मनोज अभिज्ञान
स्त्री और पुरुष के बीच असमानता को अक्सर प्राकृतिक, जैविक या ईश्वरप्रदत्त मान लिया जाता है। यह धारणा सदियों से समाज की रगों में इस कदर गहरे उतरी हुई है कि इसे चुनौती देना एक तरह से व्यवस्था को चुनौती देना माना जाता रहा है। लेकिन जैसे-जैसे आधुनिक चेतना का विकास हुआ है, यह स्पष्ट होता गया है कि स्त्री की अधीनता कोई प्राकृतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक रचना है।
धार्मिक ग्रंथों और मिथकों ने स्त्री की अधीनता को वैध ठहराने का पहला आधार प्रस्तुत किया। विभिन्न सभ्यताओं के धार्मिक आख्यानों में यह देखा जा सकता है कि स्त्री को या तो पुरुष की उपज बताया गया है, या फिर उसके पतन का कारण। उदाहरण के लिए, एक कथा के अनुसार स्त्री पुरुष की पसली से उत्पन्न हुई, यानी स्वयं की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि पुरुष की सह-निर्मित संरचना मात्र। इस प्रतीकात्मक मिथक का निहितार्थ स्पष्ट था: स्त्री को द्वितीयक और अधीनस्थ बनाना।
इसी क्रम में, कई ग्रंथों में स्त्री को पाप का कारण या भ्रम की जननी कहकर प्रस्तुत किया गया। कहा गया कि स्त्री वह प्राणी है, जो पुरुष को ईश्वर से भटकाती है, ज्ञान से गिराती है और शाश्वत दंड का कारण बनती है। इन मिथकों ने स्त्री को ऐसे जैविक और नैतिक खतरे के रूप में स्थापित किया, जिससे पुरुष को बचकर रहना चाहिए। धर्म ने इस सोच को न केवल प्रतिष्ठा दी, बल्कि उसे ईश्वरीय इच्छा के रूप में प्रस्तुत कर उसे अंतिम सत्य बना दिया।
धर्म से प्रेरित होकर समाजों ने ऐसे रीति-रिवाज़, आचार-संहिताएं और कानून विकसित किए जिनका उद्देश्य स्त्री को सीमित, नियंत्रित और अधीन रखना था। विवाह, परिवार, उत्तराधिकार, श्रम और शिक्षा-इन सभी क्षेत्रों में स्त्री को पुरुष के अधीन और उसकी संपत्ति के रूप में परिभाषित किया गया।
इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जब विवाह के बाद स्त्री की स्वतंत्र पहचान समाप्त हो जाती थी। उसे पति के नाम, वंश, सम्पत्ति और धार्मिक पहचान में विलीन हो जाना होता था। यह एक प्रकार की कानूनी मृत्यु थी, जिसमें स्त्री का अस्तित्व केवल बेटी, पत्नी, या माँ के रूप में ही स्वीकार्य था। कानून भी इस अधीनता को वैधता प्रदान करते थे।
विवाह में पति को पत्नी पर शारीरिक अधिकार दिया जाता था; संपत्ति के मामलों में स्त्री को निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता था; और न्यायिक प्रक्रियाओं में स्त्री की गवाही को अविश्वसनीय माना जाता था। इन सबका उद्देश्य यही था कि स्त्री स्वतंत्र विचारशील इकाई न बने, बल्कि वह पुरुष व्यवस्था की सेविका बनी रहे।
प्राचीन सभ्यताओं में प्रारंभिक रूप से मातृ प्रधान समाज के तत्व मौजूद थे। देवी पूजाएं, मातृत्व की महिमा और जीवन-निर्माता के रूप में स्त्री की प्रतिष्ठा इतिहास के आरंभिक चरणों में देखी जा सकती है। किंतु जैसे-जैसे कृषि, व्यापार और राज्य का विकास हुआ, वैसे-वैसे संपत्ति और उत्तराधिकार के प्रश्न महत्वपूर्ण होते गए। यहां पर पुरुष वर्चस्व का उदय हुआ, जिसने स्त्री को नियंत्रित करने की योजनाबद्ध प्रक्रिया आरंभ की।
इस संक्रमण का प्रमुख पहलू यह था कि स्त्री की यौनिकता और प्रजनन क्षमता को पुरुष के नियंत्रण में लाना आवश्यक हो गया। क्योंकि उत्तराधिकार पुरुष रेखा में ही चले, इसके लिए स्त्री की स्वतंत्रता को रोका गया और उसे नैतिकता, धर्म और मर्यादा के नाम पर बंधन में रखा गया। इस पर नियंत्रण पाने का साधन बने धर्म, रीति और समाज।
जब आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ, तब उससे यह अपेक्षा की जा रही थी कि वह पूर्वाग्रहों से मुक्त होगा और वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाएगा। लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। वैज्ञानिकों ने भी स्त्रियों को कमतर मानने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को ही प्राकृतिक सिद्धांतों की भाषा में दोहराया।
