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*ऊंची जाति ने त्याग दिया है कावड़ यात्रा को, कावड़ यात्रा में अब सिर्फ बेरोजगारों, पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासियों के बच्चे* 

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मदन कोथुनियां

सावन में होने वाली कावड़ यात्रा को अब कथित ऊंची जाति के तबके ने त्याग दिया है। सवर्ण समाज के बच्चे स्कूल जाते हैं, अंग्रेजी स्कूलों और विदेशों में पढ़ते हैं। कावड़ यात्रा अब सिर्फ पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासियों के बच्चे करते हैं।

आप चाहें तो कावड़ यात्रियों का सर्वे भी कर सकते हैं। उनके जनेऊ भी चेक कर सकते हैं।

मां लोगों के घरों में चौकाबर्तन कर के घर को चला रही है, पिता मजदूरी कर रहे हैं या फिर किसी प्राइवेट कंपनी में छोटी मोटी नौकरी कर परिवार के लिए रोजी रोटी का बंदोबस्त कर रहे हैं और जवान बेटा भगवा गमछा पहन कर धर्म की रक्षा में जुटा है। ऐसे बेकार ज्यादातर SC, ST और OBC में ही बहुतायात से पाये जाते हैं।

सावन-भादों के मौसम में अकसर लोगों को रंग बिरंगे, पचरंगे, सतरंगे झंडेझंडिया लिये जयकारे लगाते पैदल सड़कों पर यात्रा करते देखा जा सकता है। जयपुर इलाके में डिग्गी कल्याण की पदयात्राएं, तो अजमेर की तरफ जाने वाले रास्तों पर ख़्वाजा के जायरीन, कहीं सवाईभोज के दीवाने तो कहीं जोगमाया के चाहने वाले….। सबसे ज्यादा भीड़ सड़कों पर इन दिनों रामदेवरा जाने वाले जातरुओं की है। भगवा रंग में रंगे कावड़िये तो पूरे देश भर में नजर आते हैं।

झंडा उठाए इन भक्तगणों की सोशल प्रोफाइल देखने, इन के चेहरे पढ़ने, इन की माली, सामाजिक पृष्ठभूमि पर चिंतन मनन करते हैं, तो साफ जाहिर होता ये दलित, पिछड़े व आदिवासी जमात के गरीबगुरबे, किसान, मजदूर, बड़ी संख्या में दलित आदिवासी अथवा किसान जातियों के लोग।

हालांकि यह कीमती वक़्त इन के खेतों मे होने का है। इस समय फसलें आकार ले रही होती हैं, खेतों को निराई गुड़ाई की सख्त जरूरत रहती है,  नदी नाले, तालाब एनीकट व खेतों के भरने फूटने के दिन हैं, जल संचय का मौसम है, अपनी आजीविका के साधन संसाधनों को सहेजने संभालने का समय है, लेकिन ये अपना घर बार छोड़ कर निकल पड़े हैं। इन गरीबों मेहनतकशों को ईश्वर की तथाकथित कृपा चाहिए, इन्हें देवी देवताओं का आशीर्वाद हासिल करना है, सो ये झंडा ले कर निकले पड़े हैं।

घर बार, गाय भैंस, बैल बकरी, बाल बच्चे सब छोड़ आए है। इन्हें कल्याण धणी, रामसा पीर और ख़्वाजा साहब की रहमत की दरकार है। ये मेहनत करने वाले हाथ भिक्षा की मुद्रा में हैं। इन का खुद से भरोसा उठ चुका है। ये सड़कों पर, मंदिरों और मजारों पर धोक लगाते फिर रहे हैं। इन पर आसमानी कृपा बरसेगी, ऐसा इन को यकीन है।

इन पैदल चल रहे लोगों में अपवाद स्वरूप ही कोई दुकानदार, फैक्ट्री का मालिक, मिल वाला होगा अथवा सरकारी कर्मचारी ने छुट्टी ले कर इस तरह पैदल जाना गवारा किया होगा।

कौन समझदार इस मच्छरों और सांपों के सीजन में, बारिश और कीचड़ में अपनी परेशानी भोगने इस तरह सड़क पर निकलेगा, लेकिन आस्था के नाम पर जो निकल पड़े हैं, उन में से कई लोग दुर्घटनाग्रस्त होंगे, वापस घर नहीं पहुंचेंगे, कई सर्पदंश के शिकार होंगे, कइयों को कुचलकर मरना पड़ेगा, कुछेक बारिश के पानी में बह जाएंगे।

