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‘ *हिंदू बनाम हिंदू’डॉ राममनोहर लोहिया के लेख के कुछ अंश* 

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हिंदुस्तान की सियासत को अगर गौर से देखा जाए तो उसमें विचारधारा पर आधारित राजनीति का स्थान बहुत ही मामूली मिलेगा । आज की राजनीति का पूरा दारोमदार  हिंदू बनाम मुसलमान तथा जातियों की गोलबंदी पर टिका हुआ नजर आता है।  हिंदू मुसलमान तथा जाति के संघर्ष में हमें दो तरह की मानसिकता, सोच के लोग नजर आते हैं। एक तरफ उदार हिंदू और दूसरी तरफ कट्टरपंथी हिंदू। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भाजपा जैसी मानसिकता वाली पार्टियां, कट्टर हिंदुवाद को उभारने में पूरे जोर-जोर, दमखम  से लगी हुई है। वही सोशलिस्टों, कम्युनिस्टों तथा कांग्रेस का एक बड़ा तपका,  गांधीवादी सोच के अनुयायी भी कट्टरवाद के खिलाफ उदार वाली ज़हनियत से संघर्ष करता दिखाई दे रहा है। डॉ राममनोहर लोहिया एक अनोखे, मौलिक राजनीतिक चिंतक हैं, जिन्होंने आज से तकरीबन 75 साल पहले इन मुद्दों के सभी पहलुओं पर गंभीरता से लिखा, बोला था। जिससे न केवल हमें इतिहास, मजहब जाति के आधार पर होने वाली गैर बराबरियों, जुल्म ज्यादतियों का पता चलता है, बल्कि इस समस्या का इलाज क्या है, सही रास्ता, सोच क्या है? उस पर भी रोशनी डाली थी।

  ‘ *हिंदू बनाम हिंदू’ के उनके लेख के कुछ अंश आज के संदर्भ में प्रस्तुत है।* 

 *भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाई हिंदू धर्म में उदारवाद और कट्टरता की लड़ाई  , पिछले 5000 सालों से भी अधिक समय से चल रही है और उसका अंत अभी भी दिखाई नहीं पड़ता।* इस बात की कोई कोशिश नहीं की गई जो होना चाहिए थी, कि इस लड़ाई को नजर में रखकर हिंदुस्तान के इतिहास को देखा जाए। लेकिन देश में जो कुछ होता है उसका बड़ा हिस्सा इसी के कारण होता हैं।

 सभी धर्मो में किसी न किसी समय उदारवादियों और कट्टरपंथियों की लड़ाई हुई है। लेकिन हिंदू धर्म के अलावा वह बंट गए, अक्सर उनमें रक्तपात हुआ और थोड़े या बहुत दिनों की लड़ाई के बाद, में झगड़े पर काबू पाने में कामयाब हो गए। हिंदू धर्म में लगातार उदारवादियों और कट्टरपंथियों का झगड़ा चला आ रहा है जिसमें कभी एक की जीत होती है कभी दूसरे की और खुला रक्तपात तो कभी नहीं हुआ, लेकिन झगड़ा आज तक हल नहीं हुआ और  झगड़े के सवालों पर एक धुन्ध छा गई है। ईसाई ,इस्लाम और बौद्ध धर्मो में झगड़े हुए। कैथोलिक मत में एक समय इतने कट्टरपंथी तत्व इकट्ठा हो गए कि प्रोटेस्टेंट मत ने,जो उस समय उदारवादी था, उसे चुनौती दी। लेकिन सभी लोग जानते हैं कि सुधार आंदोलन के बाद  प्रोटेस्टेंट मत में खुद भी कट्टरता आ गई। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट मतों के सिद्धांत में अब भी बहुततेरे फर्क है, लेकिन एक को कट्टरपंथी दूसरे को  उदारवादी कहना मुश्किल है। ईसाई धर्म में सिद्धांत और  संगठन का भेद है तो इस्लाम धर्म में शिया -सुन्नी का बंटवारा इतिहास के घटना क्रम से संबंधित है।  इसी तरह बौद्ध धर्म हीनयान और महायान के दो मतों में बंट गया और उसमें कभी रक्तपात तो नहीं हुआ, लेकिन उनका मतभेद सिद्धांत के बारे में है, समाज की व्यवस्था से उनका कोई संबंध नहीं हिंदू धर्म में ऐसा कोई बंटवारा नहीं हुआ। अलबत्ता वह   बराबर छोटे-छोटे मतों में टूटता रहा है। नया मत उतनी ही बार उसके ही एक नए हिस्से के रूप में वापस आ गया है । इसलिए सिद्धांत के ंसवाल कभी साथ-साथ नहीं उठे और सामाजिक संघर्षों का हल नहीं हुआ। हिंदू धर्म नए मतों को जन्म देने में उतना ही तेज है जितना प्रोटेस्टेंट मत, लेकिन उन सभी के ऊपर वह एकता का एक अजीब आवरण डाल देता है जैसी एकता कैथोलिक संगठन ने अंदरूनी  भेदों पर रोक लगाकर कायम की है। इस तरह हिंदू धर्म में जहां एक और कट्टरता और अंधविश्वास का घर है, वहीं वह नई-नई खोजों की व्यवस्था भी है।

