*- डॉ सुनीलम*
2-3 दिसंबर 1984 की मध्य रात्रि को हुई भोपाल गैस त्रासदी की 40वीं बरसी हैं। गत 40 वर्षों में 30 हजार से ज्यादा गैस पीड़ितों की मौत हो चुकी है तथा 7 लाख लोगों का इलाज चल रहा है। गैस पीड़ितों के लिए जो अस्पताल खुला है उसमें प्रतिदिन 7000 गैस पीड़ित इलाज कराने जाते हैं । गैस पीड़ितों के इलाज के लिए 1200 करोड़ रूपया मिला था लेकिन वह पैसा कोई कहता है कि रिजर्व बैंक में पड़ा है। आम चर्चा यह है कि यह पैसा सरकार ने लाभ कमाने के लिए अन्य कार्यों में निवेश कर दिया है। स्थिति यह है कि मरीजों को न तो दवाई उपलब्ध हो रही है और न ही इलाज करने वाले डॉक्टरों को समय पर वेतन मिल रहा है।

40 साल पहले जहरीली गैस के रिसाव के बाद जो प्रदूषित कचरा जमा था, उसका आज तक निस्तारण नहीं हो सका है। पहले एक जर्मनी की कंपनी निस्तारण के लिए आई थी। 50 करोड़ में वह रासायनिक कचरे का निस्तारण के लिए तैयार थी लेकिन उसे ठेका नहीं दिया गया। अब 35 लाख रुपए टन से कचरा हटाने के लिए 126 करोड़ रुपए की जरूरत बताई जा रही है । फिलहाल भोपाल के बाशिंदे जहरीला पानी पीने को मजबूर है, जिसके चलते बड़े पैमाने पर बच्चों में विकलांगता तथा आम लोग श्वास की बीमारी से पीड़ित है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अभी तक 40 वर्षों में कोई भी यूनियन कार्बाइड कंपनी का ओहदेदार या दोषी प्रशासनिक अधिकारियों में से कोई भी जेल नहीं गया है। अब कंपनी का नाम भी बदल गया है, अब उसे डाउ केमिकल्स के नाम से जाना जाता है। यूनियन कार्बाइड के चीफ वॉरेन एंडरसन की 92 वर्ष की उम्र में मौत हो चुकी है। भोपाल के गैस पीड़ित लगातार उस दिन को याद करते हैं जब गैस त्रासदी के बाद एंडरसन भोपाल आया था, उसे नजर बंद किया गया था। बाद में भोपाल के एसपी-कलेक्टर के द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के निर्देश पर एयरपोर्ट छोड़ा गया, जहां से वह अमरीका रवाना हो गया था।

40 साल के बाद यदि इस बात का मूल्यांकन किया जाए कि इस घटना का दोषी कौन है? तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस और भाजपा जिनकी सरकारें रही हैं उन्होंने गैस पीड़ितों एवं भोपाल के नागरिकों के स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं की न तो चिंता की और न ही गैस पीड़ितों को उचित मुआवजा दिलाया। सभी न्यायालय में (भोपाल न्यायालय, जबलपुर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ) तीनों जगह तमाम मुकदमें इन्हीं मुद्दों को लेकर चल रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने गैस पीड़ितों को मुआवजा देने का निर्णय करने के लिए सभी शक्तियां अपने हाथ में ले ली थीं।
गैस पीड़ितों को 25 हजार रुपया दिया गया था। गैस पीड़ितों में भी तमाम गैस पीड़ितों को मुआवजा नहीं मिला है । भोपाल के 56 गैस पीड़ित वार्डों को 36 वार्डों में सीमित कर दिया गया था। अमरीका में मौत का मुआवजा 5 लाख डॉलर दिया जाता है (1 डालर = 85 रूपये) इसका अर्थ यह है कि अमरीकी और भारतीय नागरिक की जान की कीमत में लाखों गुना का अंतर भारत और अमरीका का न्यायालय दोनों स्वीकार करते हैं।
2 और 3 दिसंबर 2024 को जब मैं गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के कार्यक्रमों में गया तब मैंने पाया कि वहां गैस पीड़ित पांच गुना मुआवजे की मांग कर रहे हैं। जब मुआवजा दिया गया था तब 1 डालर की कीमत 15 रूपए थी, अब 85 रूपए हो चुकी है।
सर्वोच्च न्यायालय में गैस पीड़ितों की ओर से केस लड़ रहे एड एन डी जयप्रकाश की ओर से मुआवजा राशि आज की दर से 7 लाख रुपए हर गैस पीड़ित को दिए जाने की मांग की जा रही है।
आज भोपाल में गैस पीड़ितों को श्रद्धांजलि स्वरुप अवकाश दिया जाता है, शासकीय कार्यक्रम भी होते हैं। जिसमें सरकार के मंत्रियों के अलावा राज्यपाल भी शिरकत करते हैं। यादगार-ए-शाहजहांनी पार्क में गैस पीड़ितों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले अब्दुल जब्बार सतत कार्यक्रम आयोजित करते थे। उनकी मौत के बाद भी कार्यक्रमों का सिलसिला जारी है लेकिन भागीदारी बहुत सीमित हो गई है। कल और आज जो प्रदर्शनी लगाई गई थी, उसे 100 से 150 लोगों ने देखा। उसमें क़रीब 50 युवा और बच्चे थे जिन्हें उनके बुजुर्ग साथ लेकर आए थे।
मुझे लगता है कि हम बेहद संवेदनहीन समाज और दुनिया में जी रहे हैं।
फिलिस्तीन में 3 लाख फिलिस्तीनियों के इजरायल द्वारा नरसंहार किए जाने के खिलाफ कहीं उस तरह का आक्रोश और मानवीय प्रतिक्रिया दिखाई नहीं पड़ती जैसी दिखाई देनी चाहिए।
भोपाल में भी यही हाल है। ऐसा लगता है जैसे भोपाल के आम नागरिकों को भोपाल त्रासदी से कोई लेना-देना ही नहीं है जबकि सच यह है कि जो भी भोपाल में रहते हैं और यहीं का पानी पीते हैं, वें जहरीले कचरे से प्रदूषित पानी पी रहे हैं।
अब केवल न्यायालय पर उम्मीद टिकी हुई है। हालांकि इसी न्यायपालिका ने गैस त्रासदी के पीड़ितों को अभी तक स्वास्थ्य संबंधी इंतजाम तक सुनिश्चित नहीं किए हैं, पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की है। विधायिका (मध्य प्रदेश की विधानसभा, भारत की संसद दोनों) ने यदा कदा गैस त्रासदी में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी है लेकिन उनके स्वास्थ्य, पुनर्वास, प्रदूषण संबंधी समस्याओं की उपेक्षा की है । कार्यपालिका अपना पल्ला केवल यह कहकर झाड़ लेती है कि जो निर्देश आएगा उसका पालन करेंगे। मीडिया ने लंबे समय तक इस मुद्दे को उठाया लेकिन आज गैस त्रासदी की चर्चा दो-तीन दिसंबर तक ही सीमित होकर रह गई है।
गैस पीड़ितों को कब तक न्याय पाने के लिए इंतजार करना होगा? कितने दिनों तक आंदोलन करना होगा और कितने गैस पीड़ितों को इलाज के अभाव में मरते देखना होगा ? क्या युवा पीढ़ी इन चुनौतियों से मुकाबला करने के लिए आगे आएगी? यह सवाल अनुत्तरित है। हमें इन सवालों का जवाब पाने के लिए कब तक इंतजार करना होगा?
डॉ सुनीलम
राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति
8447715810





