अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

समन्वय वादी संस्कृति के प्रतीक हैं तुलसीदास और  प्रेमचंद        

Share

         -सुसंस्कृति परिहार 

इस वर्ष 31जुलाई को दो मूर्धन्य साहित्यकारों की जयंती साथ साथ होना महत्वपूर्ण है। दोनों लेखकों का अपने दौर में आम जनता के बीच जिस तरह का जुड़ाव रहा और उनकी स्वीकार्यता रही, वह मायनेखेज़ है। तुलसीदास ने जहां आध्यात्म को बाल्मीकि रामायण से उधार लिए कथानक के आधार पर विकसित कर जनमानस को राम जी भरोसे छोड़ दिया वहीं प्रेमचंद ने राम भरोसे या सरकार भरोसे की धारणा के विपरीत  आत्मविकास कर उन्नति का मार्ग दिखाया।इसके लिए उन्होंने अपने बीच के पात्रों का चयन किया।जो काल्पनिक नहीं थे जीवन संघर्षों से जूझ रहे थे।

 एक ओर जहां तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ जैसे महाकाव्य की रचना की, जिसकी जड़ें  भारतीय संस्कृति और जनमानस में  गहरे जुड़ी हुई हैं। वहीं दूसरी तरफ प्रेमचंद हैं , जिन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ कहा जाता है, अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से सामाजिक यथार्थ को उजागर किया हैं, जिससे वे आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। दोनों ही भारतीय रचनाकारों की ख्याति संपूर्ण विश्व में है।बड़ी बात यह है कि आज के प्रगतिशील ज़माने में भी तुलसीदास अपना स्थान बनाए हुए हैं।उनके राम आस्था के साथ अब राजनीति का आधार भी बन चुके हैं।महाकाव्य रामचरित मानस को दुनिया के महत्वपूर्ण ग्रंथों में 46वां स्थान मिला हुआ है।

सबसे बड़ी बात है कि तुलसीदास अकबर के समकालीन थे।कहा जाता है कि अकबर ने तुलसीदास को शाही दरबार में बुलाया था और उनसे अपनी प्रशंसा में एक ग्रंथ लिखने को कहा था। तुलसीदास ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद अकबर ने उन्हें कैद कर लिया। जेल में, तुलसीदास ने 40 दिनों तक हनुमान चालीसा का पाठ किया। उसी दौरान, कहा जाता है कि अकबर के महल में बंदरों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया, जिससे काफी नुकसान हुआ। हनुमान चालीसा इसी बीच लिखा गया।कहते हैं अकबर ने तुलसीदास के चमत्कार को देखते हुए उन्हें रिहा कर दिया और उनसे क्षमा मांगी। उसके बाद तुलसीदास को उन्होंने कभी परेशान नहीं किया। बल्कि उनके नवरत्नों में से एक रहीम खानखाना उनकी खुले दिल से प्रशंसा करते रहे।अपने दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास ने कालक्रमानुसार निम्नलिखित काल जयी ग्रन्थों की रचनाएं कीं – रामललानहछू, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञाप्रश्न, जानकी-मंगल, रामचरितमानस, सतसई, पार्वती-मंगल, गीतावली, विनय-पत्रिका, कृष्ण-गीतावली, बरवै रामायण, दोहावली और कवितावली (बाहुक सहित)।

दूसरी ओर प्रेमचन्द जिस तरह का साहित्य लिख रहे थे, उसके पीछे की वजह उनकी पृष्ठभूमि और देश का औपनिवेशिक शासन था, जिसे वो खुद जी रहे थे। उनके दिन भी पैसे की तंगी में बीत रहे थे। जबकि प्रेमचंद को अंग्रेजों ने उनकी देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के खिलाफ लेखन के कारण सताया।  प्रेमचंद का कहानी संग्रह “सोजे वतन” जिसका अर्थ है “देश का मातम” 1909 में प्रकाशित हुआ था और इसमें देशभक्ति की भावना थी। ब्रिटिश सरकार ने इसे विद्रोही रचना मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया और इसकी प्रतियां जब्त कर ली।हमीरपुर के कलेक्टर ने प्रेमचंद को तलब किया और उन पर लोगों को भड़काने का आरोप लगाया।  उन्होंने “सोजे वतन” की प्रतियां सार्वजनिक रूप से जला दीं और प्रेमचंद को भविष्य में लिखने से रोका गया।

ब्रिटिश सरकार के डर से,वे छद्म नाम से लिखते रहे।इस समय वे नवाब राय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नवाब राय की खोज शुरू हुई।नवाब राय पकड़ लिए  गए।इसके बाद  धनपत राय ,नवाब राय भी वे नहीं रहे बल्कि हमेशा के लिए प्रेमचंद बन गए और ये नाम सुझाया उनके नज़दीकी मुंशी दया नारायण निगम जी ने जो बीसवीं सदी के शुरू में कानपुर से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिका ‘ज़माना’ के संपादक थे।इस तरह प्रेमचंद ने तत्कालीन परिस्थितियों में अपने आपको कलम का सिपाही बनाए रखकर। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं।जिनके पाठक आज भी दुनिया भर में मौजूद हैं।कुल मिलाकर तुलसीदास ने’रामचरितमानस’ के माध्यम से समाज में नैतिक मूल्यों, धार्मिकता और प्रेम का प्रसार किया, जिससे वे लोगों के दिलों में बस गए।जबकि प्रेमचंद ने लोगों के जीवन की विद्रूपताओं को समझ अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें यथार्थ से अवगत कराके रूढ़ियों, विषमताओं और अंधविश्वासों से निकाल कर नवचेतना सम्पन्न बनाने के लिए जो लेखन किया वह आज़ादी से पूर्व के भारत को समझने के लिए महत्वपूर्ण तो है ही किंतु इसने भारत की आज़ादी के दीवानों को और जनमानस को एक नई दिशा भी दी।खास बात ये कि वे प्रगतिशील चेतना सम्पन्न लेखक थे इसलिए सन् 1936में उन्हें प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था।जिसने देश में प्रगति शील धारा को देश में बहने का पथ प्रशस्त किया। प्रेमचंद का एक उद्धरण ‘मासिक वेतन पूरनमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते घटते लुप्त हो जाता है।’ उनकी पैनी आर्थिक और सामाजिक पकड़ को दर्शाता है।

वास्तविकता यह है कि आज हमारे समाज में दो तरह की तरह धाराएं बह रही हैं जिसमें लगभग 400 साल पहले लिखे गए तुलसी कृत आध्यात्मिक ग्रंथ रामचरित मानस की लोकप्रियता आज भी देश विदेश में बरकरार उसी तरह प्रेमचंद भी अपने प्रगतिशील लेखन के लिए दुनिया भर में अपनी लोकप्रियता बनाए हुए हैं। सचमुच भारत में यह अद्भुत समन्वय उसकी गरिमामय संस्कृति का परिचायक है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें