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*लोगों की नौकरी के पीछे पड़ी है AI*

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आलोक सिंह भदौरिया
अर्ली मॉर्निग शिफ्ट करके उठा ही था कि महंत चाचा ने टोक दिया- काय लला, जे का सुबेरे सैं कंपूटर में मूड दाएं खिटिर पिटिर कर रए? महंत चाचा चंबल घाटी में बसे हमारे गांव से हैं। कल रात ही लखनऊ आए हैं। वह पूछना चाह रहे थे सुबह से लैपटॉप में सिर झुकाकर क्‍या कर रहा हूं? मैंने कहा, चाचा वर्क फ्रॉम होम कर रहा हूं। नौकरी करनी है तो करनी है। चाचा बोले, हिंदी में बोलो। हमने फिर समझाया, घर से ऑफिस का काम कर रहे हैं।

चाचा ने सवाल दागा- ऑफ‍िस में तुमाए लाएं जगह नहीं है? मैंने कहा, नहीं चाचा कंपनी को इससे फायदा होता है। वर्क फ्रॉम से कंपनी पर कम खर्चा आता है। वैसे भी AI हम लोगों की नौकरी के पीछे पड़ी है। चाचा हैरान होकर बोले, काय भइया तुम्‍हाई आई (दादी) तो रोज तुम्‍हें असीसें देतीं, आसिरबाद देतीं, बे काए तुम्‍हाई नौकरी लीहें।

मेरी समझ में आ गया कि चाचा फुल मूड में हैं। उनको उन्हीं की भाषा में समझाने के लिए मैंने कहा, चाचा AI मतलब आर्टिफिशल इंटेलिजेंस। मतलब बनावटी बुद्धि, इसकी मदद से दर्जनों लोगों का काम सेकंडों में हो सकता है। तो उन तमाम लोगों को रखने की क्‍या जरूरत है। इसलिए नौकरी बचानी है तो इस तरह काम करना होगा।

कहां है AI को दफ्तर? किन्‍नै बनाई है? मालिक कौन है? चलौ दद्दा गांव से मौड़ा बुलाय लेत हैं, रात कै जब बजिहै लठ्ठ तो AI हों चाहे बेआई सब मटियामेट…। चाचा के पीछे से आवाज आई।

ओहो! इन्‍हें कैसे भूल गए। ये हैं हमारे चाचा के सपूत हमारे चचेरे भाई रोहित। रागदरबारी की भाषा में बिना सूंड के हाथी। खेती-किसानी करते हैं, अखाड़े में दंड-बैठक मारते हैं। लाठी, ठंडा, राइफल इनके प्रिय खिलौने हैं। चाचा के साथ आए हैं। हमने कहा, भाई, AI पर यह सब बेकार है। यह दुनिया में फैल रही नई तकनीक है।

रोहित बोले, AI हम पै बेकार है, हमाओ कोऊ काम नहीं छीन सकत। हमने पूछा क्‍यों? चाचा, बोले, ये कुछ करते ही नहीं है, कोई क्‍या छीनेगा। चाचा ने फिर हमसे पूछा, बेटा ज बताओ, AI केवल नौकरी ही छीन सकती है या कुछ फायदे का काम कर सकती है? हमारे गांव में पानी सैकड़ों फीट नीचे है, खेती किसानी बर्बाद, बच्‍चों को नौकरी नहीं है, छुट्टा जानवर आफत बने हैं। AI इसमें कुछ नईं कर सकत? या केवल झूठी-सच्‍ची खबरें और फोटू ही बना सकती है?
हम चुप। घटाघोप चुप। चाचा समझ गए हमारे पास जवाब नहीं है। बोले- तब काए बनावटी बुद्धि‍ कह रहे हो, बनावटी कुबुद्धि है तब।

मुझे बचपन की याद आ गई। जब हमें अखबार पढ़ते देख दादा कहते थे, लला, स्‍कूल की किताबें पढ़ो, इन अखबारन में लाबरू (झूठी) बातें छपत हैं। आज दादा होते तो AI की कस के क्‍लास लेते और कहते, AI केवल बेकार को काम कर सकत है, कोऊ कायदे को काम करै तो कोऊ क्‍यों डरेगा?

रोहित किसी और चरस में चल रहे थे। हमसे बोले, दद्दा अपने हिस्‍सा की खेती बेच देओ, राइफलें खरीद लेओ। फिर कूद पड़ेंगे दोनों भइया चंबल के बीहड़ में। बागी बन जाएंगे बागी। तुम गिरोह चलइओ, हमाए तमाम दोस्‍त पहले से ही तैयार हैं।

मैं AI इमेज में खुद को चंबल के बीहड़ में बैठे, लैपटॉप चलाते, एक्‍सल शीट पर नवीन बागियों के रिज्‍यूमे सिलेक्‍ट और अपडेट करते देख रहा था।

Ramswaroop Mantri

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