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*कम उम्र में परचम लहराने वाले नेता थे दिग्विजय सिंह* 

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दिग्विजय सिंह की पुण्य तिथि 25 जून पर विशेश

प्रो. केके त्रिपाठी

स्व. दिग्विजय सिंह का जन्म 14 नवम्बर 1955 को लाल कोठी गिद्धौर जमुई जिला बिहार में हुआ था उनके पिता का नाम सुरेंद्र सिंह तथा माता का नाम श्रीमती सोना देवी था। इनके ही खानदान के पूरनमल जो आठवें वंशज थे, ने 1566 में वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण कराया जी देवघर में स्थित है। उनके पिता कुमार सुरेंद्र सिंह ने ही मुंगेर समाजवादी आंदोलन और सर्वोदय आश्रम कार्यक्रम कर श्रीगणेश और सेखोदेवरा आश्रम की स्थापना कौवाकोला में की थी जो उस समय मुंगेर जिले में था। मधुलिमये ने 1964 में मुंगेर से उपचुनाव लड़ा था और विजयी हुए थे। 1967 के आम चुनाव में यह पुनः उस सीट पर विजयी हुए परिणाम स्वरूप इस क्षेत्र में समाजवाद घर-घर फैल गया। दिग्विजय सिंह भी समाजवादी नेताओं से अधिक प्रभावित हुए और बचपन के दिनों में ही मधुलिमये के सम्पर्क में आए।

दिग्विजय सिंह ने 1974 के छात्र आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत की उस समय वह पटना विश्वविद्यालय के छात्र थे तथा जयप्रकाश नारायण के सम्पर्क में आए सत्तर के दशक में जेपी युवाओं के लिए आदर्श के रूप में उभर कर आए। शिक्षा जैसे मुददों को लेकर 1974 के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1975 के आपातकाल में भूमिगत रहकर कार्य किया तथा 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी की जीत के लिए काम किया। उस समय उनकी उम्र मात्र 22 वर्ष की थी। इसी कारण चुनाव में भाग नहीं ले सके। पटना विश्वविद्यालय से शिक्षा लेने के बाद उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आए और उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। जेएनयू वामपंथी विचारधारा के गढ़ के रूप में जाना जाता है। समाजवादी रुझान के कारण दिग्विजय सिंह सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हूए।और बाद में उन्होंने समता युवजन सभा का निर्माण किया और कैम्पस राजनीति में सक्रिय हो गए। दिग्विजय सिंह में नेतृत्व के गुण की झलकियां जैएनयू में दिखने लगीं। विशेष रूप से जब वे जेएनयू छात्र संघ के महासचिव थे।

एक बातचीत में उन्होंने एक रोचक घटना का उल्लेख किया था। 1980 में जेएनयू की विद्या परिषद की बैठक थी, उन दिनों छात्रसंघ का प्रतिनिधि बैठक में भाग लिया करता था। भारत के पूर्व राष्ट्रपत्ति केआर नारायणन उस समय जेएनयू के कुलपति थे और विख्यात शिक्षा शास्त्री प्रो. मुनीस रजां रेक्टर थे, जो बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बने। विचार विमर्श के दौरान दिग्विजय सिंह को छात्र समुदाय से जुड़े मुददों पर अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिला। उनका प्रस्तुतीकरण इतना प्रभावशाली था कि जब उन्होंने अपनी बात समाप्त की तो प्रो. मुनीस रजा ने टिप्पणी की कि दिग्विजय सिंह आप इतना अच्छा बोलते हैं कि आपको संसद में स्थान मिलना चाहिए। इस बात को जानना बहुत सुखद है कि 1988 में जेएनयू छोड़ने के अगले वर्ष ही वह संसद में आ गए।। प्रो. रजा की टिप्पणी सच हो गई। प्रो. रजा ने दिग्विजय सिंह के संसद में प्रवेश के सम्मान में बधाई समारोह का आयोजन किया था। दिग्विजय सिंह जब दूसरी बार अटल बिहारी वाजपेई की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडल के सदस्य बने तो उन्हें केआर नारायणन ने शपथ दिलवाई जो कभी कुलपति रह चुके थे। वह उस क्षण को अपने जीवन के सर्वाधिक मर्मस्पर्शी और यादगार क्षण के रूप में स्मरण करते थे। 

1983 में दिग्विजय सिंह ने चंद्रशेखर जी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से राजघाट तक प्रसिद्ध यात्रा में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उसी समय से वह चंद्रशेखर के करीब आ गए थे। जब 1988 में जनता दल का गठन हुआ तो चंद्रशेखर जी को “मसौदा नीति का कार्य सौंपा गयीं तो उन्होंनेमसौदा तैयार करने का कार्य यशवंत सिंह, दिग्विजय सिंह और डॉ. आनंद कुमार को सौंप दिया। दिग्विजय सिंह को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का यह पहला अवसर था और उन्होंने स्वयं को अधिक मूल्यवान साबित कर दिखाया।

