अग्नि आलोक
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*वक्फ बिल तो बहाना है,मकसद भक्तों को सुख पहुंचाना है…*

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विरैन्द भदोरिया 

          कोई और पार्टी यह बात समझी हो न समझी हो, लेकिन एक पार्टी, संगठन और उनके नेता ने बड़ी अच्छी तरह से समझ ली है कि यह देश बहुसंख्य मनोरोगियों का है, और यहां सबसे बढ़िया स्ट्रेटेजी परपीड़ा सुख यानि सैडिस्टिक प्लेजर देने की है। तब से आज तक वे इस लाईन पर कायम हैं और अपने लाव लश्कर सहित यह नशा सप्लाई करने में लगे हैं।

      नोटबंदी के समय की एक बात याद है कि अपार्टमेंट के सामने सड़क पार एक गरीब हिंदू बंदा सब्जी बेचता था फुटपाथ पर। टेंपरेरी ठिकाना था, कभी इधर तो कभी उधर नज़र आता था— बाद में अगले साल एलईडी लिया मेन रोड के शोरूम से, तो उसे घर तक पहुंचाने वाले मजदूर के रूप में वही नज़र आया, मैंने सब्जी के काम के बारे में पूछा तो बताया कि उसमें कुछ हो ही नहीं पाता था, खाने के लाले थे तो अब यही मजदूरी करता था।

         तो नोटबंदी के बीच एक दिन मैं जब उसके पास कुछ सब्जी लेने गया तो बड़ा ख़ुश नजर आया। मैंने वजह पूछी तो बताया कि नोटबंदी कर के बहुत अच्छा काम किये ओदी जी, देखो कैसे सब पैसे वाले परेशान हैं, अपने लाखों रुपये कूड़े में फेंक रहे हैं, नदी में बहा रहे हैं। मतलब दूसरे परेशान हैं— तो वह इसका सुख महसूस कर रहा था, अपनी गरीबी, तंगहाली, अपना संघर्ष भूल कर। वह उसका अपना कल्पनालोक था, जिसकी सूचना इसी मैनेज्ड मीडिया, व्हाट्सअप, आईटीसेल की मेहनत से मिली होगी।

     उसे कोई मतलब नहीं था कि इसका सच क्या है, वाकई में अमीर परेशान हैं या उसके जैसे गरीब, जिनके पास शादी और इलाज के लिये भी ज़रूरत भर पैसे उपलब्ध नहीं (अमीर के पास तो पैसा भी था और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन की सुविधा भी)… बस वह इस अफीम को सूंघ कर ख़ुश था कि पैसे वाले परेशान हैं— क्योंकि उसकी दुनिया में पैसे वाला हमेशा उसका दुश्मन रहा है। हम विरोध में खड़े लोग नोटबंदी को कितना भी नाकाम क़दम मानें, लेकिन उनके लिये यह कामयाब स्ट्रोक था— विरोधियों का पैसा ब्लाॅक कर कर के, आम गरीब मतदाता को ऑर्गेज्म दे कर यूपी चुनाव जिताने वाला।

     इनके सारे काम ऐसे ही होते हैं, चाहे वह 370 हटाना हो, तीन तलाक को ले कर कानून बनाना, सीएए हो या फिर अब वक्फ बिल। हमेशा अपने वोटर्स को परपीड़ा का सुख देना— इनके वह सब फायदे भले कुछ न हों, या नाम के हों, जो यह बताते हैं, लेकिन उससे अल्पसंख्यक परेशान होते हैं, विरोध करते हैं, सड़क पर उतरते हैं और फिर इससे जो परपीड़ा का नशा पैदा होता है… वह अपना काम कर जाता है। ताज़ा मामले में भी दो हित हैं, पहला वक्फ की जमीनों तक अपनी पहुंच बनाना ताकि आगे वह मालिकों के लिये उपलब्ध हो सकें— दूसरा, एज आलवेज़ अपने समर्थकों को परपीड़ा का सुख देना।

        अब इस मामले में तीसरा फायदा लेने के लिये यह क्लाॅज में भी उप-क्लाॅज ढूंढ लाये हैं कि नोटबंदी स्टाईल में अल्पसंख्यकों के बीच अशराफ-पसमांदा का भेद पैदा कर के पसमांदा को परपीड़ा का सुख देना कि देखो सारी मलाई अशराफ खा रहे थे, अब वही सब परेशान हैं और हम इनसे माल छीन कर तुम्हारा भला करेंगे। अब यह बताने के लिये कुछ खरीदे हुए मुसलमान (सभी समाजों में बिकाऊ होते हैं, संघ ने तो बाकायदा इन्हें ले कर मंच भी बना रखा है) इधर-उधर लगा दिये हैं प्रचार के लिये… लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तीर काम करेगा?