उदाहरण के लिए, यह कहा गया कि स्त्रियों की खोपड़ी छोटी है इसलिए उनकी बौद्धिक क्षमता कम है। कुछ ने तो यह भी कहा कि उनका मस्तिष्क भावनात्मक होता है, विश्लेषणात्मक नहीं। जैविक संरचना को आधार बनाकर यह निष्कर्ष निकाले गए कि स्त्री निर्णय नहीं ले सकती, वह नेतृत्व में अक्षम है, और वह पुरुषों की तुलना में मानसिक रूप से अस्थिर है।
वास्तव में, विज्ञान ने यहां सत्य की खोज नहीं, बल्कि पूर्व-निर्धारित निष्कर्षों को वैज्ञानिक भाषा में प्रमाणित करने का कार्य किया। यह एक तरह की वैज्ञानिक पितृसत्ता थी, जिसने स्त्री के खिलाफ धार्मिक पक्षपात को वैज्ञानिक रूप देकर और भी मजबूती से स्थापित कर दिया।
इन सभी प्रक्रियाओं का सम्मिलित प्रभाव यह हुआ कि समाज की सामूहिक चेतना में यह धारणा बैठा दी गई कि स्त्री प्राकृतिक रूप से पुरुष से कमतर है। यह धारणा इतनी गहरी और सहज रूप से आत्मसात कर ली गई कि स्त्रियाँ भी स्वयं को हीन मानने लगीं। इसे संस्थागत लैंगिक हीनभावना कहा जा सकता है। लड़कियों को बचपन से यह सिखाया जाता रहा कि वे लड़कों से कमज़ोर हैं, उन्हें आज्ञाकारी होना है, उन्हें त्याग करना है, और उनका मुख्य कार्य परिवार की सेवा करना है। यह मानसिकता धीरे-धीरे आत्म-गौरव और आत्मनिर्भरता का हनन करती है। स्त्री अपने अधिकारों को माँगने की बजाय क्षमा माँगने लगती है।
स्त्री की हीनता की धारणा किसी वैज्ञानिक, धार्मिक या नैतिक सच्चाई पर आधारित नहीं है। यह सामाजिक निर्माण है, जिसे धर्म ने नैतिकता का जामा पहनाया, परंपराओं ने व्यवहार का हिस्सा बनाया, और कई बार विज्ञान ने भी कुछ भ्रामक तर्कों से पुष्ट किया। इन सभी प्रयासों का उद्देश्य एक ही था, सत्ता और संसाधनों पर पुरुष वर्चस्व को बनाए रखना।
वास्तविक विज्ञान का मूल स्वभाव तथ्यों, प्रमाणों और परीक्षणयोग्य निष्कर्षों पर आधारित होता है; वह तर्क और अनुभव के आधार पर किसी सिद्धांत को स्वीकार या अस्वीकार करता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि विज्ञान स्वयं भी सामाजिक गतिविधि है, जिसे करने वाले वैज्ञानिक किसी निर्वात में नहीं रहते। वे उसी समाज के सदस्य होते हैं, जिसकी संरचना, मान्यताएं और पूर्वाग्रह उनके सोचने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि कई वैज्ञानिक अवधारणाएं, विशेषकर नारी, जाति, नस्ल या वर्ग से संबंधित, अक्सर समाज में व्याप्त असमानताओं और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोणों को वैज्ञानिक जामा पहनाकर प्रस्तुत करती हैं। यह पूर्वाग्रहयुक्त विज्ञान यदि जांच के कठोर मानकों से नहीं गुजरता, तो कई बार वह ज्ञान के बजाय मिथक का विस्तार करता है।
लैंगिक चयन (sexual selection) के सिद्धांत के संदर्भ में यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। डार्विन का सिद्धांत यह दावा करता है कि जीव-जगत में नर प्राणी प्रतियोगिता के ज़रिए विकसित होते हैं, वे अधिक ताकतवर, सुंदर, या कुशल बनते हैं ताकि वे मादा का आकर्षण प्राप्त कर सकें। मादा को निष्क्रिय, चयनकर्त्री और अपेक्षाकृत स्थिर रूप में देखा जाता है। इस आधार पर यह कहा गया कि नर की मानसिक और शारीरिक क्षमताएं स्वाभाविक रूप से अधिक विकसित हैं। इस सिद्धांत का सामाजिक रूपांतरण यह हुआ कि मानव समाज में भी पुरुष को नेतृत्व, सोच, और निर्णय लेने की स्वाभाविक योग्यता प्राप्त है, जबकि स्त्री का कार्य चयन करना और पालन-पोषण करना है।
लैंगिक चयन के इस सिद्धांत का जब मनुष्य पर विस्तार हुआ, तो यह देखा गया कि विज्ञान ने न केवल पुरुष की श्रेष्ठता को स्थापित किया, बल्कि स्त्री की हीनता को भी प्राकृतिक सिद्ध कर दिया। कहा गया कि स्त्री विकास की उस दौड़ में पीछे रह गई क्योंकि उसे सजने-संवरने, संतान उत्पत्ति और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों तक सीमित रहना पड़ा। यह मत ऐसा था मानो प्रकृति ने ही स्त्री को ‘कमतर’ बनाने का निर्णय ले लिया हो।
