~क्या है ऐसी बकबक का वेस?
~जगत मिथ्या तो जीवन क्यों?
डॉ. विकास मानव
आदि शंकर ने कहा ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या है। कब कहा, किससे कहा, क्यों कहा किसी को कुछ पता नहीं।
बड़ा अपराध कर दिया आदि शंकर ने। आदि शंकर के बाद जितने भी आए वो सभी इस जगत को मिथ्या ही साबित करने में लगे रहे। आज भी सिलसिला जारी है।
आदि शंकर एक व्यक्ति नहीं हैं। शरीर एक है पर दो धारणा के व्यक्ति हैं। पहला व्यक्ति मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया। जगत के लिए बहुत कुछ किया है। जब जगत का कार्य पूरा हुआ, तब खुद से कहा एक ब्रह्म ही सत्य है। ये दूसरा व्यक्ति है जो खुद के लिए सब कुछ कर रहा है। ये दूसरा वाला आदि शंकर खुद पर पूरी ऊर्जा लगाए हुए है। ये कह सकता है एक ब्रह्म सत्य है। पहला वाला तो जगत को ही स्थापित कर रहा था।दूसरे वाले ने बत्तीस वर्ष कि आयु में शरीर छोड़ दिया।
जब उन्होंने कहा एक ब्रह्म सत्य तो उन्होंने इस जगत को छोड़ने की दिशा में सारी ऊर्जा झौंक दी। पहले यही ऊर्जा जगत के कार्यों को संपादित कर रही थी। अब वही ब्रह्म की दिशा में गतिमान है। अब ये दूसरी दिशा का व्यक्ति है। आदि शंकर महीनों ध्यान में रहते थे, एक ब्रह्म को सत्य करने के लिए और जगत को मिथ्या करने के लिए। लेकिन ये सब खुद के लिए था। उनका जब तक काम रहा किया फिर इसे त्याग दिया। इस लाइन को ठीक से समझ लेना।
जब तक काम रहा तब तक काम किया, जगत में रहकर, जगत का काम किया। पूरे जगत में रहे। पूरे ही जगत को छोड़ दिया। आदि शंकर जब जगत में थे तब पूरे जगत में थे। जब यहाँ से गए तो पूरे ही गए। जब जगत में थे तो एक जगत सत्य था ही। जब यहाँ से गए तो एक मात्र ब्रह्म ही सत्य था। अगर कोई दूसरा सत्य होता तो व्यक्ति पूरा नहीं जा पाता।
*तुमने क्या किया है इस जगत के लिए?*
आदि शंकर ने संन्यासी होकर जगत के लिए बहुत किया है।और ये भी संदेश दिया यदि जगत के लिए कुछ करना है तो बैराग बुद्धि से ही किया जा सकता है। यही बात कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। पूरी भगवत गीता का निचोड़ भी यही है। बैराग बुद्धि से ही इस जगत का निर्माण और संचालन हो सकता है।
तुम सभी मुझे ये बताओ तुम्हारा इस जगत के लिए क्या योगदान है?
ऐसे तो ये जगत मिथ्या होने वाला नहीं है। पहले काम पूरा करना होगा तब ही यहाँ से जा सकोगे। तुम कहते हो ये जगत मिथ्या है तो छोड़ दो। तुम तो अस्सी साल सौ साल के हो गए हो फिर भी कुछ छोड़ा नहीं जा रहा है और मरने के बाद तुम्हारी भी मजार बनेगी। ये मजारें ही हैं। बहुत से महात्माओं कि समाधियाँ बनी हैं। कम से कम मरने के बाद तो छोड़ देते ?
