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*ध्यान शक्ति’दाता, मंदिर शक्ति’हर्ता*

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   ~> बिकती है आस्था, आपको लूटते हैं मंदिर 

   ~> ध्यान का विषय चारित्रिक पाखंड नहीं, आनंद 

          डॉ. विकास मानव 

हृदय को नहीं समझने से मन देह में सिमट जाता है। आस्था वह धारदार छुरी है जो मनुष्य के विवेक को खत्म कर देती है। जिसमे आस्था भर जाता है उसका विवेक मर जाता है। अब आप का दिमाग चमत्कार के बैसाखी से ही चल पायेगा। आस्था मनुष्य को दिमाग से पंगु बना देता है।

      विवेकहीन आस्था से खुलता है पतन का द्वार। इसलिए धर्म के व्यापार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि लोगों में आस्था की बात कूट कूट कर भरी जाय। आप जितना अधिक आस्थावान बनेंगे धर्म के दुकानदारी मे बिकने के लिए उतना बढ़िया सामान बनेंगे। 

       आस्था को धूर्त लोग श्रद्धा का पर्यायवाची बना के प्रस्तुत करते हैं जो कि गलत है। श्रद्धा हृदय से होती है और आस्था मन मे बसता है। आस्था मन की उपज है और श्रद्धा ज्ञान की उपज है। श्रद्धा स्वयं और सहज उत्पन्न होती है लेकिन आस्था का मन में निरूपण किया जाता और समयानुसार कुरेद कर जगाया जाता है।

       श्रद्धा का व्यवसाय नहीं हो सकता क्योंकि वह अन्तः करण की वस्तु है। लेकिन आस्था के नाम पर मनुष्य को उकसाया जा सकता है।

       साधना के समय आस्था निरीक्षण की वस्तु है, लेकिन आधुनिक धर्म में वह पालन करने की वस्तु है। ऋषि का एक अर्थ हत्यारा इसलिए होता है कि वह सत्य को सामने लाकर (गलत) आस्था की हत्या कर देता है। आधुनिक धर्म में इसका कोई भी प्रावधान नहीं रखा गया है। पत्थर के मूर्ति मे प्राण प्रतिष्ठा होती है तो बस होती है। प्रमाण मत मांगिए। यह आस्था का विषय है। 

       आज के समय में आस्था को प्रश्न और तर्क से परे रखता है लेकिन सनातन परंपरा इसके खंडन से क्षुब्ध नहीं होता है क्योंकि वह आस्था को अज्ञान की उपज मानता है। इसीलिए धर्म का एक नई परिभाषा गढ़ा जा रहा है।

      आस्था शब्द का सामाजिक प्रयोग मनुष्य के मन में दासता को बोध भरने और भाग्यवादी बनाने के लिए होता है। आस्था के वशीभूत आदमी अपने दुःख का कारण खुद को नियति को मानने लगता है। इससे राजाओं और पुजारियों द्वारा लोगों के शोषण का विरोध कम हो गया। खुद को दोषी समझने वाला शोषण और अन्याय न समझ पाता है और न बोल पाता है।

       मन्दिरों में आपकी आस्था ही तो बिकती है। आप मन्दिर जाते हैं किस लिए। भक्ति के लिए। नहीं वह तो घर में भी सकती है। आप मन्दिर जाते हैं अपनी आस्था बेचने। यह ऐसा व्यापार है कि आप बिना कुछ खरीदे ही मन्दिर में पैसा देकर आता हैं। जी हां आस्था को बेचने के लिए पैसा देना पड़ता है, प्रसाद चढ़ाना पड़ता है और बदले में आप बन जाते हैं दीन हीन भिखारी। आप भखारी बन के ही तो मन्दिर जाते हैं। 

      आप से कहा जाता है भगवान सब ठीक कर देगा। आप जानते हैं कि ठीक तो तभी होगा जब आप पूरा प्रयास करेंगे। किन्तु वह आप नहीं करेंगे। आपका दिमाग चमत्कार के बैसाखी पर टांग दिया गया है। अगर आप ने प्रयास किया और सफल हो गए तो श्रेय आपको नहीं मंदिर, दर्शन और मूर्ति को मिलेगा। 

      मन्दिर बना है आपका पुरुषार्थ हरण करने करने के लिए। विवेक हरण आस्था ने किया और पुरुषार्थ हरण मन्दिर ने कर लिया। अब आप हो गए बाबाओं और पुजारियों के हवाले। आब आप अपना ही शोषण करबाने के सामान बन गए। धर्म मन्दिर और सत्ता ही वह त्रिमूर्ति है जो मनुष्य का निरन्तर शोषण करता है। इसलिए हमेशा सत्ता ही मन्दिर निमार्ण करवाता है।