इसी बीच 1989 में नेशनल फ्रंट का गठन हुआ और इस फ्रंट ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा। दिग्विजय सिंह बांका संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन चंद्रशेखर जी के वीटो लगाने के बावजूद भी टिकट नहीं मिला क्योंकि वीपी सिंह अपने सम्बन्धी प्रताप सिंह को टिकट दिलाने में कामयाब हो गए लेकिन संसदीय बोर्ड ने निर्णय किया कि दिग्विजय सिंह को राज्यसभा की सीट मिलेगी। मार्च 1990 में बिहार से उन्हें राज्यसभा के लिए भेजा गया। युवावस्था में राज्यसभा में प्रवेश निश्चित रूप से मील का पत्थर साबित हुआ। उन्होंने बारहवीं तेरहवीं लोकसभा में बांका संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 2004 में बांका से चौदहवीं लोकसभा का चुनाव लगभग 4000 मतों से पराजित हुए जो कि अप्रत्याशित व अविश्वसनीय था। उन्हें 46.96 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ था। उन्होंने अपने क्षेत्र का विकास बड़ी शिद्दत से किया था किंतु भारतीय लोकतंत्र की यह महानता है कि एक वर्ष के भीतर ही जार्ज फर्नांडीस की पहल पर झारखंड से राज्यसभा के सदस्य के रूप में पुनः संसद में आ गए। जनता दल यू राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य प्रो. केके त्रिपाठी ने बांका से हारने के बाद उनसे चचर्चा में कहा था कि आपको राज्यसभा जाना है तो वह कहने लगे कि त्रिपाठी यह असम्भव है। जब चुने गए तो दूरभाष कर मुझे दिल्ली बुलाया कहा कि तुम्हारी भविष्यवाणी सही साबित हो गई। जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव व नीतीश कुमार ने जब 2009 में बांका से टिकट नहीं दिया तो वह राज्यसभा से इस्तीफा देकर निर्दलीय चुनाव लड़कर संसद में पहुंचकर अपनी प्रतिभा व क्षमता को लोहा मनवाने में कामयाब रहे। उन्होंने स्वयं एक कुशल सांसद के रूप में स्थापित किया। एक मंत्री और विपक्षी दल के सदस्य दोनों ही रूप में संसदीय लोकतांत्रिक संस्थाओं को समृद्ध बनाया। संसद में उनकी वाकपटुता सुविदित है। चार मई 1993 को जब तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा पेश किए गए सामान्य बजट 1993-94 पर उन्होंने अपना भाषण दिया था। तो मनमोहन उनके पास आए और उन्हें बधाई देते हुए कहा कि आपने बहुत बढ़िया भाषण दिया। दिग्विजय ने अपने संसदीय कैरियर में 30 भाषण दिए थे। दिग्विजय हृदय से सच्चे लोकतंत्रवादी थे। दिग्विजय सिंह राजनीति में अपराधीकरण, जातिवादी राजनीति के सख्त खिलाफ थे। एक बार एक चैनल ने दिग्विजय सिंह से प्रश्न पूछा कि आपकी पार्टी में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुछ लोग हैं तो उन्होंने बेबाकी से स्वीकार करते हुए कहा कि मैं राजनीति के आपराधीकरण के खिलाफ हूं और यदि ऐसी पृष्ठभूमि वाला कोई नेता पाटी में है

विदेश मामलों के महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए। चंद्रशेखर मंत्रिमंडल चहुत छोटा भा कितु दिग्विजय सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिग्विजय सिंह को 1999 में अटल मंत्रिमंडल में रेल राज्यमंत्री का कार्यभार सौंपा गया। उन्होंने रेल के विकास तथा रेल कर्मियों की सुरक्षा तथा कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

आजादी के बाद बांका बिहार का ऐसा जिला था जो रेल द्वारा नहीं जुड़ा था। उनकी प्राथमिकता थी कि बांका को रेलमार्ग से जोड़ना। उन्होंने अपने क्षेत्र में रेल परियोजनाएं शुरू की। इनमें से एक भी बांका से भागलपुर मंदार रेलखंड से जोड़ने वाली परियोजना भी थी। जिसको उन्होंने कार्यकाल में पूरा किया। अटल जी उनसे बहुत स्नेह करते थे। इसलिए उन्होंने जुलाई 2001 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुर्शरफ की यात्रा के दौरान मिनिस्टर इन वेटिंग के तौर पर उनकी नियुक्ति की थी। 2002 में उन्हें विदेश राज्यमंत्री का कार्यभार सौंपा गया। उन्होंने पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता तथा मैत्रीपूर्ण रिश्ते बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। दिग्विजय सिंह पंथ निरपेक्षता में विश्वास रखते थे। 2002 में जब गोधरा की घटना हुई थी तो जार्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर अत्यंत साम्प्रदायिक तनाव के समय अहमदाबाद में शांति यात्रा की थी जिससे गुजरात में शांति बहाल में राहत मिली। उन्होंने 2009 का संसदीय चुनव जीतने के बाद मुम्बई में समाजवादियों का जुटान किया तथा लोकमोर्चा का गठन किया। जिसके वे संयोजक चुने गए। बिहार में पूर्व विधान परिषद सदस्य पीके सिन्हा तथा बाद में प्रो. केके त्रिपाठी को उप्र का संयोजक बनाया गया। लोकमीचां के गठन में देश के महान पत्रकार प्रभाष जोशी, चौथी दुनिया के संतोष भारतीय व समाजवादी नेता रघु ठाकुर के अलावा देश के लगभग 200 समाजवादी नेता मौजूद थे। 25 जून को 2010 में उनका निधन ब्रेन हैमरेज से इंग्लैंड में हो गया।

Ramswaroop Mantri

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