जिस ईश्वर ने तुम्हें एक मौका दिया है। एक नहीं एक लाख मौके दिए हैं। उसका एहसान मानना तो दूर उलट उसकी आलोचना में लगे हैं। कुत्ता, बिल्ली, पेड़, पहाड़, पत्थर, गटर में कीड़ा सभी कुछ बनना स्वीकार किया लेकिन धरती नहीं छोड़ी और कहते हो ये जगत मिथ्या है।
जो लोग भी इस जगत को मिथ्या मानते हैं वो सभी शक्ति के अस्तित्व को नकारते हैं। ये शिवरात्रि, नवरात्रि, संक्रांति सब मनाते हैं। हवन पूजन करते हो तो सभी देवी देवताओं को इसी मिथ्या जगत में बुलाकर उनका यज्ञ भाग देते हो। इस जगत को मिथ्या करने के लिए शिव को भी शक्ति की आवश्यकता होती है।
शिव की खुद की क्षमता नहीं है जो बिना शक्ति के इस जगत को शून्य कर दें। सोचने में, समझने में खुद का आकलन करने में सभी जगह तो शक्ति ही है। अगर शांति है तो शक्ति है, अगर समृद्धि है तो शक्ति है, अगर संतुलन है तो शक्ति है। अगर जगत है तो शक्ति है और जगत नहीं होगा तो भी शक्ति ही है।
अगर ये जगत है तो शक्ति है और अगर ब्रह्म का अस्तित्व है तो शक्ति है। थोड़ा आँखें खोलकर देखो ब्रह्म भी तो एक दूसरे प्रकार का जगत ही है।
*हमारा कोई तर्क नहीं, शाश्वत अनुभव है :*
मैं जो व्यक्त करता हूँ वो आँखों देखा, अनुभव किया सत्य होता है. प्रमाण और तर्क तो तुम्हारी नासमझी के कारण देता हूँ. ये जगत ईश्वर होने का प्रमाण है। ये जगत उतना ही सत्य है जितना कि ईश्वर का होना। ईश्वर नहीं तो जगत भी नहीं होगा। जब तक जगत है तभी तक ईश्वर का अस्तित्व होता है। जिस दिन जगत शून्य होता है उस दिन के बाद कुछ भी नहीं होता है।
ईश्वर का अस्तित्व जगत के कारण है। अगर कोई मानने वाला है ही नहीं तो वो है भी नहीं। ये तुम्हारी दृष्टि का दोष है जो सामने रहते हुए भी उसे देख नहीं पा रहे हो। जब शाश्वत को नहीं देख पा रहे हो तो सत्य को कैसे जान पाओगे?
भजन पूजन भी उसी का करते हो और उसी को मिथ्या कहते हो। तुम सभी कुम्भ जा रहे हो. आखिर क्यों?
*कुम्भ संबंधी “144 साल के बाद मुहूर्त” की बकचोदी :*
इस मिथ्या जगत में काहे का मुहूर्त? इस मिथ्या जगत में काहे की गंगा? इस मिथ्या जगत में कैसा पाप पुण्य?
बहुत साल पहले एक दिन मेरे तंत्र ट्रेनर ने कहा था, अभी महिलाओं को हाथ नहीं लगाना।
हमने पूछा क्यों?
उन्होंनने कहा अभी नवरात्र शुरू हुए हैं।
हमारा जवाब था कि हमारे लिए तो हर रोज ही नवरात्र है। हमारा लिए सब कुछ पर्व ही है। हमारे लिए हर क्षण ही मुहूर्त है। हमारी आस्था गंगा, कावेरी, गोदावरी, नर्मदा सभी नदियों में है, यही वजह है कि हमारी आस्था इस जगत में है। ये ताप, ये ऊर्जा, ये ऊष्मा, ये प्रकाश इस सब कुछ का एक ही स्रोत है और जब मैं गंगा तट पर रहता हूँ तो मेरी परिभाषा नहीं बदलती है।
वहाँ भी यही कहता हूँ एक तुम ही तो हो। जिस कारण से इस जगत का अस्तित्व है। जब कभी किसी छोटी नदी या नाले में भी स्नान किया होगा तो भी यही भाव रहा, हे महेश्वर तुम्हारा विस्तार यहाँ तक है?
हम इस जल में तुम्हें अनुभव कर सकते हैं। हम देवघर, कामख्या, तारापीठ, बद्रीनाथ आदि कई जगहों पर रहे हैं, सोमनाथ, या द्वारिका अन्य कही भी मेरी परिभाषा नहीं बदली। हमने जब भी कभी मंत्र जाप किया तो कभी किसी मुहूर्त को नहीं देखा। एक बार में ही हो गया। मेरे सामने प्रतिमाएं बदलती रहीं, पेड़, पहाड़, नदी स्थान बदलते रहे।लेकिन हमारी परिभाषा कभी नहीं बदली।
हमारे सामने किसी भी देवता की मूर्ति रही हो, गंगा या नर्मदा कुछ भी हो हमारे पास दूसरी दृष्टि है ही नहीं। हमने गंगा तट या नर्मदा तट कभी मुहूर्त नहीं देखा है। गंगा या नर्मदा तट पर होना ही मुहूर्त है।
जब मैं तुम लोगों को देखता हूँ। तुम नर्मदा और गंगा को पृथक मानते हो। तुम्हारे हर सब कुछ के लिए एक अलग मुहूर्त है। यही कारण है तुम्हारी कथनी और करनी में फर्क हो जाता है।तुम्हें पता भी नहीं चलता है तुम जो कह रहे हो उसका अर्थ क्या निकलता है?