     जैसे ही आप शोषण करवाने के लिए तैयार हो गए आपको आस्तिक और धार्मिक कह के सम्मानित किया जाएगा। अब आप अपने नाम के आगे दास जोड़े या न जोड़े आप गुलाम बन चुके हैं। इतिहास गवाह है कि सुधार और विकास के लिए सत्ता से पहले मन्दिर के खिलाफ विद्रोह हुआ क्योंकि सत्ता को शोषण करने का बल मन्दिर और पुजारी से मिलता है।

*चरित्र नहीं, पौरुष और आनंद है ध्यान :*

      ध्‍यान क्या है? ध्यान तुम्हारा चरित्र नहीं है; वह तुम्हारा आचरण नहीं है। तुम जो करते हो वह ध्यान नहीं है। ध्यान तो वह है जो तुम हो। ध्यान आचरण नहीं है; ध्यान वह चेतना है जिससे तुम अपने आचरण को देखते हो, अपने कृत्य के साक्षी होते हो। कृत्य गौण है। महत्वपूर्ण यह है कि तुम उसे होशपूर्वक कर रहे हो या बेहोशी में। कृत्य चाहे नैतिक हो या अनैतिक, तुम अगर उसके प्रति सजग हो, होशपूर्ण हो, तो तुम ध्यान में हो। और अगर तुम उसके प्रति सजग नहीं हो तो तुम सोए हो, गैर— ध्यान में हो।

      तुम खूब सोए—सोए भी नैतिक हो सकते हो, उसमें कोई कठिनाई नहीं है। गहरी नींद में होने के लिए नैतिक होना बेहतर है, क्योंकि तब समाज तुम्हें कोई बाधा नहीं देगा; तब कोई भी तुम्हारे विरोध में नहीं होगा। तुम आराम से सो सकते हो; समाज उसमें तुम्हें सहयोग भी देगा।

      तुम ध्यानी हुए बिना भी नैतिक हो सकते हो; लेकिन उस नैतिकता के ठीक पीछे अनैतिकता खड़ी रहेगी। अनैतिकता तुम्हारी छाया की तरह तुम्हारे पीछे—पीछे चलेगी। और तुम्हारी यह नैतिकता सतही होगी, क्योंकि यह नैतिकता तुम पर नींद में ही बाहर से लादी जा सकती है। वह नैतिकता नकली होगी, झूठी होगी, पाखंड होगी। वह तुम्हारा कभी प्राण नहीं बनेगी। बाहर—बाहर तुम नैतिक रहोगे, लेकिन भीतर— भीतर तुम अनैतिक बने रहोगे। और तुम बाहर—बाहर जितने नैतिक होगे, भीतर— भीतर उतने ही अनैतिक होगे। अनुपात सदा समान होगा। कारण यह है कि तुम्हारी नैतिकता एक गहन दमन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती है। 

      नींद में तुम और कुछ नहीं कर सकते, सिर्फ दमन कर सकते हो। इस नैतिकता के चलते तुम झूठे हो जाओगे, पाखंडी हो जाओगे। तुम एक व्यक्ति नहीं रहोगे, बस एक मुखौटा, एक ढोंग बन जाओगे। और उसका परिणाम दुख होगा, संताप होगा। और तुम सदा एक ज्वालामुखी पर बैठे होगे, जो किसी भी समय फूट सकता है। जो कुछ भी तुमने अपने भीतर दबा रखा है, उसका विस्फोट अनिवार्य है; वह सदा फूटने को तत्पर ही है। और यदि तुम सोए—सोए ईमानदारी से नैतिक होने की चेष्टा करोगे तो तुम सकता। पाखंड का वही मतलब है। पाखंडी सिर्फ नैतिक होने का दिखावा करता है, नैतिक होता नहीं। और वह अनैतिक होने के परोक्ष उपाय खोज लेता है, ऊपर—ऊपर वह सदा नैतिक बना रहता है या नैतिक होने का ढोंग करता है। केवल तभी तुम पागल होने से बच सकते हो, अन्यथा पागलपन तुम्हारी नियति है।

      यह जो तथाकथित नैतिकता है इसमें दो ही विकल्प होते हैं विक्षिप्तता या पाखंड। अगर तुम ईमानदार हो तो पागल हो जाओगे। और अगर तुम बेईमान हो तो तुम पाखंडी हो जाओगे। जो लोग चतुर—चालाक हैं, वे पाखंडी हो जाते हैं। और जो सरल और निष्ठावान हैं, जो ऐसी शिक्षाओं के शिकार हो जाते हैं, वे पागल हो जाते हैं।

