अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

इबारत -गजल गायन के प्रोग्राम की रंगत, तेवर अलग अंदाज में देखने को मिली

Share

प्रोफेसर राजकुमार जैन
मैंने लड़कपन में दिल्ली में मुशायरों , कव्वालियों के अधिकतर प्रोग्राम जामा मस्जिद के आसपास उर्दू बाजार तथा लाल किले के अंदर, वह दिल्ली 6 की सफील में लाल कुआं चौक तथा दिल्ली के मशहूर शायर आनंद मोहन जुत्सी, “गुलजार देहलवी” अक्सर हौज काजी चौक पर मुशायरा आयोजित करते थे, सुने और देखे है। इसके बाद तकरीबन 45 साल से ज्यादा दिल्ली यूनिवर्सिटी के मुख़्तलिफ़ कॉलेजों में वक्त वक्त पर सुने हैं। परंतु आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में आयोजित दो दिन के “इबारत” के नाम से हुए मुशायरे , गजल गायन के प्रोग्राम की रंगत, तेवर एकदम अलग अंदाज में देखने को मिली। साइंस, टेक्नोलॉजी, पैरामेडिकल साइंस, मैनेजमेंट, एग्रीकल्चर साइंस,कानून, जैसे विषयों के हजारों छात्रों ने जिस दिलचस्पी से इस प्रोग्राम में शिरकत की वह अपने आप में अजूबा थी। दिल्ली के आम मुशायरों में शेर और ग़ज़ल आम अवाम की पसंदी के हल्के-फुल्के, हंसी मजाक, आशिक माशूकी या सियासी तानाकशी, व्यंग्य के शेर शायरी में होती है। संजीदा शायरी, गजल बंद कमरों या कम तादात में शायरी करने या समझने वालों के बीच जरूर मुसलसल होती रहती है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी का उर्दू विभाग तथा डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन कॉलेज जरूर शायरी के शास्त्रीय गंभीर पक्ष पर सेमिनार सिंपोजियम वार्ताएं आयोजित करते रहते हैं। परंतु इनमें शिरकत केवल उर्दू साहित्य के विद्यार्थी और शिक्षक तक ही महदूद रहती है। हालांकि दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों में उर्दू विभाग हैं , जहां पर “बज़्मे अदब” सोसाइटी की तरफ से कभी-कभी आयोजन होते रहते हैं। मेरे अपने किरोड़ी मल कॉलेज में उर्दू ऑनर्स की तालीम दी जाती थी। वहां के प्रोफेसर खालिक अंजुम, तथा प्रोफेसर कामिल कुरेशी “बज़्मे अदब” सोसाइटी के तहत उर्दू शायरी पर प्रोग्राम आयोजित करवाते रहते थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट ऑफ़ इवनिंग क्लासेस के प्रोफेसर रहे तथा उर्दू साहित्य के मशहूर आलोचक प्रोफेसर गोपीचंद नारंग की संगत के कारण उर्दू शायरी, साहित्य पर बहुत कुछ सुनने को मिला है। प्रोफेसर गोपीचंद नारंग जैसे धारा प्रवाह उर्दू में बोलने वाले मैंने अपने जीवन में बहुत कम देखे हैं।
आइटीम यूनिवर्सिटी का आयोजन उर्दू के महान कवि ग़ालिब की रचनाओं पर केंद्रित था। जिसमें गालिब की गजलों का गायन एवं मुशायरा केंद्र बिंदु था। दो दिन के प्रोग्राम को चार हिस्सों में बांटकर अलग-अलग सत्रों में आयोजित किया गया।
‌‌भारतीय काव्य परंपरा और गालिब “गालिब का तिलिस्म”
शीर्षक पर दुनिया भर में मशहूर, पद्मश्री शायर शीन काफ़ निजाम
“ग़ालिब और आधुनिकता”
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और कवि नंदकिशोर आचार्य
“गालिब की सौंदर्य दृष्टि और अस्तित्व बोध”
फरहत अहसास,
गालिब की गजलों का गायन
गायक सुधीर नारायण
“कविता कैसे सुनी जाए: एक विवेचन,
