बनारस के कोतवाल साहब का वह लड़का अलग ही मिट्टी का बना था। उम्र किशोर वय अर्थात तेरहवें साल पर अभी चढ़ी ही थी। वह थोड़ा हकलाता था, पर कभी किसी काम में हिचकता नहीं था। दोस्तों के साथ गांव-गली में जितना खेलता था, उससे कहीं ज्यादा स्कूल में पढ़ता था। अभाव से दूर जिंदगी बड़े आराम से कट रही थी, पर एक दिन एक खास घटना हुई। वह किशोर घर से किसी काम के लिए निकला था, एक गली से गुजर रहा था, उसने गौर किया कि एक जगह गोल घेरा बनाकर अच्छी-खासी संख्या में तमाशबीन जुटे थे। जिज्ञासा हुई कि भला इतने लोग एक जगह क्यों जुटे हैं? वह भीड़ की ओर बढ़ा। पास पहुंचते ही उसे लग गया कि लोग दरअसल कुएं को घेरकर खड़े हैं, तब कुएं में झांकने की लालसा हुई, पर आगे खड़े तमाशबीन जगह छोड़ने को तैयार न थे। किशोर ने जोर से पूछा, यहां क्या हुआ है?
किसी ने जवाब दिया, अरे, एक बच्चा कुएं में गिर गया है? यह सुनते ही उस किशोर ने जबरन अपने लिए रास्ता बनाकर कुएं में देखा। पांच-छह वर्ष का बच्चा है, हाथ-पैर मार रहा है। वह तैरना नहीं जानता, तो बदहवास पानी से लड़ रहा है। बच्चा जब थक जाएगा, तब जरूरत से ज्यादा पानी निगलकर हमेशा के लिए शांत हो जाएगा। किशोर ने आव देखा न ताव जोर से चिल्लाया, अरे, तमाशा मत देखो, जल्दी रस्सी या सीढ़ी लेकर आओ और अगले ही पल वह सीधे कुएं में कूद गया। कुएं में उसके कंधे भर पानी था, उसने खुद को खड़ा करते हुए बच्चे को भी संभालकर शांत किया। बच्चे की जान में जान आई और कुछ ही देर में दोनों को कुएं से बाहर निकाल लिया गया।
कानों-कान यह खबर किसी खुशखबरी की तरह पूरे इलाके में फैल गई कि एक गजब वीर बालक है। गहरे कुएं में कूदने से पहले दो पल भी नहीं सोचा, वरना वहां तो हर उम्र के तमाशबीन खड़े थे। वीर बालक ने तमाशबीन बनने से इनकार कर दिया। वाकई, तमाशा तो कमजोर लोग देखते हैं, वीर नहीं।
परिवार और अन्य लोगों ने भी उस किशोर की वीरता को बल दिया। बेशक, समाज को वीरता की बहुत जरूरत होती है और हर समाज अपने वीरों की प्रतीक्षा करता है। उस घटना के बाद ही किशोर ने तय कर लिया था कि वह सैन्य अधिकारी बनेगा, भारत की सेवा करेगा। उम्र हुई, तो सैन्य अधिकारी चयन परीक्षा में वह कामयाब हुआ और उसे इंग्लैंड में शानदार सैन्य प्रशिक्षण हासिल हुआ। भारत लौटकर कई मोर्चों पर सेवा का मौका मिला और हर जगह उनकी वीरता ने निखरकर अपना रूप दिखाया।
बहरहाल, देश जब विभाजित हुआ, तब अचानक उनकी मांग बहुत बढ़ गई। आदत से मजबूर पाकिस्तानी नेताओं ने उन्हें मजहबी प्रलोभन दिया कि ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान आप इधर आ जाइए, हम आपको अपना आर्मी चीफ बनाएंगे। प्रलोभन बहुत बड़ा था, पर ब्रिगेडियर उस्मान ने बेहिचक ठुकरा दिया। देश जन्म से हासिल होता है और सच्चे योद्धा अपना देश नहीं बदला करते। मेरा देश भारत है और भारत ही रहेगा।
ब्रिगेडियर साहब रातों-रात सीमा के दोनों ओर चर्चित हो गए और देशभक्ति साबित करने का मौका भी उन्हें जल्दी ही मिला। पाकिस्तान ने छद्म लड़ाकों की मदद से भारत पर हमला कर दिया। कश्मीर हड़पने की साजिश थी। भारतीय सेना आजादी के तुरंत बाद युद्ध के लिए तैयार नहीं थी। झांगड़ के मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना ने खतरनाक हमला बोला और ब्रिगेडियर उस्मान की कमान में लड़ रहे जवानों को पीछे हटना पड़ा। तभी ब्रिगेडियर ने संकल्प लिया, झांगड़ हर हाल में फिर जीतना है।
तीन महीने बाद ब्रिगेडियर (1912-1948) ने फिर मोर्चा संभाला, अपने जवानों से साफ कह दिया, पूरी ताकत से लड़ना है और अपने देश का एक जवान कम नहीं होना चाहिए। नौशेरा में भयंकर लड़ाई हुई। करीब 1,000 दुश्मन मारे गए, 1,000 घायल हुए, जबकि भारत की ओर से 33 जवान शहीद हुए और 102 घायल। बहादुर ब्रिगेडियर साहब को नया नाम मिला नौशेरा का शेर। नौशेरा के यह शेर यहीं शांत नहीं हुए। उन्होंने संकल्प ले रखा था कि जब तक झांगड़ नहीं जीतूंगा, बिस्तर पर नहीं सोऊंगा। वह चटाई पर सोते थे। वह दिन भी आया, जब झांगड़ पर भारतीय ध्वज लहराया, दुश्मन सेना भाग खड़ी हुई। अफसोस, मोर्चे पर ब्रिगेडियर साहब बुरी तरह घायल हो गए थे, पर अंतिम सांस तक उन्हें देश की चिंता थी। वह अपने कमांडरों से यह कहते हुए शहीद हुए कि मैं जा रहा हूं, लेकिन जिस झांगड़ के लिए हम लड़ रहे थे, उसे फिर दुश्मन के हाथों में न जाने देना।
झांगड़ में आज भी तिरंगा लहरा रहा है और याद आ रहे हैं ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, जिन्हें याद करने मात्र से भारतीय जवानों के जोश में ज्वार आ जाता है।
साभार : दैनिक हिंदुस्तान
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