      नींद में, मूर्च्छा में, सच्ची नैतिकता संभव नहीं है। सच्ची नैतिकता का क्या अर्थ है? सच्ची नैतिकता ऊपर से लादी या ओढी नहीं जाती है, वह तुम्हारे प्राणों की सहज और स्वाभाविक खिलावट होती है। और सच्ची नैतिकता अनैतिकता के विरोध में नहीं होती; सच्ची नैतिकता अनैतिकता की अनुपस्थिति भर होती है। वह विरोध में नहीं होती है।

        उदाहरण के लिए, तुम्हें सिखाया जा सकता है कि अपने पड़ोसी को प्रेम करो, कि सबको प्रेम करो, कि प्रेमपूर्ण बनो। यह शिक्षा तुम्हें एक तरह की नैतिकता दे सकती है, लेकिन भीतर घृणा कायम रहेगी। तुम अपने को जबरदस्ती प्रेमपूर्ण बनाने की कोशिश कर सकते हो, लेकिन जबरदस्ती लाया हुआ प्रेम सच्चा नहीं हो सकता, प्रामाणिक नहीं हो सकता। इस प्रेम से न तुम परितृप्त होंगे और न वह परितृप्त होगा जिसे तुम प्रेम देते हो। झूठे प्रेम से कोई भी परितृप्त नहीं होने वाला है।

      यह प्रेम झूठे पानी जैसा है; झूठे पानी से किसी की प्यास शात नहीं हो सकती। घृणा मौजूद है, और घृणा सतत प्रकट होने को आतुर है। और झूठा प्रेम इस घृणा को रोकने में असमर्थ है। बल्कि घृणा तुम्हारे झूठे प्रेम में प्रविष्ट होकर उसे भी विषाक्त कर देगी; तुम्हारा प्रेम एक तरह की घृणा बनकर रह जाएगा। यह पूरा मामला चालबाजी से भरा है।

       सच्ची नैतिकता तो उसी आदमी को घटित होती है जो अपने भीतर की गहराई में उतरता है। और तुम जितने गहरे उतरते हो उतने ही प्रेमपूर्ण होते जाते हो। यह प्रेम घृणा के विपरीत आरोपण नहीं है; यह प्रेम घृणा के विरोध में नहीं है। इसका घृणा से कुछ लेना—देना नहीं है, घृणा से इस प्रेम का कोई संबंध ही नहीं है। तुम अपने में जितने गहरे जाते हो, उतना ही ज्यादा प्रेम तुमसे प्रवाहित होता है। और जिस क्षण तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाते हो, तुम किसी नैतिक धारणा के बिना ही प्रेमपूर्ण हो जाते हो। तब तुम्हें इसकी खबर भी न होगी कि मैं प्रेमपूर्ण हूं। 

      तुम्हें इसकी खबर कैसे होगी? यह प्रेम इतना सहज और स्वाभाविक होगा; यह प्रेम बस श्वास लेने जैसा होगा; यह प्रेम तुम्हारे पीछे चलने वाली छाया की भांति होगा।

     ध्यान-तंत्र अंतर्यात्रा सिखाता है। नैतिकता घटित होगी; लेकिन वह प्रयास नहीं, परिणाम होगी। इस भेद को ठीक से समझ लो। तंत्र कहता है कि नैतिक और अनैतिक धारणाओं के चक्कर में मत पड़ो; वे बाहरी बातें हैं। अंतर्यात्रा करो। और ये अंतर्यात्रा की विधियां हैं। नैतिक—अनैतिक, शुद्ध—अशुद्ध की फिक्र मत करो, भेद मत खड़े करो। भीतर की यात्रा करो; बाहर की दुनिया को, समाज को, समाज की सारी शिक्षाओं को भूल जाओ। समाज जो भी सिखाता है वह द्वैत मूलक होगा ही। इसलिए उससे द्वंद्व और दमन का पैदा होना अनिवार्य है। और यदि द्वंद्व है तो तुम अंतर्यात्रा नहीं कर सकते।