चार  हजार साल या उससे भी अधिक समय पहिले कुछ हिंदुओं के कान में दूसरे हिंदुओं के द्वारा सीसा डाल दिया जाता था और उनकी जबान खींच ली जाती थी क्योंकि वर्ण व्यवस्था का नियम था कि कोई शूद्र वेदों को पढे या सुने नहीं।तीन सौ साल पहले शिवाजी को यह मानना पड़ा था कि उनका वंश हमेशा ब्राह्मणों को ही मंत्री बनाएगा ताकि हिंदू रीतियों के अनुसार उनका राजतिलक हो सके। करीब दो सौ वर्ष  पहिले, पानीपत की आखिरी लड़ाई में जिसके फलस्वरुप हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का राज्य कायम हुआ, एक हिंदू सरदार दूसरे सरदार से इसलिये लड़ गया कि वह अपने वर्ण के अनुसार ऊंची जमीन पर तंबू लगाना चाहता था। करीब 15 साल पहले एक हिंदू ने हिंदुत्व की रक्षा करने की इच्छा से महात्मा गांधी पर बम फेंका था, क्योंकि उस समय वे छुआछूत का नाश करने में लगे थे। कुछ दिनों पहले एक, और कुछ इलाकों में अब भी हिंदू नाई अछूत हिंदुओं की हजामत बनाने को तैयार नहीं होते, हालांकि गैर हिंदुओं का काम करने में उन्हें कोई एतराज नहीं होता।——- कट्टरपंथियों नेअक्सर हिंदू धर्म में एकरूपता की एकता कायम करने की कोशिश की है । उनके उद्देश्य कभी बुरे नहीं रहे। उनकी कोशिशों के पीछे अक्सर शायद स्थायित्व और शक्ति की इच्छा थी, लेकिन उनके कामों के नतीजे हमेशा बहुत बुरे हुए। मैं भारतीय इतिहास का एक भी ऐसा काल नहीं जानता जिसमें कट्टरपंथी हिंदू धर्म भारत में एकता या खुशी ला सका हो। जब भी भारत में एकता या खुशहाली आई, तो हमेशा वर्ण स्त्री, संपत्ति आदि  सहिष्णुता के संबंध में हिंदू धर्म में उदारवादियों का प्रभाव अधिक था। हिंदू धर्म में कट्टरपंथी जोश बढ़ने पर हमेशा देश सामाजिक और राजनीतिक दृष्टियों से टूटा है और भारतीय राष्ट्र में राज्य और समुदाय के रूप में बिखराव आया है। मैं नहीं कह सकता कि ऐसे काल जिसमें देश टूट कर छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया, कटटरपंथी प्रभुता के काल थे लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि देश में एकता तभी आई जब हिंदू दिमाग पर उदार विचारों का प्रभाव था।

देश में एकता लाने की भारतीय लोगों और महात्मा गांधी की आखिरी कोशिश कामयाब हुई है, लेकिन आंशिक रूप में ही। इसमें कोई शक नहीं की 5000 वर्षों से अधिक की उदारवादी धाराओं ने इस कोशिश को आगे बढ़ाया, लेकिन इसके तत्कालीन स्रोत में,यूरोप के उदारवादी प्रभावो के अलावा क्या था, तुलसी या कबीर और चैतन्य और संतों की महान परंपरा या अधिक हाल के धार्मिक राजनीतिक नेता जैसे राममोहन राय और फैजाबाद के विद्रोही मौलवी। फिर, पिछले 5000 सालों की  कट्टरपंथी धाराएं भी मिलकर इस कोशिश को असफल बनाने के लिए जोर लगा रही है, और अगर इस बार कट्टरता की हार हुई तो वह फिर नहीं उठेगी। केवल उदारता ही देश में एकता ला सकती है। हिंदुस्तान बड़ा और पुराना देश है। मनुष्य की  इच्छा के अलावा कोई शक्ति इसमें एकता नहीं ला सकती। कट्टरपंथी हिंदू  अपने स्वभाव के कारण ही ऐसी इच्छा  नहीं पैदा कर सकता। लेकिन उदार हिंदुत्व कर सकता है, जैसा पहले कई बार कर चुका है। हिंदू धर्म संकुचित दृष्टि से राजनीतिक धर्मसिद्धांतों और संगठन का धर्म, नहीं है। लेकिन राजनीतिक देश के इतिहास में एकता लाने की बड़ी कोशिशों को इससे प्रेरणा मिलती है और उनका यह प्रमुख माध्यम रहा है।  हिंदू धर्म में उदारता और  कट्टरता के महान युद्ध को देश की एकता और बिखराव की शक्तियों का संघर्ष भी कहा जा सकता है।    

