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*संचार माध्यम और हम : फीमेल्स के सत्यानाश और पतियों के मर्डर पर चिल्ल-पों क्यों*

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      सोनी कुमारी, वाराणसी

मोबाइल फोन में सुलभ ऐप्स और चैनल्स क्या दे रहे हैं, इसे तो छोड़िये : आप टेलीविजन को ही लीजिए. 

    एक समय था जब पूरा परिवार साथ बैठकर टीवी देखता था रमायण, महाभारत, समाचार, गीत-संगीत. मतलब टीवी संस्कार का माध्यम था।

लेकिन अब? अब टीवी ऑन करने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है. पता नहीं अगले ब्रेक में कौन- सा आपत्तिजनक दृश्य हमारे बच्चों की मासूमियत पर हमला कर देगा।

     आजकल हर न्यूज़ चैनल, हर शो के बीच में ऐसे विज्ञापन आ जाते हैं जिनमें बोल्ड सीन, भड़काऊ इशारे और अर्धनग्न दृश्य होते हैं।

    परफ्यूम हो या शेविंग क्रीम, पानी की बोतल हो या कपड़े हर चीज़ का प्रचार अब शारीरिक आकर्षण से, जिस्म के अर्ध नग्न प्रदर्शन से किया जा रहा है।

     “मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को….! अब ये गाना गुनगुनाने का नहीं, जीने का सच है. समाज का दृश्य शर्म से चेहरा छुपाने वाला बन गया है।

    क्या ये ज़रूरी है? क्या कोई उत्पाद तभी बिकेगा जब उसमें नैतिक सीमाएं पार की जाएं? अब हालत ये है कि बच्चा कार्टून चैनल पर टॉम एंड जेरी देख रहा होता है और ब्रेक में ऐसा विज्ञापन आ जाता है जिसमें उम्र के हिसाब से अनुचित विषय होते हैं।

    जब मासूम बच्चा पूछता है,  “मम्मी, ये क्या होता है?” तो माँ के पास कोई जवाब नहीं होता. सिर्फ चुप्पी होती है। क्या ये वही भारत है जिसकी संस्कृति की मिसालें दी जाती रही हैं?

    हम सिर्फ ‘ऑन स्क्रीन’ नहीं हार रहे, हम अपने घरों के अंदर ‘संस्कारों की लड़ाई’ हार रहे हैं. हर दिन,  हर चैनल पर हर ऐड ब्रेक में.

   क्या सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं?  क्या चैनलों को TRP के लिए मर्यादा बेच देना मंज़ूर है? क्या हमें अपने ही घर में बच्चों से आँखें चुराकर जीना होगा? हमारे घर का कंटेंट कौन तय करेगा, हम या कॉर्पोरेट मार्केटिंग?

   मैं पूछती हूँ : क्या मैं या मेरे जैसे चंद लोग ही सब सोचें और करें? क्या आपके घर में बच्चे नहीं रहते? क्या आपको भी कभी शर्म महसूस नहीं होती जब स्क्रीन पर ऐसा कुछ आता है? समाज में किस तरह विकृत सेक्स का नंगा नाच हो रहा है, क्या आपको नहीं दिखता?

  आजकल लडके-लड़कियां पाँचवीं- छठी कक्षा से ही ‘सच्चे प्यार’ के नाम पर सेक्स प्रैइक्टिस शुरू कर देते हैं, वो भी अनेकों के साथ. न कोई लाज-शरम, न चरित्र-नैतिकता. बस जिस्म और दौलत की हवस लक्ष्य है. प्रेम मर चुका इस धरती से. ऐसी जमात किस तरह की संतान देगी समाज को?

    अब ऐसी लड़कियां शादी के बाद पति की हत्या करती हैं या पति नामर्द सावित होता है तो हैरानी क्यों? रेप गेंगरेप मर्डर आम है, तो चिल्ल-पों क्यों?

   हमारे मिशन ने एक अभियान समाधान की दिशा में चला रखा है : स्प्रिचुअल सेक्सथेरेपी का अभियान. तमाम समझदार पति अपनी पत्नी को और पेरेंट्स अपनी बेटियों को हमारे डॉ. विकास मानवश्री से प्लेजर दिला रहे हैं. इसका इफेक्ट उनपे यह होता है की, वे नेचुरल और कम्प्लीट सटिस्फैक्शन पाती हैं. इस डिवाइन फीलिंग्स से उनकी चेतना जागृत और विकसित होती है. सम्पूर्ण तृप्ति की अवस्था में रहने से वे बदचलन नहीं बनती. माह में एक रात का प्रयोग काफ़ी सावित होता है.

     सबसे बड़ी बात कोई शुल्क नहीं, कोई दुराचार नहीं.  जिन्हें ‘दुराचार’ होने का भय हो, अपनी पत्नी-बेटी या हमारे डॉ. मानव पर ट्रस्ट नहीं हो वे CCTV का उपयोग कर उसे अपने मोबाइल से कनेक्ट कर सकते हैं. बंद कमरे में होने वाली ऐक्टिविटीज उनकी ऑंखें खोल देगी. और तो और होमसर्विस की सुविधा भी सुलभ है. (चेतना-स्टैमिना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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