बादल सरोज
अब चलते हैँ कामरेड.
‘नहीं चाय पीकर जाइये।’
हमने चाय की मना कर दी थी.
‘मगर हमने तो हाँ की है ना.’
और उसके बाद उन्होंने चाय लाने के लिए आवाज लगाई और चाय आ गयी।
(यह इसी 8 जुलाई को सान्याल दा से उनके घर में हुई आखिरी मुलाक़ात के संवाद हैँ। )
24 जुलाई के लोकजतन सम्मान के आयोजन की तैयारी में लगभग पूरा रायपुर घूमकर पी सी रथ के साथ उनके घर पहुंचे थे और वे 4 घंटे डायलिसिस कराके कुछ घंटे पहले ही घर लौटे थे। स्वाभाविक ही देह से अशक्त थे, हमसे मिलने भी बैड रूम से ड्राइंग रूम तक 10 कदम की दूरी व्हीलचेयर से तय करके पहुंचे थे। मगर न चेहरे पर शिकन थी, न बातचीत में थकन। हमेशा की तरह पोलिटिकली अलर्ट और आर्गेनाइजेशनली चैतन्य, स्फूर्त और प्रेरक। पूरे आत्मविश्वास के साथ वर्तमान और भविष्य पर बतियाते हुए। जबकि अगली सुबह ही उन्हें वेंटीलेटर पर जाना पड़ा था, जहाँ से वे आज सुबह अंतिम यात्रा पर निकल गये।
वे पिछली कुछ वर्षो से लगातार डायलिसिस पर थे। डायबिटीज ने उनकी किडनी प्रभावित कर दी थीं। इसके चलते उनकी दैहिक सक्रियता प्रभावित हुई मगर परामर्श और सामाजिक विमर्श के दूसरे माध्यम और साधन उन्होंने ढूंढ़ लिए।
हाल के दशकों से सान्याल दा – कामरेड बिश्वनाथ सान्याल – की पहचान बीमा कर्मचारियों के अद्भुत एकजुट जुझारू संगठन AIIEA और मध्य क्षेत्र में उसकी इकाई CZIEA के असाधारण नेता के रूप में है। नि:संदेह वे थे, हैँ, रहेंगे। मगर वे सिर्फ बीमा आंदोलन के नेता नहीं थे, वे रायपुर के असंगठित मजदूरवर्ग की लड़ाइयों के योद्धा और संगठनकर्ता थे। उनकी अगुआई में रायपुर के प्रेस कर्मचारियों, अखबारों के कर्मचारियों की हड़तालें हुई। कई और यूनियने बनी। वे छत्तीसगढ़ सीटू के महासचिव और अध्यक्ष रहे। माना के शरणार्थी कैम्प के नागरिकों की समस्याएं उठाई उन्हें दण्डकारण्य में बसे शरणार्थियों की उस लड़ाई से जोड़ा जिसका नेतृत्व सीपीएम कर रही थी / है। वे खुद तबके पूर्व पाकिस्तान – अब बांग्लादेश – के बारिसाल जिले में कक्षा 4-5 तक पढ़कर विस्थापित होकर आये थे। उनका दर्द जानते थे।
1980 के दशक में टी आई टी कॉलोनी, टिकरापारा के ऊपर के माले का उनका ढाई कमरों का छोटा सा घर सेंटर था। छात्रों और युवाओं की टोलियाँ सुबह से देर शाम तक जमी रहती थीं … भाभी जी की अन्नपूर्णा छाया, मोना और बाबू की उत्साही वालंटियरी में एस एफ आई बढ़ाने, बाकी संगठन बनाने के मंसूबे साधे जाते थे :कुल जमा ये कि इंक़लाब की योजना बनती थी।
इनमें से अनेक युवा छ्ग और साझे मध्यप्रदेश के वाम जनवादी आंदोलनों के प्रमुख नेता बने, ट्रेड यूनियन लीडर बने, जो सीधे एक्शन में नहीं आये वे जहाँ भी रहे अपनी क्रिएटिविटी से अपनी अलग पहचान बनाई।
केंद्रीय भूमिका में रहने के रिवॉर्ड्स और हज़ार्ड्स दोनों हैँ। सबके साथ होते हैँ। मगर यह गारंटीड है कि इस या उस से सहमत, असहमत, सम्मत, विमत होने के बाद भी उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। सान्याल दा के साथ यह था : बरसों से मैदानी भूमिका से अलग रहने, पदों पर भी न होने के बाद भी उनकी भूमिका थी। सदा की जैसी भूमिका थी। यह उन्हें पता था। उसका संयमित उपयोग करना उन्हें आता था।
जैसे, 8 जुलाई को जब चाय पीकर उठने लगे तो उन्होंने पूछा कि 24 जुलाई के आयोजन का खर्चा कैसे जुटाया जा रहा है। उन्हें संक्षेप में बताया कि अभी तो कुछ नहीं है। हालात समझते हुये खुद उन्होंने वह पेशकश की, जिसे करने की हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी : उनके हॉस्पिटल पहुँचने के बाद भी वह काम हुआ।
8 जुलाई की शाम उनसे और धर्मू से एक साथ मिलना था। मगर धर्मराज Dharmaraj Mahapatra को हड़ताल पूर्व के मशाल जलूस में जाना पड़ गया। इस पर चुटकी लेते हुए सान्याल दा ने कहा था कि जिस दिन शादी होनी थी उस दिन भी धर्मराज दूल्हे की पोशाक में ही आंदोलन में पहुँच गये थे। इधर घर वाले दूल्हे को तलाश रहे थे, उधर मानव श्रृंखला वाले अपने बीच उन्हें दूल्हे की ड्रेस में खड़ा देख अचरज से निहार रहे थे।
कहानियाँ अनेक हैँ, मगर कहानियों की विडंबना है कि वे होते सोते में कम न होने पर अधिक और बार बार याद आती हैँ। सान्याल दा से जुड़ी कहानियां भी इसी तरह याद आयेंगी। आती रहेंगी।
अभी रायपुर से 1681 किलोमीटर दूर हैँ। अपनी पार्टी की मप्र राज्य समिति के तथा पुनर्गठन के बाद छ्ग राज्य सचिवमंडल के सदस्य रहे कामरेड बी सान्याल को श्रद्धांजलि दे रही मुरैना जिला समिति की कैलारस में चल रही बैठक में मौन खड़े हैँ।
अलविदा का लाल सलाम कामरेड Bishwanath Sanyal सान्याल दा। आप रहेंगे हमेशा हमारी कोशिशों, उम्मीदों और संघर्षो में।