        द्वंद्व को भूल जाओ, और उस सबको भी भूल जाओ जो द्वंद्व पैदा करता है। सिर्फ भीतर चलो। तुम जितने ज्यादा भीतर जाओगे उतने ही ज्यादा नैतिक होंगे। लेकिन यह नैतिकता समाज की नैतिकता नहीं होगी। तुम नैतिक हुए बिना नैतिक होंगे; तुम्हें अपने नैतिक होने का बोध भी नहीं होगा। क्योंकि तुम्हारे भीतर इस नैतिकता के विपरीत कुछ नहीं होगा। तुम बस प्रेमपूर्ण होगे, क्योंकि जब तुम प्रेम में होते हो तो तुम आनंद में होते हो। यह प्रेम स्वयं अपने आप में आनंद है। इसका कोई लक्ष्य भी नहीं है। यह प्रेम किसी फल की आकांक्षा नहीं करता है। ऐसा नहीं है कि यदि प्रेम करोगे तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। यह सौदा नहीं है।

       जो नैतिकता समाज सिखाता है, जो नैतिकता तथाकथित धर्म सिखाते हैं, वह सौदेबाजी ही है। वे कहते हैं कि यह करोगे तो वह मिलेगा और यह नहीं करोगे तो वह नहीं मिलेगा। वे सजा की धमकी भी देते हैं। यह सौदेबाजी है।

      ध्यान-तंत्र की नैतिकता सौदेबाजी नहीं है, वह एक घटना है। तुम जैसे—जैसे भीतर उतरते हो, वैसे—वैसे तुम क्षण में, वर्तमान में जीने लगते हो। तब तुम समझते हो कि प्रेम करना आनंद है। प्रेम किसी का साधन नहीं है, वह अपने आप में साध्य है। प्रेम पर्याप्त है। तुम प्रेम करते हो, क्योंकि प्रेम तुम्हें आनंद से भर देता है। तुम किसी पर उपकार नहीं कर रहे हो, तुम किसी पड़ोसी के लिए यह नहीं कर रहे हो, प्रेम करने में तुम्हें स्वयं ही सुख होता है। प्रेम तुम्हें अभी और यहीं शुभ से भर देता है। भविष्य में कोई स्वर्ग या नर्क नहीं मिलनेवाला है; अभी ही यह प्रेम स्वर्ग निर्मित कर देता है, और परमात्मा का राज्य तुममें प्रवेश कर जाता है। और यही बात सभी शुभ गुणों के लिए सही है; वे सहज ही तुममें खिलते हैं।

अब हम इस प्रश्न को देखें. ‘क्या यह सच नहीं है कि अनैतिक जीवन ध्यान में बाधा पहुंचाता है?’

       असल में सचाई ठीक इसके विपरीत है, ध्यानपूर्ण जीवन अनैतिक जीवन में बाधा पहुंचाता है। अनैतिक जीवन क्या बाधा पहुंचा सकता है? अनैतिक जीवन का अर्थ है कि तुम ध्यानपूर्ण नहीं हो; उसका कोई और अर्थ नहीं है। तुम गहरी नींद में हो। और यही कारण है कि तुम अपने को नुकसान पहुंचा रहे हो।

      ध्यान-तंत्र के लिए बुनियादी बात ध्यान है, सजगता है, बोध है। इससे ज्यादा और कोई चीज बुनियादी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति अनैतिक है तो इससे इतना ही प्रकट होता है कि वह सजग नहीं है, सावचेत नहीं है। यह एक लक्षण मात्र है; अनैतिक होना इस बात का लक्षण है कि व्यक्ति सचेत नहीं है। ऐसी स्थिति में साधारणत: तुम्हें क्या शिक्षा दी जाती है?

       साधारण शिक्षक इस सोए व्यक्ति को, जो कि अनैतिक है, कहेंगे कि तुम नैतिक बनो। और वह अनैतिक से नैतिक बन भी जा सकता है; लेकिन उसकी नींद जारी रहेगी। और इस तरह सारा श्रम व्यर्थ चला जाता है, क्योंकि असली बीमारी अनैतिकता नहीं थी, अनैतिकता तो लक्षण मात्र थी। असली बीमारी थी नींद, मूर्च्छा। मूर्च्छित होने के कारण वह अनैतिक था। तुम उसे नैतिक नहीं बना सकते हो। तुम उसे भयभीत कर सकते हो; लेकिन तुम मूर्च्छित आदमी को ही भयभीत कर सकते हो। सजग व्यक्ति को तुम भयभीत नहीं कर सकते। तुम नर्क का भय पैदा कर सकते हो तो स्‍वर्ग का लोभ पैदा कर सकते हो। लेकिन भय और लोभ नींद में ही काम करते हैं, जाग्रत व्यक्ति को न भयभीत किया जा सकता है और न प्रलोभित ही किया जा सकता है। ये दोनों चीजें मूर्च्‍छित चित्त के लिए ही अर्थ रखती हैं।