इस दुश्चक्र में फंसे लोग बड़ी मासूमियत से कहते है कि उन्होंने बाबा के पैदल जाने की मनौती कर रखी है। पैदल चलना ठीक है, पर अक्ल से पैदल होना बहुत खतरनाक है। अपने समय और संसाधनों का ऐसा अपव्यय मत कीजिए। हर साल पैदल निकल कर क्या हासिल हुआ है। जब आज तक नहीं हुआ तो आगे भी नहीं होगा।

यह आध्यात्म का नहीं, बरबादी का रास्ता है। अपने खेत खलिहान, रोजी रोटी और घर परिवार को संभालने संवारने के इस कीमती वक्त में अंधभक्ति की अंधेरी सुरंग में धंसने का वक्त नहीं।

इस मसले पर सामाजिक कार्यकर्ता व विचारक प्रेमाराम सियाग कहते हैं, ” ये पदयात्रा या कांवड़ यात्राएं नहीं, अपनी दुर्गति को बुलावा है। सिर्फ रामरसौडों के चायनाश्ते और खानेपीने के चक्कर मे अपना कीमती वक़्त बर्बाद करना है। इस तरह चलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। थोड़ा ठहर कर सोचिये और घर लौट जाइये। अच्छा काम कीजिये, मस्त रहिये, कानून को मानिये, सभ्य नागरिक बनिये, मेहनत से ही खुशहाली आएगी तो तथाकथित देवता भी आप की आराधना करने खुद आएगा।”

बेकारी में कामकाजी होने का भ्रम

पैदल और कावड़ यात्राएं ही नहीं, मेहनतकश दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के युवा आजकल घर घर घूम कर चंदा एकत्रित कर के भजन संध्याओं का आयोजन कर रहे हैं। भागवत व सत्यनारायण की कथाओं के बड़ेबड़े पांडाल खड़े कर रहे हैं। राम लीलाओं में जयकारे लगा रहे हैं। शोभा यात्राओं की झांकियां कंधों पर उठाए घूम रहे हैं। मंदिर निर्माण के लिए चंदा एकत्रित कर के बड़े बड़े झंडे चढ़वा रहे है। धार्मिक जुलूसों में रंगबिरंगे झंडे लहरा रहे हैं। 

राजनेताओं की रैलियों में झंडे जयकारों का भार उठा रहे हैं। रात दिन व्हाट्सएप्प/फेसबुक पर धर्मरक्षा की जंग लड़ रहे हैं। अपने धार्मिक/राजनैतिक आकाओं के लिए अपने परिवार रिश्तेदारों तक से लड़ाई लड़ रहे हैं। धर्मगुरुओं व सियासी लोगों की रक्षार्थ गालियों का अकूत भंडार दिमाग में भर कर चल रहे हैं।

जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसान, गरीब, दलित, पिछड़ी जमात के युवा बेहतर स्कूल व कॉलेज के लिए लड़ें। बेहतर चिकित्सा व्यवस्था के लिए संघर्ष करें। सर्दी गर्मी में तड़पते किसानों के लिए बेहतर व्यवस्था के लिए रण करें। अन्याय व अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाएं। समता मूलक समाज निर्माण के लिए मेहनत करें। वैज्ञानिक सोच द्वारा नवाचार कर के बेहतर समाज व देश का निर्माण करें। देश की हिफाजत के लिए बेहतर तकनीक व हथियारों का निर्माण करें। सामाजिक न्याय द्वारा समानता, स्वतंत्रता व बंधुता का माहौल तैयार करें। उद्योग, कारखाने स्थापित कर के रोजगार सृजन करें।

हमें लग रहा है कि युवाओं की जवानी बेरोजगारी में बर्बाद हो रही है, मगर असल मे ऐसा नहीं है। मंदिर निर्माण योजना, पांडाल बनाना खोलना, जुलूसों में झंडे उठा कर चलना, जयकारे लगाना, कावड़ ढोना, साला सरखाटू की पैदल यात्रा करते हुए सवामणी करना आदि सब रोजगार ही तो है। 

पंडों की कमाई की नई तरकीब

अकसर धर्म को कर्म, सेवा व भक्तिभाव से जोड़ कर देखा जाता है। कावड़ उत्सव हो या पदयात्राएं, इन में भी आख़िर सवर्ण तबका ही बाज़ी मार रहा है। पिछड़े, दलित देहाती सोचते हैं कि पसीना निकालने से ही धर्म कमाया जाता है, पसीना निकालना ही भक्ति भावना है। सवर्ण तबके के लोग जो हमेशा दिमाग़ से खेलते हैं, हार्ड वर्क की बजाय सॉफ़्टवर्क में विश्वास रखते हैं।  

इस सवर्ण तबके ने कावड़ उत्सव में भी धर्म कमाने की, भोले को मनाने की नई तरकीब खोज निकाली है। इन्होंने तदबीर बनाई कि जितने भी कावड़िये आते है इन की सेवा के लिए शिविर लगाए जाए। शिविरों में कावड़ियों के लिए खाने पीने की हर तरह की व्यवस्था की जाती है।  ये अपनी औरतों सहित कावड़ियों के पैर गर्म पानी से धोते हैं। इन का मानना होता है कि ये सेवा कावड़ लाने से भी बड़ी सेवा व भक्ति है। 

देहाती इन की इस सेवा में ही ख़ुश हो लेते हैं और मारे ख़ुशी के अरंड के पौधे पर चढ़ जाते हैं कि असली शिवभक्त तो हम ही हैं। ये शिविर और ये सेवा देहातियों को कावड़ लाने में और ज़्यादा प्रोत्साहित करती है और एक प्रकार से इस प्रोत्साहन से हर बार कावड़ उत्सव में कावड़ियों की संख्या बढ़ती जाती है जिस से ऊंची जाति के इन ब्राह्मण बनियों के बाज़ारों में रौनक़ आती है। उस रौनक़ में से कुछ हिस्सा शिविरों में लगा देते हैं। 

देहाती ये कभी नहीं सोचते कि इस भक्ति तपस्या की ज़रूरत तो तुम से ज़्यादा इन को है क्योंकि इन की कमाई ठगी बगी की बुनियाद पर टिकी होती है और तुम्हारी कमाई तो बीसनूहवा की कमाई है, सत् की कमाई है । इस लिहाज़ से देखा जाए तो ये कावड़ इन ऊंची जाति वालों को लानी चाहिए पर ये दिमाग़ से खेलते हैं, बिना पसीना बहाए और ‘ सॉफ़्टवर्क’ यानी कम मेहनत से कावड़ियों से ज़्यादा धर्मपुण्य कमाने का दावा करते हैं और अपने बाज़ारों को गर्म रखने के नुस्ख़े भी खोजते रहते हैं। 

धर्मक्षेत्र हो या कोई और, आख़िर में जीत इन के सॉफ़्टवर्क की ही होती है। हार्डवर्क वाले बने ही हाड़ तुड़वाने के लिए हैं। आख़िर में वो परमात्मा, खुदा, भगवान, गॉड जो कोई भी है, वह भी इन सॉफ़्टवर्क वालों की तरफ़दारी करता है क्योंकि हर कोई सयाने की ही तरफ़दारी या बड़ाई करता है बावले की नहीं, ये बात देहातियों को पता नहीं कब समझ आएगी।

बेकारी का आईना कांवड़ियों की भीड़

कांवड़ियों की बढ़ती भीड़ के मद्देनज़र पिछले दिनों मानवतावादी विश्व समाज के अध्यक्ष व एसपी किशन सहाय ने कहा था कि ” कांवड़ियों की जो भीड़ बढ़ी है, वो साबित करती है कि बेरोजगारी कितनी विकराल हो गई है?” किशन सहाय के इस बयान को मीडिया ने भले ही हिन्दू धर्म के खिलाफ विवादास्पद व हिंदुओं का अपमान बताया हो, लेकिन एक आम जागरूक नागरिक के नजरिये से देखें तो इस में गलत क्या है ? 

जब व्यवस्था से लोग नाराज होते हैं तो अन्धविश्वास में फंसते हैं। जब बेरोजगारों को सत्ता रोजगार नहीं दे पायेगी तो बेरोजगार युवा ठाले बैठे क्या करेंगे?  कावड़ लाने ही तो जायेंगे। भांग-अफीम के नशे का सुनहरा अवसर व साथ में इस गर्मी में नहाने के लिए गंगा का ठंडा नीर हो तो किस युवा का मन नहीं करेगा कावड़ लाने का? अगर किसी को शक हो तो इन यात्रियों का सामान चेक कर लो, भ्रम से पर्दा उठ जायेगा। अगर कोई सच्चाई को बोल दे तो सारे पाखंडी इकट्ठे हो कर भौंकने लग जाते हैं। आचार्य विचार्य सब कूद पड़ते हैं टीवी पर बयान देने के लिए।

