वैसे उनको बाबा कहना गलत है
(और शायद उन्हें भी यह संबोधन बुरा लगे)
बस लगते हैं बाबा-से
अपनी वेशभूषा और फक्कड़पन की वजह से
सादा कुर्ता-पाजामा,झोला और हवाई चप्पल
इन्होंने आईआईटी में पढ़ाई ही नहीं की
वहाँ के बच्चों को पढ़ाया भी है
(रघुराम राजन तो उनमें से एक थे)
विदेश में भी ऊँची पढ़ाई की लेकिन
अंग्रेज़ीयत और अंग्रेज़ी से उन्हें नफ़रत है
हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं से मुहब्बत है
पर वो राष्ट्रवाद की संकीर्णता से भी परे हैं
उनके लिये समाज महत्वपूर्ण है

अत्यंत सादगी से रहते हैं
आदिवासियों के बीच
उन्हीं की तरह जंगलों में
लकड़ी काटते हैं,पत्ते बीनते हैं
पेड़ लगाते हैं,खेती में हाथ बँटाते हैं
बच्चों को पढ़ाते हैं,साईकल चलाते हैं
वही खाते हैं जो गाँव वाले खिलाते हैं
मचान पर सोते हैं
एक तरह से तपस्वी ही कह सकते हैं
आलोक सागर जी को
(उन्होंने कोई नाम नहीं बदला क्यूँकि
उन्होंने शिक्षा ली,शिक्षा दी : कोई दीक्षा नहीं)
लेकिन उनका तप
कोई धर्म या अध्यात्म नहीं है,
कैमरे से उन्हें बहुत चिढ़ है
कोई फ़ोटो खींच ले तो गुस्सा हो जाते हैं
बराबरी पर उनका जोर है
वो लोगों को स्व-राज का ढंग सिखाते है
सरकार पर निर्भरता उनको पसंद नहीं,
उनसे मिलने पर बातचीत में कोई
आईआईटी का ज़िक् करे भी तो
उसे खास तवज्जुह नहीं देते
सरकार की नज़रों में वो अर्बन-नक्सली होंगे
मेरे जैसों के दोस्त,साथी और गुरु हैं
(वैसे गुरु शब्द से भी उन्हें आपत्ति है)
न उन्होंने आधार बनवाया
न उनका कोई बैंक खाता है
वो गुमनाम ही क्रांति में लगे हैं
किसानों और मज़दूरों के साथ
हर तरह के शोषण के खिलाफ !
Jasvir Singh
आलोक जी हमारे बहुत पुराने और स्नेही मित्र हैं ।
आलोक सागर जी के बारे में विस्तृत जानकारी
इस यू ट्यूब पर देखने का कष्ट करें ।