परंतु यह दृष्टिकोण स्वयं में गंभीर वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है। यह मान लेना कि प्रतियोगिता और आक्रामकता ही उन्नति के मापदंड हैं, और कोमलता, सहनशीलता व स्थिरता अविकसित लक्षण हैं, एकतरफा है। यह केवल उन गुणों को ‘श्रेष्ठ’ मानता है जो पारंपरिक रूप से पुरुषों से जोड़े जाते हैं, और स्त्रियों के गुणों को या तो गौण मानता है या दुर्बलता के रूप में चित्रित करता है।
लैंगिक चयन के वैज्ञानिक सिद्धांतों में मादा को निष्क्रिय दर्शाने की प्रवृत्ति रही है। यह दावा किया गया कि मादा केवल सज-धजकर नर का चुनाव करती है, जबकि नर को योग्य सिद्ध करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन अनेक जीववैज्ञानिक अध्ययनों ने यह सिद्ध किया है कि मादा भी व्यवहारिक, रणनीतिक और सक्रिय भूमिका निभाती है। चयन केवल सौंदर्य के आधार पर नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरजीविता और अनुवांशिक स्वास्थ्य पर भी आधारित होता है।
मनुष्य की सामाजिक संरचना में भी स्त्री हमेशा निष्क्रिय नहीं रही है। वह समाज, संस्कृति और ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में बराबर की भागीदार रही है। लेकिन जब विज्ञान स्वयं पितृसत्तात्मक मूल्यों से प्रभावित हो जाता है, तो वह स्त्री के योगदान को अनदेखा कर देता है या उसे गौण बना देता है।
लैंगिक चयन से प्रेरित वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह भी मानता है कि पुरुषों ने सामाजिक विकास की प्रक्रिया में अधिक भूमिका निभाई है क्योंकि उन्होंने युद्ध, शिकार, राजनीति और तकनीक में उत्कृष्टता प्राप्त की। स्त्रियों की भूमिका को घरेलू सीमाओं तक सीमित माना गया और यह निष्कर्ष निकाला गया कि बौद्धिक विकास में भी पुरुष आगे निकल गए।
यह दृष्टिकोण स्वयं में गलत आधार पर खड़ा है। सबसे पहले तो यह उस सामाजिक व्यवस्था की अनदेखी करता है जिसने स्त्रियों को शिक्षा, स्वतंत्रता और सामाजिक भागीदारी से वंचित रखा। दूसरे, यह ये नहीं मानता कि घरेलू जीवन का संचालन, संतान का पालन-पोषण, चिकित्सा ज्ञान, भोजन उत्पादन—ये सभी गहन बौद्धिक क्षमताओं की मांग करते हैं। अगर इन क्षेत्रों को भी बौद्धिकता के मापदंड में शामिल किया जाए, तो स्त्रियाँ बराबरी में खड़ी नज़र आएंगी।
विज्ञान को अक्सर यह दावा करते देखा जाता है कि वह समाज की अपेक्षाओं से परे केवल तथ्यों का अनुसरण करता है। लेकिन जब विज्ञान स्वयं उन मान्यताओं और ढांचों से प्रभावित हो, जिनमें वह पनपता है, तब उसकी वस्तुनिष्ठता पर प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते हैं। लैंगिक चयन और पुरुष श्रेष्ठता के तर्क उसी पूर्वग्रह से जन्मे हैं।
पुरुषों द्वारा नियंत्रित वैज्ञानिक संस्थानों और शैक्षणिक विमर्शों में स्त्रियों की आवाज़ सदियों तक नहीं के बराबर रही। जिस विज्ञान की भाषा ही पुरुष-निर्मित हो, उसमें स्त्री के लिए जगह बनाना कठिन होता है। और जब भी कोई महिला वैज्ञानिक या चिंतक सामने आई, तो उसकी आलोचना यह कहकर की गई कि वह ‘भावनात्मक’, ‘अवैज्ञानिक’ या ‘पक्षपाती’ है, जबकि पुरुषों के पूर्वाग्रहों को ‘तर्क’ कहा गया।
लैंगिक चयन के सिद्धांत का प्रभाव केवल जैविक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसने साहित्य, मनोविज्ञान, कानून और शिक्षा तक को प्रभावित किया। यह धारणा बनी कि लड़कों की बौद्धिक क्षमताएं स्वाभाविक रूप से लड़कियों से बेहतर होती हैं, कि लड़कियाँ विज्ञान या गणित में कमज़ोर होती हैं, कि स्त्रियाँ निर्णय लेने में अक्षम होती हैं। इन धारणाओं का सीधा असर यह हुआ कि स्त्रियों को उन क्षेत्रों में आगे बढ़ने से रोका गया जहाँ नेतृत्व, नवाचार या नीति-निर्माण की ज़रूरत होती है। धीरे-धीरे यह विज्ञान के आवरण में लपेट कर परोसी गई पितृसत्तात्मक वैचारिक गुलामी बन गई।
