डॉ. नीलम ज्योति
सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है. क्या हमारे पूर्वजों लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे?
वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे. डबल बेड बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं था.
लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं. चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है, लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके. चारपाई बनाना एक कला है. उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।
जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है. रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं. पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस तरह का लाभ पहुंचा सकती है
दुनिया में जितनी भी आराम-कुर्सियां देख लें सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है. बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की जोली का था. लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया.
चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द कभी नही होता है. दर्द होने पर आज भी चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है.
डबलबेड के नीचे अंधेरा होता ह. उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं. वजन में भारी होता है. रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती.
चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है. सफाई भी हो जाती है. सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है. खाट को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं.
अगर किसी को डॉक्टर बेड रेस्ट लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको इंग्लिश बेड पर लेटने से bead -Soar शुरू हो जाता है.
भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है. चारपाई पर ऐसा नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है.
गर्मियों में बेड मोटे गद्दे के कारण गर्म हो जाता है. इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है. चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है. बान की चारपाई पर सोने से सारी रात आटोमेटिकली सारे शारीर का Acupressure होता रहता है.
हमारी देशी ‘चारपाई’ की उपयोगिता और गुण के समझते हुए अमेरिकी कंपनीयां विदेश में 1 लाख रुपये से ज्यादा में इसे बेच रही हैं. हम इसके गुणों को अनदेखा कर बेड पर लेट कर हज़ारों बीमारियाँ ले रहे है. अपनी ही किफ़ायती गुणकारी चीज़ों विदेशों में जाकर उनके मनचाहे पे अपनी देशी चीजें ख़रीद रहे हैं. (चेतना विकास मिशन).





