सुसंस्कृति परिहार
हमारे समाज में जिन सीता के आदर्शों से प्रेरणा लेने की बात की जाती रही है वे तुलसीकृत रामचरितमानस की सीता हैं।जैसा कि हम सभी जानते हैं कि बाल्मीकि कृत रामायण की मूल कथाओं को ही आधार मानकर रामचरितमानस मानस का लोकप्रिय रूप सामने आया है । रामायण बाल्मीकि की समकालीन रचना है और संपूर्ण घटनाक्रम से लेखक सीधे बावस्ता हैं इसलिए वह सच्चाई के ज़्यादा करीब है ।
बाल्मीकि रामायण की जानकी सीधी-सादी मूक पति का आंख मूंदकर अनुसरण करने वाली पत्नी नहीं है बल्कि वह एक जागरूक,साहसी,दृढ़, न्यायप्रिय, निर्भीक,तर्क करने वाली, जबरदस्त मनोबल से परिपूर्ण, उच्च संस्कार से सम्पन्न मुखर, स्वाभिमानी एवं शालीनता से ओतप्रोत,पति की प्रगति में सहयोगी तत्कालीन युग की महत्त्वपूर्ण नारी थी।जिनका स्मरण और पुनर्पाठ की आज बहुत ज़रूरत है ।
यही वजह है बाल्मीकि ने रामायण को राम का अयन नहीं बल्कि रामा यानि सीता का अयन माना है और प्रारंभ में सीताया: पतये नम:कहते हैं । लोकजीवन भी इसे स्वीकारता है और सीताराम कहकर अभिवादन करता है ।कहने का आशय यह कि लोकजीवन का विवेक भी सीता को राम से आगे रखता है । लोकजीवन का यही विवेक रामभक्त विभीषण को जिसका तिलक स्वत:राम करते हैं ,को घर का भेदी कहकर जयचंद और मीर जाफर के बगल में ला खड़ा करता है । वहीं सीता को राम से बड़ा योद्धा अपनी लोककथाओं और लोकगीतों में घोषित करता है ।महारावण के रक्तबीज से जब राम प्रयासरत होते हैं तो सीता का स्मरण करने पर वे महाकवि का के रूप में प्रकट होकर महारावण का वध कर ख़ून को अपने पारंपरिक में लेकर पी जातीं हैं तब जाकर महारावण का अंत होता है ।पस्त परे रावन सेन रघुवर /याद करें सीता खों रघुवर /चली करन कल्यान महाकाली कालिका लोकगीत इस प्रसंग की याद सामने ले आते हैं ।
कहते हैं,जनक ने सीता को कुछ काम करते समय बांये हाथ से शिव धनुष उठाते देख लिया था तभी से उन्होंने प्रतिज्ञा की थी जो व्यक्ति उस धनुष को उठायेगा उसी से सीता का वरण होगा ।वह धनुष साधारण नहीं था ।धनुष के बारे में कहा जाता है-भूप सहस्त्र दस बारबाला ,लगे उठाव टरे ना टारा ।
ये दोनों प्रसंग जन जन में सीता को अद्वितीय शक्तिशालिनी सिद्ध करते हैं । बाल्मीकि रामायण में जानकी पहली बार तब बोलती हैं जब राम वन गमन के अवसर पर उनके साथ जाने की अनुमति चाहतीं हैं पति के मुख पर दुख की छाया देखकर वे कहतीं हैं प्रभु आपको क्या हो गया है वे वनवास की खबर से ज़रा भी उदास नहीं होती न और राम की देखभाल,रास्ते की बाधाओं को दूर करने तथा उन्हें सब तरह से प्रसन्न रखने के लिए वन जाने की उत्सुकता जाहिर करतीं हैं ।जब राम वन की कठिनाईयों को विस्तार से बताकर अपने साथ ले जाने में अनिच्छा व्यक्त करते हैं तब वे राम को सहज प्रसन्नता के साथ सहसा ये भरोसा दिलाती हैं कि वे वन में किसी तरह का भार नहीं बनेगी न । बहुत समझाने पर भी राम जब उनकी बात नहीं मानते तो वह अकाट्य तर्क देते हुए कहती हैं–यदि मेरे पिता को पता होता कि राम इतने डरपोक हैं तो वे मेरा विवाह ना करते ।इस बात पर राम चुप हो जाते हैं और अपने साथ वन ले जाने सहमत हो जाते हैं इससे यह स्पष्ट होता है कि जानकी स्वभावत:कम बोलने पर भी अवसर पड़ने पर विनम्रता के साथ दृढ़ता दिखा सकने वालीं साहसी महिला हैं । जानकी अपने सभी कामों के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना से युक्त होने पर भी राम का अनुकरण नहीं करतीं । उनका अपना व्यक्तित्व है वह राम के कामों पर शंका उत्पन्न होने पर उसे कहने में भी संकोच नहीं करतीं उदाहरण स्वरुप जब राम दंडकारण्य से सभी दानवों को नष्ट करने की प्रतिज्ञा करते हैं तो वह बड़ी नम्रता और शिष्टता से पूछती हैं कि ऐसे निरीह प्राणियों को जो उन्हें हानि नहीं पहुंचा रहे हैं, नष्ट करना कहां तक न्याय संगत है ?