       दंड का भय दो, और अनैतिक आदमी नैतिक होने लगेगा। लेकिन वह भय के कारण नैतिक होगा। वैसे ही उसे कोई लोभ दो, और वह नैतिक होने लगेगा। लेकिन यह बदलाहट लोभ के लिए, लाभ के लिए की जाएगी। लोभ और भय नींद के ही हिस्से हैं; आदमी की नींद जारी रहती है। उनसे कभी कोई बुनियादी बदलाहट नहीं होती है।

      यह सही है कि ऐसा आदमी समाज के लिए उपयोगी हो जाता है। समाज के लिए अनैतिक आदमी समस्या है, नैतिक आदमी नहीं। भय या लोभ से पैदा हुई नैतिकता से समाज की समस्या तो हल हो जाती है, लेकिन व्यक्ति की समस्या जहां की तहां रहती है; वह सोया ही रहता है। वह अब समाज के लिए सुविधाजनक हो जाता है, पहले वह समाज के लिए उपद्रव खड़ा करता था।

      इस तथ्य पर गौर करो। एक अनैतिक आदमी समाज के लिए उपद्रव है, लेकिन वह स्वयं के लिए सुविधाजनक है। और एक नैतिक आदमी समाज के लिए तो सुविधाजनक हो जाता है, लेकिन वह स्वयं के लिए उपद्रव हो जाता है। इससे इतना ही होता है कि सिक्के को उलटा कर लिया गया।

     यही कारण है कि अनैतिक आदमी प्रसन्न और प्रफुल्लित दिखता है, और नैतिक आदमी गंभीर, उदास और बोझिल नजर आता है। अनैतिक आदमी समाज से लड़ रहा है, और नैतिक आदमी स्वयं से लड़ रहा है। अनैतिक आदमी भी थोड़ा चिंतित है, क्योंकि उसे पकड़े जाने का डर है। उसे डर तो है, लेकिन वह सुख भी भोग रहा है। अगर वह पकड़ा न जाए, अगर उसे पकड़े जाने का डर न हो, तो वह मजे में है। लेकिन नैतिक आदमी स्वयं के साथ संघर्ष कर रहा है; उसका अपना कुछ भी ठीक नहीं है। ही, समाज के साथ उसका सब ठीक—ठाक चलता है।

       नैतिकता समाज के लिए तेल का काम करती है; समाज की गाड़ी चलती रहती है। इससे दूसरों के साथ तुम्हारा जीवन आराम से चलता है। लेकिन तब तुम्हें स्वयं के साथ बेचैनी अनुभव होने लगती है। बेचैनी बनी ही रहती है—चाहे यह बेचैनी समाज के साथ हो या स्वयं के साथ। बेचैनी तो तभी जा सकती है जब तुम जाग जाते हो, प्रबुद्ध हो जाते हो।

       ध्यानतंत्र बुनियादी बीमारी की फिक्र करता है, लक्षणों की नहीं। नैतिकता लक्षणों को हटाने में लगती है। तंत्र कहता है. ‘नैतिक या अनैतिक धारणाओं की चिंता मत लो।’ इसका यह अर्थ नहीं है कि तंत्र तुम्हें अनैतिक होने को कहता है। तंत्र तुम्हें अनैतिक होने को कैसे कह सकता है जब कि वह तुम्हें नैतिक होने को भी नहीं कहता है!

      ध्यानतंत्र यह कहता है कि नैतिक—अनैतिक की पूरी बहस बेकार है; उसे छोड़ो और समस्या की जड़ को पकड़ो। नैतिक—अनैतिक होना मात्र लक्षण है, उसे छोड़ो और जड़ को देखो। और जड़ यह है कि तुम नींद में हो, गहरी नींद में हो।

  इस नींद के ढांचे को कैसे तोड़ा जाए? कैसे सावचेत हुआ जाए? और कैसे फिर—फिर नींद में गिरने से बचा जाए? तंत्र इसकी चिंता लेता है; तुम्हारी नींद को तोड़ने और तुम्हारे बोध को जगाने की चिंता लेता है। और जैसे ही तुम बोधपूर्ण होगे, तुम्हारा चरित्र रूपांतरित हो जाएगा। लेकिन वह परिणाम होगा। तंत्र कहता है कि तुम्‍हें परिणाम की भी फिक्र नहीं लेनी है। वह परिणाम है; वह अनिवार्यत: आता है। 