जवाब है कि नहीं… अपवादस्वरूप कुछ लोग बहक सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर सबको पता है कि वक्फ बोर्ड की हकीक़त क्या है। वक्फ की गई जमीनों पर मदरसे होते हैं, स्कूल होते हैं, मस्जिदें होती हैं, कब्रिस्तान होते हैं और लगभग सभी दूसरों के दिये चंदे, और सहयोग से चलते हैं और सभी के लिये होते हैं— न कि यहां कोई ब्राह्मण जैसा रिजर्वेशन है। दूसरे इसकी ज्यादातर जमीनें सरकारी अमलों, दबंगों द्वारा कब्जे में ली जा चुकी हैं, जिनसे कुछ भी हासिल नहीं। जो थोड़ी बहुत जमीनों पर बनी दुकानें या दूसरे इदारे किराये पर उठे हैं, वहां भी किराया दस रुपये से ले कर पांच सौ रुपये तक आता है— क्या बनेगा इससे?

       यह ठीक है कि कुछ जगहों पर अनियमितता मिल जायेगी, कि सपोज किसी दबंग ने अपने को मुतवल्ली बनवा कर दंद-फंद कर के कुछ जमीनें बेच-बाच दीं लेकिन किराये से उसका क्या भला होना? जो ज़मीन बताई जाती है वह देश भर में है, न कि किसी एक इलाके में— किसी एक मुतवल्ली के हाथ (मान लेते हैं कि वह दबंग, लुटेरा, अशराफ है) कितनी ज़मीन आ जायेगी कि वह किराये से अपना महल बना लेगा? पोस्ट लेखक एक बहुत बड़ी कम्युनिटी से बिलांग करता है जो राजनीतिक शब्दावली में पिछड़ों में ही आती है— और मैंने तो नहीं देखा ऐसा एक भी केस… फिर, कहां कौन खाये ले रहा, जो उससे छीन कर हमें दे दिया जायेगा?

        इस प्रापर्टी में जितनी भी चीज़ें आती हैं, उनमें किराये के सहारे कमा कर देने वाली प्रापर्टी नाम मात्र की होती हैं और किराया भी इतना कम कि देख कर आपको हैरानी होगी… बाकी जो भी है, वह सब चंदे और आसपास वालों के सहयोग से चलता है। फिर भी… मान लेते हैं कि अब सारे सिस्टम को एक सिंगल कंट्रोलिंग बाॅडी में बांध कर, सारा प्रबंधन अपने हाथ में ले कर वे टोटल हासिल किराये को (वक्फ की संपत्ति बेची नहीं जा सकती, तो आमदनी बस किराया ही है) एक जगह जमा कर के खाते में दिखाते हैं… तो?

        आपको लगता है कि वे बाकायदा पसमांदा मुसलमानों को अलग से पहचान कर उनके खातों में वह रकम बांटने वाले हैं? जैसे सबके खाते में 15 लाख पहुंचाये थे.. तो भाई साहब, अपने माथे पर कैपिटल ‘C’ गुदवा लीजिये। पसमांदा हो या कोई फैंसी नाम बना कर पुकार लो, इतना मूर्ख कोई नहीं जो यह बात समझता न हो.. बात केवल इतनी है कि एक तरफ़ अपने वोटर वर्ग को तो सैडिस्टिक प्लेजर दिया ही जा रहा है, मुसलमानों में भी एक वर्ग को छांट कर उसे यही परपीड़ा सुख की अफीम चटाने की कोशिश की जा रही है।

#ashfaqahmed

Ramswaroop Mantri

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