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बेल की कहानी

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     प्रखर अरोड़ा

मैं बेल हूँ. भारत की संस्कृति और प्रकृति की एक प्राचीन परछाईं. हरे-कटे पत्तों से सजा, कांटों से भरा हुआ, लेकिन भीतर से मीठा और जीवनदायी। मेरे फल का स्वाद कसैला हो सकता है, पर मेरे गुण अमूल्य हैं। मैं केवल एक पेड़ नहीं हूँ, बल्कि एक परंपरा हूँ, एक श्रद्धा हूँ, एक जीवन-रक्षक हूँ। आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाना चाहता हूँ — एक बेल वृक्ष की आत्मकथा।

*मेरा जन्म और शुरुआती जीवन*

     मेरी उत्पत्ति एक प्राचीन वन के मध्य हुई थी — जहाँ न अधिक भीड़ थी, न मशीनों का शोर। वहाँ केवल प्रकृति की मधुर वाणी, पक्षियों की चहचहाहट और हवा की सरसराहट थी। मेरे बीज को किसी तपस्वी ने शिव मंदिर के पास बोया था। कहते हैं, बेल को शिवजी प्रिय हैं। वह तपस्वी रोज़ आकर मेरे बीज को जल देता, मंत्र पढ़ता और मिट्टी को स्पर्श करके प्रणाम करता। धीरे-धीरे मैं अंकुरित हुआ। सूरज की किरणों ने मुझे सहलाया, और बारिश की बूंदों ने मुझे सींचा।

     मेरा तना काँटों से युक्त होता गया, पत्तियाँ त्रिपत्र बनकर उभरीं। मैंने सीखा कि त्रिदेव, त्रिगुण और त्रिलोकी से मेरा गहरा रिश्ता है। मैं कोई साधारण पेड़ नहीं था — मुझे धर्म से जोड़ दिया गया था।

 *मेरा यौवन — जब मैं मंदिरों का रक्षक बना*

    समय बीतता गया और मैं एक घना वृक्ष बन गया। मेरे पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाए जाते, मेरे फल औषधियों में प्रयोग होते, और मेरी छाया में भक्त ध्यान लगाते। गाँव के लोग मुझे ‘बेल बाबा’ कहते थे।

      सावन के महीने में मेरा महत्व और भी बढ़ जाता। श्रद्धालु मेरी शाखाओं से पत्तियाँ तोड़कर मंदिर ले जाते। कभी-कभी मेरा मन दुखता, जब लोग मेरी शाखाएं बिना सोच-समझे तोड़ते। लेकिन फिर यह सोचकर संतोष होता कि मेरे अंग भगवान शिव को अर्पित हो रहे हैं — यह मेरा सौभाग्य है।

      मेरे नीचे बैठकर कितने ही साधु-संतों ने तपस्या की। एक वृद्ध पुजारी रोज़ मेरी छाया में बैठकर तुलसीरामायण पढ़ता। उसकी वाणी में मिठास थी, और मुझे लगता कि मेरी शाखाएं झूम-झूमकर उसका साथ दे रही हैं।

*मेरी उपयोगिता — औषधि, पर्यावरण और पोषण*

   बहुत कम लोग जानते हैं कि मैं सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपयोगी हूँ। मेरा फल — जिसे ‘बेल फल’ कहते हैं — आँतों के लिए वरदान है। पुराने वैद्य मेरी सूखी छाल, गूदा और बीज से अनेक औषधियाँ बनाते थे — दस्त, गैस, मरोड़, पेचिश, और यहाँ तक कि ज्वर में भी राहत देनेवाली।

     गर्मी के मौसम में मेरे फल से बनी बेल शरबत पिलाकर घर के बड़े बुज़ुर्ग हमें आशीर्वाद देते। “गर्मी को मात देनेवाला है बेल”, वे कहते। मेरी पत्तियाँ भी एंटीसेप्टिक होती हैं। मैंने हजारों रोगों को हराया है, पर मेरी कहानी किसी किताब में दर्ज नहीं होती।