ये तथाकथित धार्मिक यात्राएं आजकल धार्मिक कम फैशन ज्यादा हो गई हैं। इस सच्चाई को कौन नहीं जानता। शरद यादव ने तो सिर्फ बेरोजगारी का मुद्दा उठाया था, किस को पता नहीं है कि कुछ लोग नशे के लिए तो कुछ लोग मुफ़्त में खाने की व्यवस्था के कारण ये यात्राएं करते हैं। गरीब लोग यह सोच कर यात्रा पर रवाना हो जाते हैं कि चलो कुछ दिनों के लिए खाने पानी का इंतजाम हो जायेगा। सड़कों पर लगने वाली रसोई व भंडारे में उमड़ती भीड़ को देख कर आप अंदाजा लगा सकते हो कि इस देश में भुखमरी की समस्या भी भयानक रूप से मौजूद है। 

पश्चिमी राजस्थान में रामदेवरा धाम है। वहां पर भी ऐसी ही यात्राओं का हुजूम लगता है। सब बेरोजगार व गरीब, दलित पिछड़े लोग सड़कों पर झंडा उठाये चलते हुए मिलेंगे। वहां इस मौसम में सांप भी बहुत ज्यादा होते हैं। सर्पदंश के कारण सैंकड़ों लोग काल कवलित हो जाते हैं। वाहनों में भेड़ बकरियों की तरह भर-भर कर चलते हैं। दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं।

शिक्षाविद शिवनारायण इनाणियां कहते हैं, ” किसानों दलितों का काम के समय इस प्रकार धर्मान्धता में फंस कर दुरूपयोग करना ठीक नहीं है। इस से खुद का ही नुकसान होता है। गरीबों का शोषण होता है। काम ठप होता है। रसोई लगा कर लोग फर्जी धर्मगुरु व नेता बन जाते हैं। जिनको दान करना है अपने गाँव की स्कूल में सुविधाओं के लिए करना चाहिए। गाँव में किसी गरीब बच्चे की शिक्षा का खर्चा उठाना चाहिए। किसी बेसहारा के इलाज में मदद करनी चाहिए।

“ऐसी उन्मादी भीड़ यात्राओं के फैशन को बढ़ावा दे कर शोषण की दुकानें चलाने वालों को लाभ नहीं पहुंचाना चाहिए। जब जब सत्ता की तरफ से लोगों को निराशा मिलती है तो लोगों का मानसिक स्तर कमजोर होता है। कमजोरी के इस समय का उपयोग धर्मान्धता फ़ैलाने वालों को नहीं करने देना चाहिए।”

धर्मांधता, कमजोर मानसिकता की देन

जब नेपाल में भूकंप आया तो लोग भूख व दर्द में तड़प रहे थे। सत्ता फ़ेल हो चुकी थी, तब पोप फ्रांसिस ने एक ट्वीट किया था कि मिशनरी के लिए यह सही वक्त है। उस समय लोगों का मानसिक स्तर डांवा डोल था और उन का आशय धर्म प्रचार से था। 

दुनिया भर से उन का विरोध हुआ, नेपाल के जागरूक लोगों ने मिशनरियों को घुसने तक नहीं दिया तो पोप ने सफाई दे कर माफ़ी मांगी थी। जिक्र करने का आशय यह है कि कमजोर मानसिकता ही धर्मान्धता में फंसने का एकमात्र कारण है और धर्म के नाम पर दुकानें चलाने वाले ठग इसे बखूबी समझते हैं।

भारत के युवाओं के अलग सपने, अलग रास्ते हैं। ये बजरंगदल, वीएचपी, ब्रह्मकुमारी, इस्कोन, आर्ट ऑफ लिविंग, नागा सेल, अखाड़ा परिषद आदि में भर्ती हो कर अध्यात्म के रास्ते मोक्ष हासिल करना चाहते हैं। 

हमें गलतफहमी है कि रेलवे का निजीकरण होने से बेरोजगारी बढ़ेगी। लेकिन देखना यह है कि कावड़ योजना कितनों को रोजगार दे रही है। पैदल यात्रा योजना के तहत चीन की सीमा से होते मानसरोवर तक पहुंच जा रहा है।