लैंगिक चयन और पुरुष श्रेष्ठता के सिद्धांत इस भ्रम को जन्म देते हैं कि स्त्री की अधीनता वैज्ञानिक सत्य है। लेकिन यह दृष्टिकोण स्वयं में सामाजिक निर्माण है, जिसे धर्म, संस्कृति और विज्ञान के माध्यम से पुष्ट किया गया है। यह आवश्यक है कि विज्ञान को उसकी वैचारिक जड़ताओं से मुक्त किया जाए। प्रतियोगिता और आक्रामकता के बजाय यदि सहयोग, देखभाल और संतुलन को विकास के मापदंड बनाए जाएं, तो स्त्री के गुणों को भी उन्नति का आधार माना जाएगा।
जब जैविक विकास की बात होती है, तो अक्सर पुरुष शरीर को ही ताकत, बुद्धि और अनुकूलन क्षमता का मानक मान लिया जाता है। स्त्री शरीर को केवल प्रजनन की इकाई समझा जाता है, जैसे उसका काम सिर्फ बच्चे को जन्म देना है और इसके अलावा उसमें कोई विशेषता नहीं है। यह नज़रिया न केवल अधूरा है, बल्कि पुरुष प्रधान सोच से प्रभावित भी है। यह ज़रूरी है कि हम स्त्री शरीर को भी उसी तरह समझें जैसे किसी भी जीव की संपूर्णता, संरचना और टिकाऊपन को समझते हैं।
असल में विकास का मकसद होता है जीवन की रक्षा करना और समय के अनुसार खुद को ढालना। इस नजरिए से देखें तो स्त्री शरीर कई मामलों में ज्यादा संतुलित, संगठित और स्थिर होता है। उसमें जीवन को आगे बढ़ाने की क्षमता होती है। उसके शरीर में हार्मोनल संतुलन बहुत जटिल होते हुए भी अच्छे से नियंत्रित होता है। उसकी प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी आमतौर पर पुरुषों से बेहतर होती है। औसतन उसकी उम्र अधिक होती है, सहनशक्ति ज़्यादा होती है और मानसिक रूप से वह ज़्यादा लचीली होती है। ये सभी बातें यह बताती हैं कि स्त्री शरीर कोई कमजोर ढांचा नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की बेहद विकसित रचना है।
पुरुष शरीर में जो कुछ विशेषताएं देखी जाती हैं, जैसे आक्रामकता, मांसपेशियों की ताकत या तेज दौड़ने की क्षमता, ये सब प्रतिस्पर्धा से जुड़ी बातें हैं। लेकिन सिर्फ इन्हीं गुणों को विकास का पैमाना मान लेना एकतरफा सोच है। असल में जो गुण किसी जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करते हैं, जैसे स्थिरता, सुरक्षा और पुनरुत्पादन की क्षमता, वही ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। और ये सभी गुण स्त्री शरीर में गहराई से मौजूद होते हैं। विकास कोई प्रतियोगिता नहीं है कि किसने किसे पछाड़ा; यह तो जीवन को टिकाए रखने की प्रक्रिया है। इस हिसाब से देखा जाए तो स्त्री शरीर ज़्यादा संतुलित और दीर्घकालिक रूप से सक्षम है, और यही असली विकास है।
मस्तिष्क की बात करें तो मानसिक शक्तियां भी शरीर की संरचना और हार्मोन के असर से जुड़ी होती हैं। यह तथ्य कि स्त्रियों में भावनात्मक समझ ज़्यादा होती है, वे जटिल परिस्थितियों को बेहतर ढंग से संभाल पाती हैं, और उनमें संवेदनशीलता अधिक होती है, यह दिखाता है कि उनका मानसिक विकास भी अलग तरह से हुआ है, न कि पिछड़े हुए रूप में। इसका यह मतलब नहीं है कि पुरुष का मस्तिष्क किसी मामले में कमज़ोर है, बल्कि यह कि दोनों की मानसिकता अलग-अलग तरह से विकसित हुई है और दोनों अपने-अपने रूप में पूरी तरह सक्षम हैं। लेकिन सिर्फ तर्क, आक्रामकता या फैसले लेने की जल्दी को ही बुद्धिमत्ता का मापदंड मान लेना बहुत ही संकीर्ण सोच है।
विकास के संदर्भ में यह बात बहुत कम मानी जाती है कि सिर्फ ताकत और मुकाबले की प्रवृत्तियाँ ही नहीं, बल्कि सहनशीलता, संरक्षण और अगली पीढ़ियों को जन्म देने की प्रक्रिया भी उतनी ही ज़रूरी हैं। और स्त्री शरीर इन्हीं बातों में पारंगत होता है। इसलिए उसे कमज़ोर या अधूरा मानना वैज्ञानिक रूप से भी गलत है। सोचिए, वह शरीर जो जीवन को गढ़ता है, उसे अपने भीतर नौ महीने तक संभालता है, और फिर जन्म देता है, क्या वह किसी भी तरह से कमतर कहा जा सकता है?