आज हिंदू धर्म में उदारता और कट्टरता की लड़ाई ने हिंदू मुस्लिम झगड़े का ऊपरी रूप ले लिया है लेकिन हर ऐसा हिंदू जो अपने धर्म और देश के इतिहास से परिचित है, उन झगड़ों की ओर भी उतना ही ध्यान देगा जो 5000 साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं और अभी तक हल नहीं हुए। कोई हिंदू मुसलमानों के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकता जब तक कि वह उसके साथ ही वर्ण और संपत्ति के विरुद्ध और स्त्रियों के हक में काम न करें। उदार और  कट्टर हिंदू धर्म की लड़ाई अपनी सबसे उलझी स्थिति में पहुंच गई है और संभव है कि उसका अंत भी नजदीक ही हो। कट्टरपंथी हिंदू अगर सफल हुए तो चाहे उनका उद्देश्य कुछ भी हो भारतीय राज्य के टुकड़े कर देंगे ना सिर्फ हिंदू मुस्लिम दृष्टि से बल्कि और प्रान्तों की दृष्टि से भी। केवल उदार हिंदू ही राज्य को कायम कर सकते हैं। अतः 5000 वर्षों से अधिक की लड़ाई अब इस स्थिति में आ गई है कि एक राजनीतिक समुदाय और राज्य के रूप में हिंदुस्तान के लोगों की हस्ती ही इस बात पर निर्भर है कि हिंदू धर्म में उदारता की कट्टरता पर जीत हो।”

 *नोट: डॉ राममनोहर लोहिया द्वारा रचित विपुल साहित्य* सर्वप्रथम लोहिया अनुयायी, राजा के बेटे, बद्री विशाल पित्ती ने बंजारा बनकर लोहिया के साथ हिंदुस्तान के दूर दराज, उबड़ खाबड़ पगडंडियों, सुदूर उत्तर पश्चिम से लेकर हिंदुस्तान के गांव शहरो की धूल फांकते हुए पुराने जमाने का भारी भरकम टेप रिकॉर्डर को कभी अपने कंधे पर रखकर, बैलगाड़ी, मोटर पर ले जाकर लोहिया के भाषणों को टेप कर, रात रात भर जागकर  प्रूफ रीडिंग करके, छोटी बड़ी  पुस्तकों, पुस्तिकाओ के रूप में अपने पैसे खर्च कर बहुत ही मामूली दाम पर उनको प्रकाशित किया था। बाद में लोहिया के अनन्य भक्त डॉ  हरिदेव शर्मा (भूतपूर्व  डायरेक्टर, जवाहरलाल नेहरू म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली) ने घूम घूम कर संग्रह किया था। उनकी आकस्मिक मौत के बाद लोहिया के अन्य शागिर्द डॉ मस्तराम कपूर ने नो  खंडो मैं हिंदी और अंग्रेजी में संग्रहित कर अनामिका प्रकाशन की मार्फत प्रकाशित करवाया। इसी तरह हिंदुस्तान में विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों, संस्थाओं द्वारा समय-समय पर उनकी पुस्तकों का दोबारा प्रकाशन होता रहता है। आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर ने ने डॉक्टर राममनोहर लोहिया साहित्य की २३ पुस्तकों से अधिक, गांधी मार्क्स एवं समाजवाद  (विचार- सिद्धांत- नीति वक्तव्य)  fragments of a word mine, डॉ राममनोहर लोहिया कुछ चुने हुए भाषण व लेख, डॉ राममनोहर लोहिया रचनाकारों की नजर में, खंड एक- दो । राम कृष्ण और शिव, नदिया साफ करो, द्रौपदी या सावित्री, जाति और योनि के दो कटघरे, योनी -सुचिता और नर नारी संबंध, सात क्रांतियां जैसे  ग्रंथों के प्रकाशन के साथ-साथ ‘हिंदू बनाम हिंदू’ ‘हिंदू और मुसलमान’पुस्तिका का प्रकाशन भी किया है। आप वहां से यह पुस्तकें मंगा सकते हैं।    

         * प्रो. राजकुमार जैन*

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