      तुम्हें उसके लिए न चिंता लेनी है और न ही कुछ करना है। बोध के आते ही चरित्र की बदलाहट अपने आप ही घटित होती है। तुम जितने सावचेत होगे उतने ही नैतिक होते जाओगे। लेकिन यह नैतिकता आरोपित नहीं है; यह तुम्हारे प्रयास से नहीं आती है। तुम सिर्फ सावचेत होते हो, और यह स्वत: स्फूर्त आती है।

      एक सजग आदमी हिंसक कैसे हो सकता है? एक बोधपूर्ण व्यक्ति घृणा और क्रोध कैसे कर सकता है? यह बात विरोधाभासी मालूम पड़ती है, लेकिन यह सही है। जो व्यक्ति सोया हुआ है वह घृणा के बिना नहीं हो सकता। यह असंभव है। वह ढोंग कर सकता है कि मुझमें क्रोध नहीं है, कि मुझमें घृणा नहीं है। वह यह दावा भी कर सकता है कि मुझमें प्रेम और दया और करुणा का निवास है। ये सब उसके पाखंड के ही खेल होंगे।

      जब कोई व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध होता है तो ठीक उलटी बात घटित होती है। अगर उसे क्रोध करने की जरूरत पड़े तो वह क्रोध का सिर्फ अभिनय कर सकता है, वह सचमुच क्रोध नहीं कर सकता। वह सिर्फ क्रोध का दिखावा कर सकता है। अगर उसे कभी क्रोध करने की जरूरत पड जाए—और कभी जरूरत पड़ सकती है—तो वह क्रोध करने का नाटक करेगा। वह दुखी नहीं हो सकता, लेकिन कभी जरूरत पड़ने पर वह दुखी होने का अभिनय कर सकता है। उसके लिए ये चीजें असंभव होंगी। 

      जैसे पहले उसके लिए घृणा स्वाभाविक थी, वैसे ही अब प्रेम स्वाभाविक होगा। और जैसे पहले उसका प्रेम महज अभिनय था, वैसे ही अब उसकी घृणा एक अभिनय होगी।

     यहूदियों के बड़े मंदिर में जीसस की सूदखोरों के साथ लड़ाई एक नाटक ही थी। वे क्रोध नहीं कर सकते थे, लेकिन उन्होंने क्रोध करने का नाटक किया। वे सचमुच में क्रोधित नहीं हो सकते, लेकिन वे क्रोध का उपयोग कर सकते हैं। यह वैसा ही है जैसे तुम प्रेमपूर्ण हुए बिना प्रेम का उपयोग करते हो।

     तुम प्रेम का उपयोग किसी प्रयोजन से करते हो। तुम्हारा प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं है; तुम उसका उपयोग कुछ पाने के लिए करते हो। तुम प्रेम से धन पाने की कोशिश कर सकते हो, कामवासना की तृप्ति की कोशिश कर सकते हो। तुम अहंकार की तृप्ति के लिए प्रेम कर सकते हो; तुम किसी पर कब्जा जमाने के लिए भी प्रेम कर सकते हो। लेकिन वह प्रेम प्रेम नहीं है।

      कोई बुद्धपुरुष भी कभी क्रोध कर सकता है, अगर उसे लगे कि उससे किसी का हित होगा। प्रेम के कारण कभी बुद्धपुरुष को भी क्रोध करना पड़ सकता है। लेकिन यह क्रोध अभिनय मात्र होगा, और मूढ़ ही उसके धोखे में पड़ सकते हैं। जो जानते हैं वे सिर्फ हंसेंगे।

    ध्यानतंत्र का कहना है कि जैसे—जैसे ध्यान गहराता है, तुममें बदलाहट होने लगती है। और जो सहज घटित हो वही बदलाहट सुंदर है। जो बदलाहट तुम चेष्टा से लाओगे, कुछ करके लाओगे, वह बदलाहट कभी गहरी नहीं हो सकती है। कृत्य मात्र सतह पर है। इसलिए तंत्र कहता है कि बदलाहट को अपने प्राणों में घटित होने दो, स्वयं के केंद्र पर घटित होने दो। इसे केंद्र से परिधि की ओर बहने दो, परिधि से केंद्र पर लादने की चेष्टा मत करो। यह असंभव चेष्‍टा है।