यह और भी चिंता की बात है कि विज्ञान ने भी इस पक्ष को ठीक से न तो समझा और न ही स्वीकार किया। स्त्री शरीर को बस उसके प्रजनन तक सीमित कर देना बड़ी नैतिक चूक है। इसके पीछे या तो समाज में मौजूद पक्षपात थे, या फिर सोची-समझी चुप्पी, ताकि पुरुष शरीर को ही विकास का सबसे ऊंचा उदाहरण बताया जा सके।
जब इंसान जंगलों में घूमता था, न कोई घर था, न खेत, न बर्तन, न ही आग का पूरा ज्ञान, उस समय जीवन को चलाना, जिंदा रहने का संघर्ष था। लेकिन इसी कठिन समय में स्त्रियाँ जीवन को धीरे-धीरे समझने और संवारने में लगी थीं। वे पेड़ों से गिरे फलों, कंद-मूलों और जंगली अनाजों को पहचानती थीं, उन्हें इकट्ठा करतीं और कच्चा या धूप में सुखाकर खाने लायक बनाती थीं। जब बर्तन नहीं थे, तब वे पत्थरों पर पकाने, पत्तों में लपेटकर आग में सेंकने या गर्म राख में धीरे-धीरे भोजन पकाने जैसे तरीके अपनाती थीं। जब खेत नहीं थे, तब भी वे यह देखती थीं कि कौन से बीज अपने आप कहाँ उगते हैं, और वहीं से उन्होंने पहली बार बीजों को संजोना और उन्हें उपजाने की कोशिशें शुरू कीं। यही प्रयोग आगे चलकर खेती की ओर पहला कदम बना।
धीरे-धीरे जब इंसानों ने किसी एक जगह रुकना शुरू किया, तो पहला खेत, पहली फसल और पहला चूल्हा औरतों ने ही शुरू किया। वे जानती थीं कि कौन सा बीज उपजाऊ है, कब कौन सा पौधा लगेगा, और कब क्या पकाना है। खेतों को बनाना और उनके आस-पास रहने की जगहें तैयार करना, यह सब उन्हीं की सोच का हिस्सा था।
वे सिर्फ खाना नहीं बनाती थीं, बल्कि ये भी तय करती थीं कि उसे किस तरह से सहेजना है ताकि बुरे समय में भी कुछ बचा रहे। मिट्टी के बर्तन बनाना, उनमें अन्न भरना, घर के अंदर और बाहर चीज़ों को व्यवस्थित रखना; यह सब काम धीरे-धीरे एक पूरी व्यवस्था में बदल गया, जिसे हम आज ‘सभ्यता’ कहते हैं।
कपड़े बुनना सिर्फ तन ढकने के लिए नहीं था, बल्कि उन्होंने यह भी समझा कि सुंदरता भी ज़रूरत है—गहने बनाए, कपड़ों में डिज़ाइन दिए, और इससे सामाजिक पहचान बनी। किस जनजाति या समूह की स्त्रियाँ कैसे वस्त्र पहनती हैं, कौन सी कलाकृति किस समुदाय की है, इन सब चीज़ों ने समाज को दिशा दी और धीरे-धीरे संस्कृति का रूप लिया। औरतों ने भले ही मशीनें नहीं बनाई होंगी, पर उन्होंने हर वह औज़ार तैयार किया जो जीवन को आसान बनाता है—रसोई में इस्तेमाल होने वाले पत्थर के चक्के, हाथ से चलने वाले बुनाई यंत्र, धागा कातने वाली तकली, मिट्टी की हांडी—इन सभी ने मिलकर उद्योगों की नींव रखी।
शायद हम सोचते हैं कि नवाचार (innovation) केवल वे चीज़ें हैं जो लोहे और बिजली से बनी हों, लेकिन असली नवाचार वह है जो जीवन के केंद्र में हो, और स्त्रियों ने वह किया। वे पहले उद्यमी थीं, जिन्होंने बिना पूँजी के, केवल बुद्धि, मेहनत और संवेदना के बल पर समाज खड़ा किया। उनकी भूमिका सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं थी; वे ही परिवार की संरचना तय करती थीं। माँ के इर्द-गिर्द पूरा परिवार बनता था। वह तय करती थी कि बच्चे क्या सीखेंगे, परिवार में किसका क्या काम होगा, और समाज में क्या नैतिक मूल्य होंगे। पुरुष बाहर का काम करते थे, लेकिन अंदर का ताना-बाना स्त्रियाँ ही बुनती थीं। बच्चों को लोककथाएँ, गीत, खेती-बाड़ी के तरीके, मौसम के संकेत— सब यही सिखाती थीं। वे चलती-फिरती किताबें थीं, जिनके पास हर सवाल का जवाब था। बिना किसी स्कूल के, बिना किसी किताब के, उन्होंने पीढ़ियों तक ज्ञान को जीवित रखा। समाज में जब भी कोई नया मोड़ आया, राजनीतिक बदलाव हो, युद्ध हो या बाढ़-सूखा, स्त्रियाँ ही थीं जो सब कुछ समेटती थीं, फिर से खड़ा करती थीं। वे लड़ाई नहीं लड़ती थीं, लेकिन युद्ध के बाद बचे हुए जीवन को फिर से जोड़ने का काम वही करती थीं।