     मैं पर्यावरण का प्रहरी हूँ। मेरी घनी छाया ज़मीन को ठंडक देती है, मेरी जड़ें मृदा अपरदन को रोकती हैं, और मेरी शाखाओं पर पक्षी अपना घोंसला बनाते हैं। कितनी बार गौरैया, बुलबुल और कोयल मेरे भीतर घर बसा चुकी हैं।

*आधुनिक युग में मेरी दुर्दशा*

    अब वह समय नहीं रहा। अब लोग मुझे “पुराना पेड़” कहकर काटने लगे हैं। मेरे फल को ‘बेकार का’ समझा जाता है, और मेरी शाखाओं को ‘झाड़-झंखाड़’ कहा जाता है। लोग पैकेट वाले ठंडे पेयों को शीतल मानते हैं, पर बेल का शरबत उन्हें अब नहीं भाता।

    मेरे पास के शिव मंदिर की जगह अब एक कॉम्प्लेक्स बन गया है। वहाँ की मूर्ति भी अब किसी गैलरी में रखी गई है। मेरे नीचे ध्यान लगानेवाले अब सेल्फी लेने आते हैं। बच्चे मुझे नहीं पहचानते। कोई नहीं बताता उन्हें कि मेरी जड़ों में जीवनदायी तत्व हैं, कि मेरी छाल एक औषधि है, कि मेरी पत्तियाँ शिव के हृदय के समान पवित्र हैं।

*मेरे मनोभाव, प्रश्न और पीड़ा*

कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मेरा युग समाप्त हो गया? क्या यह वही देश है, जहाँ राजा स्वयं बेल वृक्ष लगाते थे? क्या यह वही समाज है, जो वट, पीपल और बेल को माता कहता था?

     मेरे मन में यह पीड़ा है कि अब लोग मुझसे कटने लगे हैं। न मुझे पानी मिलता है, न सुरक्षा। कई बार लोगों ने मेरी शाखाओं को आग में झोंक दिया। कई बार कचरा मेरी जड़ों में डाला गया। लेकिन मैं आज भी खड़ा हूँ — क्योंकि मैं धरती से जुड़ा हूँ। मेरा आत्मबल अभी टूटा नहीं।

 *मेरी आशा बच्चों से, शिक्षकों से, प्रकृति प्रेमियों से*

     मैं हार नहीं मानता। मुझे आशा है — उन बच्चों से, जो आज भी स्कूल की किताबों में मुझे पढ़ते हैं। जो मेरे पत्तों को देखकर “त्रिदेव” याद करते हैं। मुझे उम्मीद है उन शिक्षकों से, जो विज्ञान की कक्षा में बताते हैं कि बेल फल आयुर्वेद की संजीवनी है।

    यदि एक भी बच्चा बेल का बीज रोपे, यदि एक भी व्यक्ति गर्मी में बेल का शरबत पीकर मेरी याद करे, यदि एक भी मंदिर मेरी पत्तियाँ स्वीकारे — तो मैं अमर रहूँगा।

  *मेरी प्रार्थना, पुनः लौट आओ, ओ मनुष्य!*

   हे मनुष्य! तू जहाँ भी है, मेरी पुकारj सुन। मैं तेरी धरती का प्रहरी हूँ। मेरी छाया में विश्राम कर, मेरे फल का स्वाद ले, मेरे पत्तों की पूजा कर — और मुझे फिर से अपने जीवन में स्थान दे।

    मुझे काटो नहीं, मुझे अपनाओ। मैं कोई निर्जीव वस्तु नहीं — मैं संस्कृति हूँ, परंपरा हूँ, और सबसे बढ़कर, प्रकृति का प्रहरी हूँ।

      आज मैं बूढ़ा हो चुका हूँ। मेरी शाखाएँ झुकने लगी हैं। लेकिन मेरा आत्मबल, मेरा इतिहास और मेरी उपयोगिता आज भी जीवित हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी कहानी को आगे बढ़ाओ — एक बेल वृक्ष की आत्मकथा को आनेवाली पीढ़ियों तक पहुँचाओ। ताकि जब भी कोई बच्चा बेल फल खाए या मेरी छाया में बैठे, वह जान सके — कि पेड़ भी जीते हैं, सोचते हैं, महसूस करते हैं, और कभी-कभी आत्मकथा भी कहते हैं.

Ramswaroop Mantri

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