      ध्यानतंत्र नैतिक—अनैतिक की बात ही नहीं उठाता है। बात सिर्फ इतनी है कि अगर तुम सोए हो तो अपनी नींद को तोड्ने की चेष्टा करो। तुम जहां भी हो वहीं ज्यादा से ज्यादा सजग होओ, बोधपूर्ण बनो। अगर तुम अनैतिक हो तो तंत्र कहेगा, ठीक है, हमें तुम्हारी अनैतिकता से मतलब नहीं है, हमें तुम्हारी नींद से मतलब है, और हमें यह फिक्र है कि कैसे तुम्हारी नींद को जागरण में बदला जाए। तंत्र चाहता है कि तुम अपनी अनैतिकता से मत लड़ो; बस अपनी नींद को तोड्ने की कोशिश करो। और अगर तुम नैतिक हो तो ठीक है; तब तंत्र यह नहीं कहेगा कि पहले अनैतिक होओ और फिर सजग होने की चेष्टा करो। ध्यान में उतरने के लिए न अनैतिक व्यक्ति को नैतिक होने की जरूरत है और न नैतिक व्यक्ति को अनैतिक होने की जरूरत है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि वह अपनी चेतना की गुणवत्ता में बदलाहट करे।

      तुम जहां हो—चाहे पापी हो, चाहे संत—तंत्र के लिए कोई भेद नहीं पड़ता है। अगर तुम सोए हो, मूर्च्छित हो, तो सजगता की विधियों का प्रयोग करो। और लक्षणों को बदलने की कोशिश मत करो। पापी भी बीमार है और तथाकथित महात्मा भी बीमार है, क्योंकि दोनों नींद में हैं, दोनों मूर्च्छित हैं। और नींद बीमारी है, चरित्र नहीं; चरित्र तो एक उप—उत्पत्ति मात्र है। और नींद में पड़े—पड़े तुम जो भी करोगे उससे कोई बुनियादी बदलाहट नहीं होगी। एक ही चीज तुम्हें बदल सकती है, एक ही चीज तुममें रूपांतरण ला सकती है; और वह है जागरण, वह है बोध। एक ही प्रश्न है कि कैसे अधिक से अधिक सजग हुआ जाए, सावचेत हुआ जाए।

       तुम जो कुछ भी करो, उसे अपनी सजगता का, होश का विषय बना लो। अगर तुम कोई अनैतिक काम करते हो तो उसे भी ध्यानपूर्वक करो। ज्यादा देर नहीं लगेगी जब कृत्य अपने आप ही विलीन हो जाएगा, विदा हो जाएगा। तुम उसे न कर सकोगे। और इसलिए नहीं कि तुमने जबरदस्ती अपने को रोका हुआ है, बल्कि इसलिए कि अब तुम ज्यादा होशपूर्ण हो। और तुम होश में वह काम कैसे कर सकते हो जिसे करने के लिए नींद अनिवार्य है? तुम वह काम नहीं कर सकते हो।

      ध्यानतंत्र और अन्य साधनाओं के इस बुनियादी भेद को भलीभांति समझ लो। तंत्र ज्यादा वैज्ञानिक है; वह समस्या के जड़—मूल में जाता है। तंत्र तुम्हारे चरित्र के बाहरी खोल में, तुम्हारी नैतिकता और अनैतिकता में, तुम्हारे कृत्यों में बदलाहट लाने की चेष्टा नहीं करता; वह तुम्हें जड़—मूल से रूपांतरित करता है। तुम जो करते हो वह परिधि पर है; लेकिन तुम जो हो वह कभी परिधि पर नहीं है। तंत्र के लिए कृत्य नहीं, कृत्य की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है.

एक कसाई नान—इन के पास पहुंचा। वह कसाई था, और नान—इन अहिंसा में विश्वास करने वाला बौद्ध भिक्षु था। और कसाई का पूरा धंधा हत्या करना था; सारा दिन वह जानवरों को काटता रहता था। तो जब वह नान—इन के पास आया तो उसने पूछा : ‘मैं क्या करूं? मेरा धंधा ही हिंसा का है। तो क्या मुझे पहले अपना धंधा छोड़ना होगा? क्या यह धंधा छोड़कर ही मैं नया मनुष्य हो सकता हूं? या मेरे लिए कोई दूसरा उपाय भी है?’