जब पुरुष सत्ता को केंद्र में लाने लगे, तब धीरे-धीरे स्त्रियों को पीछे कर दिया गया। उनके अधिकार छीन लिए गए, उनकी भूमिकाओं को छोटा करके सिर्फ बच्चों की देखभाल तक सीमित कर दिया गया। लेकिन अगर ध्यान से देखें तो वे कभी पूरी तरह गायब नहीं हुईं, उनका ज्ञान, उनका काम और उनकी सोच समाज के हर कोने में अब भी जिंदा है; बस पितृसत्तात्मक समाज ने उन्हें महत्व देना बंद कर दिया।
बहुत से लोगों का ऐसा मानना रहा है कि शिक्षा और समझदारी जन्म से मिलने वाली चीज़ें हैं, और स्त्रियाँ स्वभाव से पुरुषों से कम बुद्धिमान होती हैं। लेकिन अगर हम इतिहास, समाज और वैज्ञानिक शोधों को ध्यान से देखें, तो साफ़ समझ आता है कि यह फर्क प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों से पैदा हुआ है। यानी, यह भेद वास्तव में अवसरों की असमानता और सामाजिक पूर्वाग्रहों की उपज है, न कि किसी जैविक कमी का नतीजा।
हर इंसान में सोचने और समझने की क्षमता होती है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। लेकिन बचपन से जिन लोगों को सोचने, सवाल पूछने और सीखने का मौका मिलता है, उनकी क्षमता आगे बढ़ती है। अक्सर देखा गया है कि स्त्रियाँ परिस्थितियों को समझने, भावनाओं को पहचानने और व्यवहारिक निर्णय लेने में बहुत सक्षम होती हैं। यह गुण किसी जन्मजात श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं, बल्कि उस सामाजिक अनुभव का परिणाम है जो वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जीती हैं। इसलिए, जब उन्हें खुलकर सोचने, सीखने और काम करने के मौके मिलते हैं, तो वे तेजी से अपने अंदर की क्षमताओं को विकसित कर लेती हैं, जैसे पुरुष करते हैं।
इतिहास में लंबे समय तक स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखा गया। उन्हें धर्म, विज्ञान, राजनीति या समाज के बड़े फैसलों में भाग लेने का हक़ नहीं दिया गया। इसी कारण से यह धारणा बनी कि वे पुरुषों से कम योग्य हैं। लेकिन जब भी उन्हें पढ़ाई और काम के बराबर मौके दिए गए, उन्होंने हर क्षेत्र में, चाहे वो विज्ञान हो, राजनीति हो, साहित्य या संगीत, बहुत अच्छे परिणाम दिए। इससे यह सिद्ध होता है कि उनकी क्षमता में कोई कमी नहीं थी, बल्कि उन्हें मौके नहीं मिले थे। संगीत, लेखन, चित्रकला, संवाद, शोध – इन सभी क्षेत्रों में जब स्त्रियों को खुलकर काम करने का अवसर मिला, उन्होंने दिखाया कि वे पुरुषों के बराबर प्रदर्शन कर सकती हैं। इस बराबरी को साबित करने के लिए किसी और प्रमाण की ज़रूरत नहीं है।
लंबे समय से यह माना जाता रहा कि पुरुषों में शारीरिक ताकत के साथ मानसिक शक्ति भी ज़्यादा होती है। लेकिन अब यह साफ़ हो चुका है कि मानसिक शक्ति का मतलब सिर्फ़ तेज़ी से निर्णय लेना या तर्क करना नहीं होता। इसमें धैर्य, सहनशक्ति, भावनाओं की समझ, और संतुलन बनाए रखना भी शामिल है। यह सब गुण स्त्रियों में भी उतनी ही मात्रा में होते हैं, और कभी-कभी इनका प्रदर्शन अधिक सधा हुआ और स्थिर होता है, क्योंकि उनकी सामाजिक भूमिका ने उन्हें इनका अभ्यास कराया है। इसका मतलब यह नहीं कि स्त्रियाँ जन्म से श्रेष्ठ हैं, बल्कि यह कि हर व्यक्ति की मानसिक ताकत अलग-अलग अनुभवों और जिम्मेदारियों से विकसित होती है।
अगर हम बुद्धिमत्ता को सिर्फ़ तकनीकी ज्ञान, सैन्य नेतृत्व या राजनीतिक चातुर्य से मापें, तो पुरुषों की भूमिका ज़्यादा दिखेगी, क्योंकि उन्हें इन क्षेत्रों में ज़्यादा मौके मिले हैं। लेकिन अगर हम सामाजिक समझ, करुणा, न्याय, सह-अस्तित्व और संवाद जैसी क्षमताओं को भी बुद्धिमत्ता का हिस्सा मानें, तो स्त्रियाँ भी बराबरी पर दिखाई देती हैं। हमें समझना चाहिए कि समझदारी केवल तर्क नहीं होती, उसमें मानवीय दृष्टिकोण और संतुलन भी शामिल होता है, और इस नजर से देखें तो स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने अनुभव के हिसाब से विशिष्ट होते हैं।