सीता वनवास के समय अपनी सुरक्षा के विषय में नहीं वरन अपने पति राम तथा उनके भाई लक्ष्मण के लिए चिंतित रहती हैं क्योंकि उन्हें उनके कारण कष्ट जो उठाना पड़ रहा है । दंडक वन में सबसे पहले उनको विराध नामक राक्षस का सामना करना पड़ता है यह राक्षस पहले जानकी को उठाकर ले जाता है फिर राम लक्ष्मण को विरोधी पाकर जानकी को छोड़ देता है और दोनों राजकुमारों को ले जाने की कोशिश करता है । इस संकट के वक्त में सीता उस राक्षस से अनुरोध करतीं हैं -कि वह दोनों राजकुमारों को छोड़कर स्वयं उन्हें ले जाए असामान्य मनोबल वाली सीता के अतिरिक्त कोई भी साधारण महिला इस प्रकार की बात नहीं कह सकती ।
जानकी स्वभाव से निर्भीक हैं जब रावण बुरे उद्देश्य से भेष बदलकर उनके पास आता है तो वह उसे सचमुच साधु मानकर उसके साथ उसी प्रकार व्यवहार करती हैं। उसे आदर सहित कंदमूल फल भेंट करके अपने पति के लौट आने की बात कहती हैं जब रावण अपने साधु रूप में प्रकट होकर उनका अपहरण करने की कोशिश करता है तब भी वह उससे साधु के समान व्यवहार करने तथा अपने जीवन को रावण के हाथों खतरे में ना डालने का अनुरोध करती हैं ।सेवा में भी वह इसी भाव को बनाए रखता है जब रावण अपने को राम से अधिक श्रेष्ठ दिखाकर उन्हें प्रभावित करने की चेष्टा करता है तब भी वह उसे उचित उत्तर देने में संकोच नहीं करती तथा उसे दुर्व्यवहार के दुष्परिणाम से सावधान करती हैं । वे बराबर उसे साधु ही संबोधित करती हैं वास्तव में ऐसे व्यक्ति को साधु शब्द से संबोधित करने के लिए उच्च संस्कार से संपन्न होना आवश्यक है ।
हनुमान जब जानकी को देखते हैं तब जानकी की दृष्टि हनुमान पर नहीं पड़ती ।जानकी की दृष्टि को अपनी ओर आकृष्ट करने में हनुमान को 15 सर्गों के अंतराल की प्रतीक्षा करनी पड़ती है । इस अवधि में हनुमान की मानसिक दशा कैसी रही होगी? जब जानकी हनुमान को देख लेती है तब हनुमान सावधानीपूर्वक अपना परिचय देते हैं विश्वास अर्जित कर लेने तथा यही जानकी है यह जान लेने के बाद हनुमान उन्हें कंधे पर बैठाकर राम के पास ले जाने का प्रस्ताव रखते हैं ।जानकी इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर देती हैं और कहती हैं कि रावण जिस ढंग से उन्हें उठाकर ले आया है उसी तरह उनका यहां से भागना उचित नहीं है ,उचित यही है कि राम रावण का सामना करें। उन्हें सामर्थ्य और शालीनता से प्राप्त करें । जानकी का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह दूसरे का बुरा नहीं सोचतीं, चाहे वह कितने ही बुरे विचारों वाला क्यों ना हो !राम के विषय में चिंतित होने पर लक्ष्मण के प्रति बोले गए कठोर शब्दों के लिए बार-बार वे पछताती हैं ।कभी वे अनुनय करती हैं कियह दुखद स्थिति उनके दुर्भाग्य और बुरे बर्ताव के कारण बनी है । दूसरों की गलतियों को बुलाकर उन्हें क्षमा करने के लिए वे सदैव तत्पर रहती हैं ।
