-सुसंस्कृति परिहार
बदलाव लेते भारत में पिछले वर्षों में साधु ,महात्माओं और हिंदू धर्म प्रमुख लोगों का विश्वविद्यालयों में जाना और विद्यार्थियों को आध्यात्मिक बनाने की दिशा में भारत सरकार महत्वपूर्ण काम मान रही है। पिछले दिनों डॉ. हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह गौर प्रांगण में गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया।उपाधि पाने वाले छात्र अध्यापक तमाम लोग विशेष पोशाकों में नज़र आए। कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए। मुख्य आकर्षण रहे पद्मविभूषण जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य, जिन्हें विश्वविद्यालय की ओर से पहली बार मानद डी.लिट् की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके लिए महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वीकृति दी है। बताया जा रहा है यह मानद उपाधि कला, साहित्य एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में अभूतपूर्व अवदान के लिए प्रदत्त की जाती है। रामभद्राचार्य ने आध्यात्मिक क्षेत्र के लिए लगभग सौ पुस्तकें लिखी हैं।

कहा यह भी जा रहा है कि उन्हें 22भाषाएं आती है जबकि विदित हो वे जन्मांध हैं। इतना लेखन और इतनी भाषाओं में महारत होना मामूली बात नहीं। दिलचस्प बात यह है कि दीक्षांत समारोह में जब कुलपति महोदया नीलिमा गुप्ता ने विश्वविद्यालय के उन्नयन पर अंग्रेजी में प्रकाश डाला और संचालन भी एक छात्रा ने अंग्रेजी में किया तो रामभद्राचार्य की वेदना उनके भाषण में सामने आई उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि लग रहा मैं इंग्लैंड के किसी विश्वविद्यालय में बैठा हुआ हूं। अंग्रेजी का उपयोग उन्हें नागवार गुज़रा और उन्होंने हिंदी का उपयोग हर विश्वविद्यालय होना चाहिए इस बात को ज़ोर देकर कहा। संभव है कि इन महान महामना के विचारों को केंद्र जल्द अपनी स्वीकृति भी दे दे। विदित हो रामभद्राचार्य जी द्वारा पिछले दिनों अपने मुखारबिंद से पहली बार नीच और अधम ब्राह्मणों की बात कही गई।तो उनके आध्यात्मिक ज्ञान का अंदाजा लगाया जा सकता है ।रामभद्राचार्य कहते हैं -कि चौबे,पाठक,उपाध्याय, पांडेय ,ये बढ़िया ब्राह्मण नहीं होते अधम नीच होते हैं।हम लोग इनके साथ रोटी बेटी का सम्बंध नहीं करते थे। ये पैसा लेकर शिक्षा देते हैं।जो गौ मांस खाने से भी बुरा है। जिस पर काफी समय कोहराम मचा रहा।
ऐसे महामना को विश्विद्यालय में भेजकर विद्यार्थी वर्ग को क्या संदेश दिया गया यह केंद्र सरकार ही भली-भांति जानती होगी।निर्णय है उसका । निश्चित ही वे शिक्षा में भगवा कल्याण की ही बात कह रहे होंगे। यहां यह भी हमें स्मरण करना चाहिए कि उन्होंने हमारे सेनाध्यक्ष से गुरु दक्षिणा में पाक अधिकृत कश्मीर मांगा था। इसमें उनका राष्ट्रप्रेम छलकता है। खैरियत है उन्होंने पुराने पूरे विस्तृत हिंदुस्तान की मांग नहीं की।वे पूरे देश को भ्रष्टाचार मुक्त देखने की बात भी कह देते हैं।
ऐसे महामनाओं का पिछले दस वर्षों से विश्वविद्यालयों में आना हो रहा है जिससे आध्यात्मिक भगवा वातावरण बन रहा है। देवी सरस्वती की प्रतिमा लगभग सभी विश्वविद्यालयों के द्वार पर विराजमान हो चुकी है।
आपको याद होगा बीएचयू में माननीय कुलपति महोदया ने मोदीजी जैसे महामानव का जन्मदिन जिस उत्साह से मंत्रोच्चार के बीच मनाया उसे भुलाया नहीं जा सकता।वह एक ऐतिहासिक कदम था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति महोदया को सुबह की अज़ान से नींद में खलल होता था तो उन्होंने माईक का मुंह दूसरी ओर करवा दिया और वाल्यूम घटवा दिया गया। इंदिरा गांधी जनजाति विश्वविद्यालय अमरकंटक में महामंडलेश्वर का उद्बोधन होना भी अध्यात्म की ओर ले जाने की पहल का हिस्सा है।अब तो जेएनयू में भी विद्वत जनों में भाजपा नेता नरेन्द्र सिंह तोमर और मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीडी
शर्मा जैसे लोग भी भगवा रंग में विश्वविद्यालय को रंगने पहुंचने लगे।अगला नंबर पद्मश्री ऋतंभरा जी का आ सकता है।योग पुरुष भी यकीनन पहुंचेंगे।गोरख पीठाधीश्वर योगी तो सबसे उचित पात्र होंगे। आजकल धीरेन्द्र शास्त्री की विदेशों में बड़ी धूम है है।उनका भी उपयोग होना चाहिए।
कुल मिलाकर आज देश के युवाओं को वैज्ञानिक और तकनीकी और तर्कसंगत शिक्षा से दूर करने का यह बड़ा षड्यंत्र है। इसके ख़िलाफ़ मुहिम इनके विद्यार्थियों और अध्यापकों को ही उठानी होगी। जेएनयू और डीयू जब तब सरकार की इस नीति का विरोध करते नज़र आते हैं हाल ही में डीयू ने अपने यहां जिस तरह मनुसंहिता ना पढ़ाने का विरोध दर्ज किया है वह सराहनीय है।एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में शिक्षा का भगवाकरण देश को रसातल में ले जाने वाला बड़ा कारक है।