तुमने नर्मदा और गंगा में फर्क डाला हुआ है। तुम नर्मदा को बड़ा मानते हो, गंगा को छोटा मानते हो। तो मुझे बात तुम्हारे तरीकों में कहनी पड़ती है। नर्मदा तट पर सब कुछ मुहूर्त ही है। गंगा तट पर मुहूर्त देखना होता है। इसका मतलब गंगा का कोई महत्व नहीं सब कुछ मुहूर्त का ही महत्व है। मैं ये तुम लोगों की ही समझ कि व्याख्या कर रहा हूँ। तो फिर और आगे सुन लीजिए :
नर्मदा का जन्म शिव के पसीने की बूंद से हुआ है। जब कुछ भी श्रम से जन्मता है तो वो पावन होता है। तुम जिस गंगा को जानते हो वो ब्रह्म लोक से भगाई गईं थी और किस पाप के कारण भगाई गईं थीं.
ये तो तुम्हें पता ही होगा। उन्होंने पाप किया था। तुम महात्मा हो जिस तरह कि धारणा लेकर निकले हो उससे तो इसी प्रकार की व्याख्या जन्मेगी।
मैं अपने लेखों में प्रमाणो सहित साफ कह चुका हूँ कि, ये गंगा भागीरथ से भी पहले से यहीं है। जब से धरती है तब से गंगा है। जब से शिव हैं तब से गंगा है। गंगा एक ही है, जब मैं देखता हूँ तब वो पतित पावनी है? और जब तुम देखते हो तब वो पापिनी हो जाती है।
मुझसे मत कहो मेरा तरीका बदलने को। तुम अपनी धारणाएं बदलो सब कुछ ठीक हो जाएगा।
*जगत मिथ्या तो करोगे क्या, पहुंचोगे कहाँ?*
इस धारणा से ही सभी महात्माओं की शुरुआत होती है या कहें महात्मा यहाँ से शुरू होता है। हम कहते हैं कि अगर ये जगत मिथ्या है, तो फिर ये कुंभ भी तो इसी जगत में है और सबसे पहले महात्मा ही कुंभ स्नान करते हैं।
इसमें कुछ अजीब नहीं दिखता है आप लोगों को?
पहले ठीक से देख तो लेते। बिना देखे जाने ही धारणा बना ली। अब यदि यात्रा के आरंभ से ही ये धारणा बन जाए ये जगत मिथ्या है तो…. ?
कहां पहुँचेंगे ?
एक तो पहले ही कुछ कर नहीं रहे हैं और बची खूची कसर इस तरह की धारणा और गहरी कर देगी। बहाना और मिल गया अब तो जब जगत मिथ्या ही है तो करना ही क्या है?
प्रश्न तो उठता ही है अगर ये जगत मिथ्या ही है तो, इस मिथ्या जगत में आप क्या कर रहे हो?
क्योंकि झूठ से तो महात्मा का कोई वास्ता होता नहीं है। महात्मा का अर्थ ही होता है सत्य मार्गी। सत्य को अभी तो जाना ही नहीं है। बिना विचारे ये लोग बात करना शुरू कर देते हैं। बातें बड़ी-बड़ी। हम तो संन्यासी हैं हमें असत्य से क्या वास्ता?
अगर इस जगत से कोई वास्ता नहीं है तो यहाँ कर क्या रहे हो भाई?
इस मिथ्या को पकड़ना आसान है पर छोड़ने के लिए औकात चाहिए होती है। जो तुम्हारे वश में नहीं है। इस जगत को मिथ्या बनाने के लिए सब कुछ दाव पर लगता है।
वैसे मिथ्या को छोड़ने में लगता क्या है. कुछ भी तो नहीं। तो फिर इस धरती को क्यों पकड़े हुए हो ?
प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन भी तो इसी मिथ्या जगत में है। अमृत भी जहां गिरा था वो भी इसी मिथ्या जगत में है। एक व्यक्ति को सिद्धि मिली है उसका अधिकार है इस धरती पर इसका उपभोग करेगा। एक व्यक्ति स्वयं ही सिद्ध हो गया। अब ये धरती क्यों छोड़ेगा?