     नान—इन ने कहा. ‘तुम क्या करते हो इससे हमें कुछ लेना—देना नहीं है। हमें तो सिर्फ इससे मतलब है कि तुम क्या हो। इसलिए तुम जो कुछ करते हो वह किए जाओ, लेकिन ज्यादा सजग रहो। जानवरों को मारते समय सजग रहो, ध्यानपूर्ण रहो, और अपना धंधा जारी रखो। हमें तुम्हारे धंधे से कुछ लेना—देना नही है।’

      नान—इन के शिष्य तो इस बात से बहुत चिंतित हो उठे कि एक बुद्ध का अनुयायी, अहिंसा को मानने वाला, एक कसाई को अपना धंधा जारी रखने की छूट दे रहा है! एक शिष्य ने कहा : ‘यह उचित नहीं है। और हमें कभी यह अपेक्षा नहीं थी कि आप जैसा व्यक्ति एक कसाई को कसाई बने रहने की इजाजत देगा। और जब वह खुद ही पूछ रहा था तो आपको यह धंधा छोड़ने के लिए कह देना चाहिए था। वह खुद ही धंधा छोड़ने की पूछ रहा था।’

      नान—इन ने कहा : ‘तुम कसाई के धंधे को आसानी से बदलवा सकते हो; वह खुद इसके लिए राजी था। लेकिन इससे तुम उसकी चेतना की गुणवत्ता ‘को नहीं बदल सकते हो; वह कसाई का कसाई रहेगा। वह संत भी बन जा सकता है, लेकिन उसके चित्त का गुण वही रहेगा जो कसाई के चित्त का गुण है। वह संतत्व दूसरों के लिए, और उसके लिए भी, एक धोखा भर होगा।’

     जाओ और अपने तथाकथित साधु—महात्माओं को देखो। उनमें से अनेक कसाई ही रह जाते हैं। उनके रंग—ढंग में, उनके व्यवहार में, तुम्हारी ओर वे जिस नजर से देखते हैं उसमें, सब में निंदा भरी होती है, हिंसा भरी होती है। उनकी आंख तुम्हें कहती है कि तुम पापी हो और मैं पुण्यात्मा हूं। उनके देखने के ढंग में ही तुम्हारे लिए निंदा भरी रहती है, उनकी नजर तुम्हें सीधे नरक में डाल देती है।

      नान—इन ने कहा. ‘उसके बाहरी जीवन को बदलने से कोई लाभ नहीं है। उसके चित्त की गुणवत्ता बदलनी जरूरी है। और अच्छा है कि उसे कसाई ही रहने दिया जाए, क्योंकि वह अपने कसाईपन और हिंसा से बेचैन हो रहा है। अगर वह संत बन जाएगा तो वह रहेगा कसाई ही, लेकिन तब वह बेचैन नहीं होगा। उसका अहंकार और भी मजबूत हो जाएगा। तो अच्छा है कि वह कसाई ही रहे। वह अपनी हिंसा से बेचैन तो है, और उसे कम से कम यह बोध तो हो रहा है कि यह अच्छा नहीं है। वह बदलने के लिए तैयार है। लेकिन बदलने की तैयारी से ही काम नहीं चलेगा। चित्त की एक नई गुणवत्ता विकसित करनी होगी। उसे ध्यान करने दो।’

      एक वर्ष बीतने पर वह आदमी फिर नान—इन के पास आया, वह अब बिलकुल दूसरा ही आदमी था। वह अभी भी कसाई था, लेकिन कृत्य वही रहने पर भी आदमी बदल गया था। नान—इन के पास आकर उसने कहा. ‘अब मैं दूसरा ही आदमी हूं। मैंने ध्यान किया, ध्यान किया, ध्यान किया, और मेरा पूरा जीवन ही ध्यान बन गया है। आपने कहा था कि तुम जो कुछ करो, उसे ही ध्यान से करो। मैं जानवरों को काटता हूं लेकिन पूरे दिन ध्यान में डूबा रहता हूं। अब आप मुझे क्या करने को कहते हैं?’

    नान—इन ने कहा. ‘अब मेरे पास मत आओ; अपने बोध से ही चलो। तुम्हें अब मेरे पास आने की जरूरत नहीं है।’

      उस कसाई ने कहा : ‘अब अगर आप कहेंगे कि इस धंधे को जारी रखो तो मैं उसे जारी रखने का अभिनय करूंगा; लेकिन —जहां तक मेरा संबंध है मैं अब उसमें नहीं हूं। तो अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं वापस जाने वाला नहीं हूं। लेकिन यदि आप जाने को कहेंगे तो वह भी ठीक है। तो मैं अभिनय जारी रखूंगा।’

      इस तरह जब तुम्हारी गुणवत्ता बदलती है, जब तुम्हारी चेतना में रूपांतरण होता है, तो तुम सर्वथा दूसरे ही व्यक्ति हो जाते हो। और तंत्र को तुमसे मतलब है, तुम्हारे कृत्यों से नहीं।

Ramswaroop Mantri

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