-सुसंस्कृति परिहार
यूं तो आम जीवन में पचहत्तर वां साल प्लेटिनम जयंती के रुप में जश्न के रूप में मनाया जाता है किंतु यह साल जीवन में सत्ता सुख से वंचित करने वाला सवाल बनके आएगा ऐसा इन दोनों महामनाओं मोहन भागवत और मोदीजी ने कभी सोचा ना होगा।अपने आपको तुगलक समझने वाले ये लोग अपने बनाए नियमों में इस कदर फंस गए हैं कि कुछ सार्वजनिक तौर पर कहते नहीं बन रहा ।इस धर्मसंकट में पड़े भागवत और मोदी को देखकर लालकृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुमित्रा महाजन मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे। उधर मोदी और संघ से परहेज़ करने वाले लोग भी बदलाव आशा की उम्मीद लगा रहे होंगे।

लेकिन जनाब ये अजीबोगरीब मुश्किल वक्त है जब दोनों सितमग़रों के जन्मदिन सितम्बर की 11(मोहन भागवत) और 17तारीख़ को (नरेंद्र मोदी ) है। यानि मोदी को चादर उढ़ाने की बात प्रतीकत्मक रुप से कहने वाले मोहन भागवत पहले यानि 11सितंबर को 75 के हो जाएंगे। यदि वे चादर पहन बैठ जाते हैं तो 17 को मोदीजी भी शायद अनुसरण कर सकते हैं।पर जैसे कि संकेत मिल रहे हैं कि यह नियम संघ के लिए नहीं बना है यदि भागवत स्थापित रहते हैं तो मोदी को चादर चढ़ाना आसान नहीं होगा।वैसे उनका मूड बता रहा है कि वे पूरे पांच साल पद पर बने रहना चाहते हैं।संघ फुफकार सकता है लेकिन उन्हें काट नहीं सकता है।ये जगजाहिर है।
इसीलिए अब भाजपाध्यक्ष के लिए संजय जोशी की जगह वसुंधरा राजे और नितिन गडकरी में से किसी के नाम पर सहमति बनाने को संघ सहमत दिख रहा है किंतु संजय जोशी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मांग रहा है।ताकि अंदर की खबरें संघ मुख्यालय को मिलती रहें।वह भी और भी शिथिलता बरतते हुए उन्हें पूरा कार्यकाल नियम विरुद्ध दे सकते हैं।
इसलिए पचहत्तर साल के होने जा रहे दो महामनाओं के बारे में सारे कयास विफल होने की स्थिति बन रही है।ये दोस्ती हम ना छोड़ेंगे के स्वर फिर सुनाई देने लगे हैं। अंदरूनी खबर रखने वाले तो पहले से ही कह रहे हैं कि संघ को मोदी जैसा दूसरा कोई हासिल नहीं हो सकता। उन्होनें संघ विद्या से ही संघ को ललकारा है और नड्डा से साफ़ तौर पर कहलवाया है कि अब भाजपा को संघ की ज़रुरत नहीं।आज के दौर में जबअमेरिका और चीन भारत में मोदीजी जैसे प्रधानमंत्री को अपने मतलब के लिए बनाए रखना चाहता है तो संघ क्यों नहीं चाहेगा।
अगर ये सच है तो मोदी को हटाना फिलहाल टेढ़ी खीर होगा। फिर संघ को अपना सौवां साल भी मनाना है। बिना सरकार के कैसे वह सफल नहीं हो सकता ?
बेशक ,संघ और भाजपा के चरित्र को समझना बहुत कठिन है वे कब कहां कैसी पल्र्टी मार दें। विचित्र बयान दें और मुकर जाएं। कहां गौमांस की वकालत कर दें कहां बिफर पड़े।आरक्षण हटाने, जातिगत जनगणना से इंकार और फिर करार। आतंकी साए की तरह दहशत में जनता और लोकतांत्रिक ढांचे का कचूमर निकाल दें और संविधान, बापू और अंबेडकर की जय-जयकार करें। ऐसा दोगला मिज़ाज कुछ भी असंभव को संभव कर सकता है। एक जैसे डीएनए कहने के बावजूद अल्पसंख्यकों और दलितों , पिछड़ों के साथ जो अमानवीय व्यवहार तार देखा जा रहा और हिंदुत्व के नाम पर देश में साम्प्रदायिकता फैलाने में इनकी बराबरी भला कौन सकता है।
एक विकासशील भारत को मनुवादी सोच से पुरातन भारत के लिए समर्पित ये दोनों एक हैं। एक जुट हैं। इन्हें सत्ता विमुख करना आसान नहीं है किंतु जनता की जागरूकता ही हर मोर्चे पर सतर्क रहकर इन्हें विफल कर सकती है।यदि वह सोती रही तो देश चंगु मंगु अपनी स्थापना के लिए देश को बेच दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।आज देश बर्बादी की कगार पर है।इसे समझना और समझाना होगा।वरना सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान ये जुगल जोड़ी नेस्तनाबूद कर देगी।





