कुछ साल पहले उसका परिवार, जेठ, ननंद और बहन के परिवार के साथ गांव से पोर्ट एरिया में पेट का खड्डा भरने के लिए काम की तलाश में आ गया था। यहां आकर मर्द लोग दिहाड़ी पर पेंटर का काम करते थे। महिलाएं घरों का झाड़ू, पोछा कर दो पैसे कमा लेती। पैसों की तंगी तो हमेशा रहती क्योंकि जरुरतें ज्यादा थी और कमाई कम। इसके कारण घर में तनाव बना रहता। पर गाड़ी खींच रही थी।
इस बीच देश में आतंकी हमला और जवाबी हमला हुआ। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने और लोगों की तरह उसे भी संतुष्टि दी थी। फिर माहौल बदलता,बिगड़ता रहा। डर स्थानीय निवासियों के मन में उपज रहा था। पड़ोसी की बदहाल दशा और अपने नेता की गढ़ी हुई छवि पर सबको भरोसा था। आशा जगी थी कि हमेशा का टंटा निपट जाएगा। पहले ब्लैकआउट हुआ। रात भर के लिए । अंदर और बाहर के गर्म माहौल में परिवार रातभर भूनता रहा। नींद नहीं आई। युद्ध के माहौल में पुरुषों को पुताई का काम मिलना बंद सा हो गया था।
ऐसे माहौल में हमेशा की तरह काम करने एक घर में गई। घर की मालकिन बोली- ‘रमिला, यहां का तो माहौल खराब हो रहा है। सभी रिश्तेदार फोन कर रहे हैं कि वहां क्या धन गड़ा है? यहां आ जाओ। फ्लाइट से हम जा रहे हैं। कल से तुम काम पर मत आना।’- हिसाब थमा दिया और बड़बड़ाई- ‘आने जाने का यह खर्चा और आ टपका।’।
एक घर छूट गया। मन उदास हो गया। इतने में खबर फैल गई कि शहर में ड्रोन से हमला हुआ। वीडियो घूमने लगे। शहर बंद कराने पुलिस दौड़ने लगी। उसकी सास का फोन आया- ‘वहां क्या कर रहे हो, मर जाओगे तो यह बुड्ढी तुम्हारा चेहरा भी नहीं देख पाएगी। दो रोटी यहां भी मिल जाएगी। नहीं मिली तो भूखें रह लेंगे। कम से कम जिंदा तो रहेंगे।’
भाई भी बोला- ‘चलो यहां से। अभी तो वाहन की सुविधा है। स्थिति बिगड़ेगी तो फिर वह भी नहीं मिलेंगे। लाकडाऊन के समय हमने भुगता ही है।’
सबका निर्णय था यहां से चला जाए। उसने अपने काम वाले दो घरों में फोन किया और बताया- ‘कल से वह कम पर नहीं आएगी। युद्ध के माहौल में परिवार यहां नहीं रह सकता। हम सब गांव जा रहे है।’
उधर से मालकिन ने पूछा- ‘फिर हमारे काम का क्या होगा?’
‘मैं अपनी जान की सोचूं या आपके काम की!’- डर, तनाव के कारण उसने गुस्से में जवाब दिया।
व्यवस्था होते-होते शाम हो गई। शाम होते ही स्थिति बदल गयी। समाचार आए दोनों देशों में समझौता हो गया। अब घर जाकर क्या करना! दूसरे दिन वह अपने पुराने घर में काम करने पहुंची तो मालकिन ने मना कर दिया गया।
मालकिन बोली- ‘कल तुमने तो मना किया था कि तुम काम पर नहीं आओगी। तुम्हें जान प्यारी है। अब हमने लोकल कामवाली को रख लिया। दो पैसे ज्यादा ले लेगी पर मुसीबत में छोड़कर तो नहीं भागेगी।’
क्या कहती! दुसरा घर भी छुट गया। कुछ दिनों में उसे फिर कोई ना कोई घर तो मिल जाएगा। पर इस महीने के राशन पानी की व्यवस्था तो बिगड़ गई। अगली कक्षा में बच्चे के प्रवेश की फीस और स्कूल के दूसरे खर्चे भी सिर पर है। देशों का युद्ध उसके घर में आएगा ही। सीजफायर तो घर भी हो ही जाएगा, पर बहुत कुछ हारने के बाद। सोचते सोचते नम आंखों को उसने अपनी चुन्नी से कब पौंछ लिया मालूम भी नहीं पड़ा।





