राष्ट्र सेवा पर मिलती है पेंशन- सम्मान और पहचान*
हरनाम सिंह
सार्वजनिक जीवन में राष्ट्र एवं आमजन ।के हितों के लिए संघर्ष करने वालों की कुर्बानियां उनका समर्पण सदैव प्रेरणास्पद और स्मरणीय रहेगा। अपने समय में अपने परिवार, समाज की अवहेलना, आलोचना झेलते रहने के बावजूद ऐसी कई शख्सियतें थी और है जिन्होंने हर तरह की तकलीफों को सहा पर झुके नहीं। अन्याय के खिलाफ आजीवन संघर्ष करते रहे।
राष्ट्र की स्वतंत्रता एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए 20वीं शताब्दी में भारत में दो प्रमुख आंदोलन हुए थे। एक था ब्रिटिशकाल में औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम तथा दूसरा 1975 से 1977 तक देश में लागू आपातकाल, जिसमें नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया था। कालांतर में इन आंदोलनों में भाग लेने वाले लोगों की सरकार ने सुध ली। भारत सरकार ने उन्हें सम्मानित कर पेंशन देना तय किया। एक आंदोलन में शामिल लोगों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में तथा दूसरे आंदोलन के भागीदारों को मीसाबंदी की पहचान मिली। इन दोनों वर्गों के लोगों को समाज में सम्मान मिला, सरकार से पेंशन मिली शासकीय आयोजनों में उन्हें सादर बुलाया जाता है। निधन के पश्चात तिरंगे के जरे साये अंतिम संस्कार होता है। पुलिस गार्ड ऑफ ऑनर देती है। बाद में परिजनों को भी आंशिक पेंशन मिलती है।
लेकिन एक तीसरा वर्ग भी है जिसने इन संघर्षों में अपना जीवन होम कर दिया लेकिन सरकार से किसी भी तरह से मिलने वाले सम्मान और पेंशन को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने पेंशन के लिए आवेदन ही नहीं किया। स्वाभिमान सहित सिद्धांतों पर जीवन जीने वाले ऐसे लोगों को समाज से भी उतना सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
ऐसे लोगों में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कार्यकर्ता, समाजवादी और गांधीवादी भी थे। जिनकी अनुमानित संख्या हजारों में है। कम्युनिस्टों का मानना है कि जनता के लिए किए गए संघर्ष के बदले व्यक्तिगत लाभ लेना उचित नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम या लोकतंत्र की रक्षा कोई नौकरी नहीं थी, जिसमें पेंशन ली जाए। जन आंदोलन में भागीदारी उन्होंने कर्तव्य समझकर की थी। सरकार से आर्थिक लाभ लेना उनके विचार से नैतिक रूप से गलत है, खासकर तब जब देश की आम जनता गरीबी की विभिषिका से जूझ रही है।
समाजवादीयों और गांधी दर्शन में विश्वास रखने वालों ने भी पेंशन लेने से इनकार किया। उनके अनुसार लोकतंत्र की रक्षा के लिए बलिदान पर मुआवजा लेना उनकी गरिमा को कम करता है। ऐसे लोगों ने अपने इस त्याग का कोई प्रचार भी नहीं किया।
#पेंशन की पात्रता*
भारत सरकार द्वारा स्वतंत्रता संग्राम की पेंशन प्राप्त करने की पात्रता का पैमाना 6 महीने की कैद अथवा ब्रिटिश सरकार द्वारा किसी भी तरह से सताए जाने की घटना को निर्धारित किया गया था। वहीं मीसाबंदी पेंशन प्राप्त करने के लिए एक माह की कैद को पर्याप्त माना गया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पेंशन में प्रतिवर्ष महंगाई भत्ता भी जोड़ा जाता है। वर्तमान में यह पेंशन 41 हजार 400 रुपए है। अंडमान में कारावास भुगतने वालों के लिए 44 हजार 400 रुपए पेंशन का प्रावधान रखा गया है। सरकार स्वतंत्रता सेनानी के निधन पश्चात उसके आश्रित माता-पिता अथवा पत्नी के लिए आधी पेंशन 19 हजार 240 रुपए तथा अविवाहित तीन बेटियों के लिए 22 हजार 200 रुपए निर्धारित की गई है।
मध्य प्रदेश में 2 हजार मीसाबंदियों को 30 हजार रुपए पेंशन मिलती है। उनके निधन पर आश्रितों को 8 हजार रुपए पेंशन मिलने का प्रावधान रखा गया है। एक माह से कम अवधि के लिए जेल जाने वालों को भी 3 से 8 हजार प्रति माह दिए जाते हैं। उनको भी पेंशन दी जाती है जिन्होंने जेल में तत्कालीन सरकार से अनेक बार आवेदनों के माध्यम से अपने कृत्य पर खेद व्यक्त करते हुए क्षमा मांगी और सदैव सरकार की आपातकालीन नीतियों का समर्थन करने का वादा किया।
मीसा बंदियों की श्रेणी में भी कम्युनिस्टों ने पेंशन के लिए कभी आवेदन नहीं किया। आपातकाल में कई पत्रकारों को भी गिरफ्तार किया गया था उनमें से एक पत्रकार कन्हैयालाल नंदन ने भी मीसबंदी पेंशन के लिए आवेदन नहीं किया था। ऐसे अनेक प्रबुद्ध जन है जिन्होंने संघर्षों का मुआवजा नहीं लिया। ऐसे पेंशन ठुकराने वालों को न कोई जानता है नहीं पहचानता है।