राम जब सीता से कहते हैं कि चाहे जो कुछ भी हुआ हो लंका में 1 वर्ष रहने के बाद मैं तुम्हें अपनाने तथा अयोध्या ले जाने तैयार नहीं हूं । मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया अब अपनी इच्छा अनुसार कहीं भी जाने के लिए तुम स्वतंत्र हो ।अपने पति की निर्मम और कठोर टिप्पणी की प्रतिक्रिया स्वरूप राम के विलक्षण व्यवहार पर वे आश्चर्य प्रकट करतीं हैं और कहती हैं- यदि आपको वास्तव में मेरी पवित्रता और चरित्र पर संदेह है तो हनुमान के माध्यम से यही क्यों नहीं कहला दिया इससे आप और मेरे लिए लड़ने वाले ये सारे लोग शारीरिक और मानसिक यातना से बच जाते वे राम से स्पष्ट रूप से कहती हैं कि आश्चर्य है कि आप मुझ में केवल दुर्बलता, चंचलता तथा अवगुणों से पूर्ण एक साधारण स्त्री को ही देख पाए वे उनकी दया के लिए प्रार्थना नहीं करती । वे इस दुनिया में सबसे अधिक पवित्र तत्व अग्नि से शरण मांगती है वे सोचती हैं कि जो कठोर वचन उनसे कहे गए उससे अग्नि ज्यादा भयंकर नहीं हो सकती । अयोध्या की अफवाह के आधार पर राम की बहन शांता द्वारा चुगली पर आसन्न प्रसवा फिर वन भेज दी जाती है । वही भेजने के लिए लक्ष्मण झूठ का सहारा लेते हैं- बकौल बुंदेली कवि हरदयाल -गए लखन सिया महल में बोले वचन उचार /तुम्हें बुलाए जनक नृप हो जाओ तैयार लेकिन सीता बनवास की प्रतिक्रिया में तीनों माताएं प्राण त्याग देती हैं जबकि राम के वनवास पर माताओं ने ही नहीं पिता ने देह त्यागी लेकिन सीता की स्थिति ज्यादा मजबूत है ।अपराध बिन वनवास सिधारी/तज दए प्रान तीनहुं महतारी ।भरत भी विरोध करते हैं- रघुनाथ खों समझावे भरत रो रो कें / भर रहे सांस खों /और जनमानस बई रए हैं रोए /हाट बाट तोर दए। इतना ही नहीं मिथिला निवासियों की अयोध्या से नफरत देखिए जो आज भी मौजूद है वे पश्चिम की तरफ अपनी पुत्रियों का विवाह नहीं करते । सीता के कष्टमय जीवन के परिणाम स्वरूप जनमानस में सीता नाम रखना भी अच्छा नहीं मानते ।बंगाल और मिथिला में यह नाम कहीं नहीं मिलता। वनवास के दौरान वाल्मीकि आश्रम में रहकर सीता पुत्रों को जन्म देकर भली-भांति उनका पालन करती हैं ।जब राम के दरबार में वे पुत्रों सहित जाती हैं तब भी दया की भीख नहीं मांगतीं ।वे राजाराम की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देना चाहती और पृथ्वी मां से निर्भीक होकर अनुरोध करती हैं कि वह अपनी बेटी को शाश्वत शरण और शांति प्रदान करे । वह पृथ्वी से जन्मी पृथ्वी में समा जातीं हैं ।
कहना होगा कि रामचरितमानस को यदि छोड़ दें तो मूल रामायण और लोकमानस में सीता का स्थान राम से कहीं ज्यादा ऊंचा है ।यही वजह है कि अहिल्या, द्रौपदी, तारा ,मंदोदरी के साथ हैं जो कि मानव संस्कृति के इतिहास की पांच महा कन्याओं में स्थान प्राप्त कर सकीं शायद इसीलिए वाल्मीकि ने स्वयं कहा है -सीताश्चरितम महत् ।





