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4 कविताएं (नशे का कहर / लड़कियों का बोझ / पता नहीं / बुढ़ापे का जख्म)

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नशे का कहर

ज्योति
कक्षा – 9, उम्र-15
बैसानी, कपकोट
बागेश्वर, उत्तराखंड

मैंने सोचा कब छूटेगी इनकी ये लत,
फिर भी सेवन किया उसने हर वक़्त,
नशा जो करता रहा कोई इंसान,
फिर कभी न होगा उसका कल्याण,
नशे को छोड़ कर तो देखो एक बार,
वरना छूट जाएगी ये ज़िन्दगी ये संसार,
कब होगा नशे का सिलसिला बंद?
नहीं तो ये कर देगा सभी का अंत,
मत पियो ये जहर है एक ऐसा,
जिसकी चपेट में आ रहा हर शहर है,
कहीं न खुले नशे की ये दुकान‌,
अगर अभी न रोका इसको,
बना देगा ये हर घर को शमशान।।
चरखा फीचर्स

लड़कियों का बोझ

तनुजा आर्य
लामाबगड़, कपकोट
बागेश्वर, उत्तराखंड

क्या करेगी लड़की पढ़ लिख कर?
जाना तो है उसे किसी और के घर,
क्यों करे उसकी शिक्षा पर खर्च?
जब संभालना है उसे रसोई घर,
इसी सोच ने लड़कियों को रोका है,
उसे आगे बढ़ने पर टोका है,
न पति का घर उसका अपना हुआ,
और पिता का घर भी सपना हुआ,
बीच में रह गई, वह कुछ भी न मिला,
मिला तो सर पर इज़्ज़त का बोझ,
वो रहता हमेशा संग उसके हर रोज़,
कैसे रोकेगी वह इस झूठी मर्यादा को,
नहीं उठता है अब उससे ये बोझ,
थक गई है अब वह और,
नहीं सहा जाता उससे ये अब ठौर,
बंद करो अब तो ये बेवजह का शोर।।
चरखा फीचर्स

पता नहीं

पूजा बिष्ट
कक्षा- 9
पोथिंग, कपकोट
बागेश्वर, उत्तराखंड

एक औरत होना गुनाह था पता नहीं,
उसका हंसना भी पाप था, पता नहीं,
क्या उसका इस दुनिया में आना धोखा था?
पता नहीं, ये तो कुछ भी पता नहीं,
जिसको साथी माना वो कौन था पता नहीं,
जिसको अपना दुख बताया, कौन था पता नहीं,
जिसको दिल में बसाया कौन था पता नहीं,
पढ़ तो सब रहे है हमने क्या पढ़ा, पता नहीं,
क्या तुम पढ़ रहे हो वही,पता नहीं,
क्यों बताना जरूरी नहीं समझा, पता नहीं,
क्या छुपाना जरूरी है? पता नहीं,
कभी दुख को झेला था, पता नहीं,
अब आदत हो गई होगी, पता नहीं,
नहीं पता, नहीं पता, कुछ पता नहीं,
समझ नहीं आता क्या करूं,पता नहीं,
सोचा था कभी, पर अब,पता नहीं,
दुख झेलूं या रहने दूँ, पता नहीं,
तुम्हें दर्द सुनाऊँ, या चुप रहूँ, पता नहीं,
नहीं पता, नहीं पता, कुछ पता नहीं।।
बुढ़ापे का जख्म

प्रियंका साहू
मुजफ्फरपुर, बिहार

कौन कहता है कि सिर्फ बच्चे अनाथ होते हैं,
बुढ़ापे में बस वो अकेला ही खड़ा है,
कड़ी धूप में आज भी वो परिश्रम कर रहा है,
अब खुद से खुद का बोझ उठाया नही जाता,
बीमारियों से घिरा उसे शरीर संभाला नहीं जाता,
अब वह बेबस और बेसहारा सा हो गया है,
इस उम्र में उससे खुद खाना बनाया नहीं जाता है,
आँखों से बहता नीर मगर दिल में बसता एक आस है,
बार बार वो कहता इस बेसहारा को सहारा मिल जाता,
कोई उसका हाथ पकड़ता और किनारा मिल जाता,
मगर इस उम्र में अब कहां कोई साथ मिलते हैं,
कौन कहता है कि सिर्फ बच्चे अनाथ होते हैं।।
चरखा फीचर्स

Ramswaroop Mantri

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