ज्ञान डिग्रियों से नहीं आता। वह अनुभव, सोचने की स्वतंत्रता और समझ से आता है। स्त्रियाँ अपने जीवन के अनुभवों, पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियों के ज़रिए जो समझ विकसित करती हैं, वह गहरी और मूल्यवान होती है। और जब उन्हें शिक्षा और आज़ादी का माहौल मिलता है, तो वे इस समझ को और बेहतर तरीके से समाज के हित में लगा सकती हैं।
डार्विन के विकासवाद में ‘survival of the fittest’ यानी सबसे योग्य का जीवित रहना ही विकास की कुंजी मानी गई। लेकिन यह योग्यता प्रायः शारीरिक बल या चालाकी से परिभाषित की गई। ऐसे में स्त्रियों को, जो आम तौर पर ममता, सहनशीलता और सह-अस्तित्व को महत्व देती हैं, कमतर समझा गया। पर क्या मनुष्य का उत्कर्ष सिर्फ बल और युद्ध से हुआ है? क्या सभ्यता की आधारशिला पर सिर्फ आक्रमण और प्रतिस्पर्धा की ही ईंटें रखी गई हैं?
यदि ऐसा होता तो सभ्यता का जन्म कभी न होता। मनुष्य समाज में रहने वाला प्राणी है। समाज को चलाने के लिए बल नहीं, बल्कि समन्वय, करुणा, धैर्य और नैतिक चेतना की जरूरत होती है। ये सभी गुण स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से अधिक पाए जाते हैं। वह केवल जीवन को जन्म नहीं देती, बल्कि जीवन को सहेजने और चलाने की जिम्मेदारी भी उठाती है।
स्त्री का नैतिक पक्ष हमेशा से पुरुष की तुलना में अधिक प्रबल रहा है। इतिहास में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि युद्धों, हिंसा या सामाजिक विघटन की घटनाओं में पुरुषों की भूमिका अधिक रही है, जबकि स्त्रियां इन सबके खिलाफ शांति, सुरक्षा और नैतिक मूल्यों की प्रतीक बनी रही हैं। बाल्यावस्था में बच्चों को जो प्रथम नैतिक शिक्षा मिलती है, वह मां के माध्यम से मिलती है। मां का स्वभाव ही बच्चे में मानवता के बीज रोपता है। यदि नैतिकता को मानव विकास का पैमाना माना जाए, तो स्पष्ट है कि स्त्रियों का योगदान कहीं अधिक गहन, स्थायी और मूलभूत रहा है। पुरुषों ने भले ही युद्ध जीते हों, लेकिन स्त्रियों ने मानवता को बचाया है।
विकास की चर्चा जब भी होती है, तब बौद्धिक और सामाजिक योगदानों की तुलना में केवल शारीरिक विकास को ही अधिक महत्व दे दिया जाता है। लेकिन इतिहास के लंबे कालखंड में स्त्रियों ने विज्ञान, कला, साहित्य, राजनीति और समाज सेवा में जो योगदान दिया है, वह किसी भी तुलना से परे है। यह अलग बात है कि पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था ने उनकी उपलब्धियों को मान्यता देने में अक्सर कंजूसी की है। स्त्रियों की बौद्धिक क्षमताओं को लेकर जो शंका पैदा की जाती है, वह सामाजिक अवसरों की असमानता से उपजी है, जैविक यथार्थ से नहीं। जैसे-जैसे शिक्षा और अभिव्यक्ति के अवसर खुले हैं, स्त्रियों ने विज्ञान से लेकर नेतृत्व तक हर क्षेत्र में अपनी योग्यता को सिद्ध किया है।
मनुष्य केवल शारीरिक बल से नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन और मानसिक शक्ति से भी आगे बढ़ता है। स्त्रियां स्वभावतः अपनी भावनाओं को व्यवस्थित करने और दूसरों के लिए सहानुभूति रखने में दक्ष होती हैं। यह भावना उन्हें न केवल परिवार बल्कि समाज को भी जोड़ने का आधार बनाती है। उन्होंने सहनशीलता, क्षमा, करुणा, और आत्मबल जैसे गुणों से यह दिखाया है कि जीवन को केवल संघर्ष से नहीं, समर्पण से भी जीता जा सकता है।
यह बात अब अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में सिद्ध हो चुकी है कि स्त्रियों की भावनात्मक बुद्धिमत्ता पुरुषों से अधिक होती है। यह बुद्धिमत्ता न केवल संबंधों को सुचारु रूप से चलाने में सहायक होती है, बल्कि कठिन परिस्थितियों में स्थिरता बनाए रखने में भी सक्षम बनाती है। क्या यह विकास की उच्च अवस्था नहीं है?