यह हमारी गलतफहमी है कि लोकसेवा आयोग समय पर भर्तियां नहीं करते इसलिए युवाओं की ऊर्जा फालतू के कार्यों में जाया हो रही है। जबकि युवाओं ने बड़ी दूरदर्शिता दिखाते हुए अध्यात्म से ओतप्रोत सत्ता चुनी है जो तमाम भर्ती एजेंसीज को खत्म कर के, तमाम संस्थानों का निजीकरण कर के मोक्ष के मार्ग के रोड़े हटा रही है। युवाओं का भर्तियों में बहुत समय खराब हो रहा था व नौकरी कर के इस जन्म में गृहस्थी के जंजाल में फंस कर अगला जीवन खराब करना नहीं चाहते हैं।

-खेत मे आत्महत्या करता किसान मजदूर

-इलाज के अभाव में मरता बीमार

-कुपोषण में बिलखता भारत

-शिक्षा के अभाव में भटकता बचपन

-कारखानों में वर्कलोड से मरता मजदूर

-महिलाओं के साथ होते बलात्कार व हिंसा

-दलितों के साथ होते अत्याचार

-जातीय भेदभाव में कराहता देश

-भुखमरी से मरते इंसान

-धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ता समाज

-रोजगार के अभाव में अपराध को मिलता बढ़ावा

-भ्रष्टाचार द्वारा देश को नोचता सिस्टम

-देश को लूटते देशी-विदेशी लुटेरे

ये सब दलित पिछड़े तब के के वर्तमान जीवन की क्षणिक समस्याएं हैं। इस को वैसे ही इस जीवन के साथ खत्म होना ही है। इसलिए युवाओं का इन से कोई लेना देना नहीं है।

पंडित रविशंकर ठीक कह रहा है कि सरकारी स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यहां नक्सलवाद पैदा होता है। स्कूलें बंद होगी तो एकाएक अध्यात्मिक सड़कों पर युवाओं का रेला नजर आने लग जायेगा। अस्पताल भी बंद होने चाहिए। बूढ़े बीमारों को वहां तक पहुंचाने में समय बर्बाद होता है और धर्मस्थलों से भीड़ डायवर्ट हो रही है। 

शिक्षाविद केएल परास्या कटाक्ष करते हुए कहते हैं, ” हर बुनियादी सुविधा दे रहे संस्थानों व योजनाओं को बंद कर देना चाहिए। फालतू में इस जन्म में उलझाए बैठे हैं। युवाओं की चाहत के मुताबिक जल्द से जल्द मोक्ष की मंजिल पाने में हमें सहयोग करना चाहिए। भारत का युवा बिल्कुल जागा हुआ है व बहुत परिश्रम कर रहा है। हमें हमारे युवाओं का सहयोग करना चाहिए। आखिर युवाओं के सपनों का सवाल जो है।”

जिम्मेदारियों से पलायन

कावड़ और पैदल यात्रियों के जत्थे डीजे पर भजनों की अश्लील धुनों पर नशे में धुत हो कर नाचते हैं तो ऐसा लगता है जैसे पागलपन का दौरा पड़ा हो। अगर यह यात्रा में नहीं नाच कर कहीं और जगह ऐसी हरकत कर रहे होते तो घरवाले कब के किसी अच्छे मनोचिकित्सक की शरण में ले जाते।

आस्था के नाम पर जो लोग यात्राओं पर निकलते है असल में वो जिम्मेदारियों से भागने वाले लोग हैं। माता पिता, भाई बहन, देश समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभा पाने वाले लोग धर्म का सहारा लेते हैं। अपने मां बाप को उन के हाल पर छोड़ कर उन की इच्छा के विरुद्ध अपनी मौजमस्ती के लिये जहां मर्जी वहीं निकल पड़ते हैं।

जबकि जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी व फर्ज निभा लेता है उसे कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है। आज से 40 साल पहले कोई यात्रा नहीं थी तो क्या हमारे पुरखे धार्मिक नहीं थे। क्या पैदल यात्रा, कावड़ यात्रा, गणेश उत्सव, गरबा, मटकी फोड़, करवा चौथ हमारे पुरखे मनाते थे ? क्या यह किसी भी धर्म का हिस्सा थे ? कौन लोग हैं, जिन्होंने ऐसे आयोजन शुरू किए ? इन लोगों का उद्देश्य क्या है ?  इन आयोजकों को धर्म से जोड़ने वालों का उद्देश्य इस देश के कमेरे वर्ग को लूटकर खुद के लिये रोजगार पैदा करना है।

Ramswaroop Mantri

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