लेकिन ये जो दूसरा वाला व्यक्ति है ये इस जगत को मिथ्या भी कहता है और धरती भी पकड़ ली।
*ये विरोधाभाष क्यों है?*
अब मुझे बताओ ये जगत मिथ्या है या तुम सभी झूठे हो? मिथ्या का अर्थ होता है झूठ.
इतना बड़ा झूठ के साथ कैसे दिन रात काट पाते हो? जो कह रहे हो उस पर कभी विचार भी किया है?
एक बार खुद कि भी तो समीक्षा करके देखो। अब झूठ ही, झूठ को, झूठ कहा रहा है। बिना दृष्टि के देखोगे तो ऐसा ही होगा। महात्मा के लिए जगत जैसा कुछ होता नहीं है और तुम सभी जगत को झूठ कह रहे हो. इसका तो सीधा अर्थ हुआ जगत को स्वीकार कर रहे हो।
जगत है, और वो झूठा है। ये कैसा लगता है?
जितनी ज्यादा ताकत से कहते हो उतना ही जगत और भी प्रकट होता जाता है। जो नहीं होता है उसको कहने का क्या अर्थ?
जगत है और वो झूठा है?
तुम बात करते हो सनातन की और इस जगत को मिथ्या भी कहते हो। मुझसे कहते हो मैं लोगों को नास्तिक बनाता हूँ। सनातन को मिटा रहा हूं। विष वमन कर रहा हूं।
मैं तो कह रहा हूँ ये जगत ईश्वर का ही विस्तार है। और सत्य तो ये मैं एक मात्र हूँ जिसने इस जगत को ईश्वर का ही विस्तार कहा है। ये जगत ईश्वर से ही जन्मा है और प्रलय काल में ईश्वर में ही समा जाएगा। मैं संन्यास और ग्रहस्थ दोनों को समानांतर मानता हूँ । मेरी ब्रह्म और जगत में समान ही आस्था है। क्योंकि ब्रम्ह सत्य है तो जगत भी उतना ही सत्य हैं।
तो आस्तिक कौन हुआ ?
तुम लोग या हम?
तुम इस जगत को ही झूठा कह रहे हो और ये जगत आया कहां से है?
तुम पहले अपनी ईश्वर के प्रति श्रद्धा को देखो वो कहां खड़ी है?
इस जगत को मिथ्या कहने वाले ईश्वर की ही आलोचना कर रहे हैं। अगर ये जगत झूठा है तो तुम्हारी ईश्वर के प्रति निष्ठा भी झूठी है।
*अगर जगत नहीं होगा तो ईश्वर कैसे हो सकता है?*
ईश्वर है ही इसलिए क्योंकि तुम हो। ये ही लोग ईश्वर की ही भक्ति का ढोंग रचे हुए हैं। ज्ञानी, ध्यानी, तांत्रिक, मांत्रिक, योगी, सिद्ध सभी इसी मिथ्या जगत में हैं। राम, कृष्ण जैसों ने अवतार भी इसी मिथ्या जगत में लिया है। गाय, गंगा और गीता सब कुछ इसी मिथ्या जगत में है। जो इस जगत के शाश्वत होने का प्रमाण है। थोड़ा तो होश कि बातें करो।
तुम्हें अमृत चाहिए, तुम्हें खास मुहूर्त चाहिए, तुम्हे शाही स्नान चाहिए। तुम्हे दान चाहिए, तुम्हें मेला चाहिए तुम्हें वो सब कुछ चाहिए जो रुचिकर है।
आखिर इस मिथ्या जगत में ये सब तुम्हे क्यों चाहिए ?
हम अगर इन सब कुछ का आकांक्षा करें तो इसमें कोई विचार करने जैसा कुछ नहीं होगा। हम तो इस जगत को उस ईश्वर का ही विस्तार मानते हैं। हम कहा सुना नहीं मानते हैं। ये हमारे अनुभव से प्राप्त हुआ है। यही सब कुछ हमने अपने ध्यान कि गहन अवस्था में अनुभव किए है।
ये पेड़, पहाड़, कीड़ा, मनुष्य सब कुछ उसी एक मात्र नारायण की आत्मा का विस्तार है। कल ये सब उसी आत्मा में समा जाएंगे।
मिथ्या कहने से सत्य मिथ्या नहीं हो जाएगा। जगत को मिथ्या वो कह सकता है जो जगत का हिस्सा न हो। थोड़ा खुद में झाँको, ये मिथ्या तुम्हें किसने दिया है? क्योंकि ये तुम्हारी खोज नहीं हो सकती है।