मातृत्व की भूमिका केवल जैविक नहीं, नैतिक और सामाजिक भी है। एक स्त्री जब मां बनती है, तो वह केवल शिशु को जन्म नहीं देती, बल्कि समाज को गढ़ने की प्रक्रिया शुरू करती है। वह अपने बच्चे में मूल्यों, आदर्शों और सह-अस्तित्व की भावना भरती है। उसकी यह भूमिका ही मानव सभ्यता को अराजकता से बचाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। स्त्री के लिए उसका परिवार ही कर्मभूमि होता है, जहां वह दिन-रात श्रम करके जीवन को सहेजती है। वह पराजय की बात नहीं करती, वह निर्माण की बात करती है। वह मृत्यु से नहीं डरती, वह जीवन को जन्म देती है।
डार्विन ने अपने सिद्धांतों में यौनिक चयन को भी पुरुष की श्रेष्ठता का आधार बनाया। उनका मानना था कि नर में आकर्षण पैदा करने की प्रवृत्ति अधिक होती है, और वह मादा को प्रभावित करने के लिए अनेक प्रयास करता है। लेकिन इस थ्योरी में यह नजरअंदाज किया गया कि अंतिम चयन करने वाली तो मादा ही होती है। प्रकृति में अधिकांश प्रजातियों में मादा ही तय करती है कि उसका साथी कौन होगा। वह केवल सजावट या शक्ति देखकर निर्णय नहीं करती, बल्कि दीर्घकालिक उपयुक्तता को आधार बनाती है। उसने उस पुरुष को प्राथमिकता दी है, जो केवल बलिष्ठ नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और सहयोगी हो। यह चयन स्वयं में नैतिक क्रांति है, जो विकास को अधिक समावेशी और मानवीय बनाता है।
विकास केवल तकनीकी उपलब्धियों या शारीरिक दक्षताओं में नहीं होता। वह तब होता है जब समाज अधिक न्यायपूर्ण, करुणामय और नैतिक बनता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो स्त्री की भूमिका सृजनात्मक और उन्नतिशील रही है। उसने पुरुष के साथ मिलकर जीवन को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, लेकिन स्वयं को हमेशा उससे कमतर नहीं माना। यदि इतिहास स्त्रियों को निर्णय लेने, नेतृत्व करने और विचार व्यक्त करने का समान अवसर देता, तो संभव है कि मानव जाति कहीं अधिक सहिष्णु, शांतिपूर्ण और न्यायसंगत समाज में जी रही होती।
आज जब हम स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं, तब यह समझना जरूरी है कि यह समानता केवल अधिकारों की नहीं, योगदानों की भी है। स्त्री ने हमेशा समाज को सहेजा है, नैतिकता को बनाए रखा है और जीवन को गरिमा दी है। इसलिए यदि विकास का मापदंड मानवता, नैतिकता और स्थिरता है, तो स्त्री की भूमिका उसमें अग्रणी और आवश्यक है।
पितृसत्ता द्वारा थोपे गए पूर्वाग्रहों को विज्ञान के नाम पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। विज्ञान यदि सच्चा है, तो उसे तथ्यों को नए संदर्भों में परखने की ईमानदारी दिखानी चाहिए। और जब ऐसा होगा, तब यह स्पष्ट होगा कि स्त्री न केवल पुरुष की बराबरी की अधिकारी है, बल्कि अनेक मानकों पर उससे आगे भी है। यही विकास की सच्ची समझ और मानवता का वास्तविक सम्मान है।(





