोयला खदानों और बैंको का राष्ट्रीय करण, प्रिवी पर्स समाप्ति हरित क्रांति जैसे कदमों से भारत के मजदूर किसान और आम लोगों के आर्थिक जीवन में बड़े बदलाव आये। बेशक आपातकाल लगाना इंदिरा गांधी के शानदार शख्सियत पर एक बदनुमा दाग़ लगा गया पर उस आपातकाल की तुलना आज के आपातकाल से बद्तर हालात से करें तो पता चलता है कि उस आपातकाल ने तो देश को तात्कालिक दुःख और नुकसान पहुंचाया लेकिन आज के  जहरीले नफ़रती और विभाजन कारी हालात ने शायद आने वाली कई पीढ़ियों के लिए अंधकार की गहरी खाई में ढकेल दिया है और संघ भाजपा सत्ता में न भी रहे तब भी समाज की नसों में जो ज़हर भर गया है उसके नष्ट होने में लंबा वक्त लगेगा। 

भ्रष्टाचार को world phenomena  बतलाकर उसे सामान्य बात कहना इंदिरा गांधी की दूसरी बड़ी ग़लती थी जिसने देश में भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकृति देने का काम किया। लेकिन अपने साहस और बुद्धिमत्ता से और सबसे बढ़कर अपनी शहादत से उन्होंने देश को जो कुछ दिया उसको देखते हुए वे गलतियां भुला देने योग्य है।

(प्रेषित विजय दलाल)

Ramswaroop Mantri

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