शायर: उर्दू के नामवर शायर,शीन काफ़ निजाम,फरहतअहसास,शारिक कैफ़ी, राजेश रेड्डी, मदन मोहन दानिश ने इस मौजू पर रोशनी डालते हुए अपनी शायरी सुनाई। इस प्रोग्राम की एक और बेहतर बानगी इस बात में थी दुनिया भर में मशहूर शायर निजाम और दूसरे शायरों ने एक शिक्षक के रूप में छात्रों को समझाने की ग़रज़ से पहली क्लास के छात्र के रूप में बतलाया की शायरी का मतलब उर्दू में कविता होता है, वही नज़्म उर्दू कविता का एक रूप है। गजल और नज्म में अंतर समझाते उन्होंने फरमाया की गजल में शेर तुकांत होते हैं और हर शेर का अपना अलग-अलग ख्याल होता है, वहीं नज्म में शेरों का कोई शाब्दिक संबंध नहीं होता। नज्म एक ही विषय वस्तु पर लिखी हुई कविता होती है, किसी भी गजल के शेर अलग-अलग विषयों पर ख्यालों को बयां करते हुए हो सकते हैं। नज्म हमेशा किसी एक टॉपिक पर लिखी जाती है उसे नज्म का उन्वान (टाइटल) कहा जाता है, उसके पीछे एक कहानी होती है कि किस मोजू पर यह नज़्म लिखी गई है और पूरी की पूरी नज़्म अपने उनवान को निभाती है, यानी पूरी नज़्म अपने टाइटल से जुड़ी हुई होती है। गजल में कम से कम पांच जोडे शेर होने चाहिए हालांकि अब चार भी चल रहे हैं। नज़्म वास्तव में उर्दू शैली में कही गई तुकांत अतुकान्त कविता है। गजल सदैव तुक में होती है, जिसे काफिया कहते हैं। पहले शेर को मतला और लास्ट के शेर को मक़्ता कहते हैं, इसमें शायर का उपनाम, तकल्लुस आता है। शेर का वह शब्द जो हर शेर के आख़िरी में आता है वह रदीफ़ कहलाता है। ग़ज़ल महबूब की याद में तब कही जाती है जब उससे नाराज़गी या अलगाव होता है। नज्म महबूब की याद में तब कही जाती हैं जब अपने महबूब को किसी तरह का तोहफ़ा या मोहब्बत पेश की जाती है।
इस प्रोग्राम का एक आयोजन आईटीएम यूनिवर्सिटी के संस्थापक रमाशंकर सिंह के निवास स्थान पर हरे भरे लान में हल्के सफेद शामियाने मे सूरज की मनभावन तपिश के नीचे एक तरफ उर्दू अदब के शायर तथा ठीक उनके सामने दूसरी तरफ हिंदी के कवियों और साहित्यकारों में हिंदी की कविता तथा उर्दू के शेरो शायरी गजलों पर आमने-सामने के बहस मुबाबहसे में कभी सहमति या मुखालिफ, कभी ठहाके, कभी उत्तेजना, कभी एक दूसरे की बात से सहमत होने का साझा स्वर सुनाई दे रहा था। कविता और शायरी के विभिन्न पक्षों पर गहन गंभीर, सवाल जवाब, तथ्यों की जांच पड़ताल बहस में सुनने को मिली।
इस प्रोग्राम की रूपरेखा, ताना-बाना ग्वालियर के मशहूर शायर मदन मोहन दानिश ने बड़ी सूझबूझ, खूबसूरती से इसका खाका तैयार किया तथा संचालन करते हुए समा बांध दिया।
ग़ैर उर्दू भाषी छात्रों और शिक्षकों ने जिस स्तर पर रुचि लेकर उसको सुना वह अपने आप में एक मिसाल है। ग्वालियर शहर के कला, साहित्य, संगीत रसिक बड़ी तादाद में शामिल थे। इस आयोजन से एक बात और साफ हुई कि उर्दू के साहित्य, कविता को अगर देवनागरी लिपि में प्रकाशित किया जाए तो दो तरफा फायदा होगा एक तो उर्दू के मशहूर मारूफ शायरों के कलाम से बड़े स्तर पर हिंदी का पाठक वाकिफ हो सकेगा वहीं उनकी पुस्तकों की बिक्री बड़े स्तर पर होगी। आज ग़ालिब की गैर उर्दू भाषी लोगों में जो बड़े स्तर पर पहचान बनी है, वह तभी संभव हो सका जब अन्य भारतीय भाषाओं में उनकी शायरी तथा साथ ही अरबी फारसी के शब्दों का स्थानीय भाषाओं में अर्थ भी प्रकाशित किया गया।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें