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*आदिवासी अधिकार, विकास और अस्तित्व का संकट*

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संयुक्त राष्ट्र की घोषणा से लेकर भारत की जमीनी हकीकत तक विश्व आदिवासी दिवस और चुनौतीपूर्ण संदर्भ

हर वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ़ एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि दुनिया भर के आदिवासी समुदायों के अधिकारों, अस्तित्व और पहचान को बचाने का संकल्प है।

परंतु आज, जब ‘विकास’ का अर्थ पूंजी, मुनाफा और संसाधनों के दोहन से जोड़ा जाने लगा है, आदिवासी जीवन-दर्शन इसके विपरीत खड़ा है। उनका अस्तित्व जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़ा है—और यही तीनों तत्व आज सबसे बड़े खतरे में हैं।

 संयुक्त राष्ट्र का आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र – एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 13 सितंबर 2007 को आदिवासी जनों के अधिकारों पर घोषणा पत्र (UNDRIP) को पारित किया। यह दस्तावेज़ आदिवासी समुदायों को उनकी पारंपरिक भूमि, संसाधनों, संस्कृति और स्वशासन के अधिकार को मान्यता देता है।

विकसित देशों का रवैया और परिवर्तन

कनाडा

कनाडा में आदिवासियों को First Nations यानी ‘प्रथम नागरिक’ का दर्जा है। प्रारंभ में कनाडा ने UNDRIP का विरोध किया, यह तर्क देते हुए कि यह उसके संविधान, खासकर अनुच्छेद 35, से मेल नहीं खाता।

Assembly of First Nations के लगातार दबाव के बाद 12 नवंबर 2010 को कनाडा ने घोषणा पत्र को स्वीकार किया।

ऑस्ट्रेलिया

लंबी बहस और संवैधानिक संशोधनों के बाद 3 अप्रैल 2009 को रुड्ड सरकार ने UNDRIP को अंगीकृत किया। इसके बाद कई सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत पारंपरिक उद्घोषणा और आदिवासी पूर्वजों के सम्मान के साथ होती है।

न्यूज़ीलैंड

माओरी समुदाय के दबाव में 19 अप्रैल 2010 को इसे अपनाया गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका

राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में 16 दिसंबर 2010 को समर्थन दिया गया।

इन देशों में सफलता की एक समान वजह है—मानवाधिकार चेतना, नागरिक सहभागिता और सामूहिकता की मजबूत परंपरा।

घोषणा पत्र की सीमाएँ

अप्रैल 2009 तक डरबन रिव्यू कॉन्फ़्रेंस में 182 देश इसे स्वीकार कर चुके थे। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यानी कोई देश इसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं होता। इसी कारण इसे कई बार “दंतहीन और विषहीन सर्प” कहा गया—जो डराता तो है, पर काट नहीं सकता।

भारत का दृष्टिकोण और अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के कन्वेंशन

भारत ने UNDRIP के पक्ष में मतदान किया, लेकिन उसका तर्क है—“हमारे देश में सभी नागरिक मूलवासी हैं” और आदिवासी समुदाय को पहले से पर्याप्त संवैधानिक अधिकार दिए जा चुके हैं।

भारत के रुख को समझने के लिए ILO के दो कन्वेंशन महत्वपूर्ण हैं:

1. ILO कन्वेंशन 107 (1957) – इसमें ‘जनजाति’ शब्द का उल्लेख है।

भारत ने इसे इसलिए स्वीकार किया क्योंकि अनुसूचित जनजातियों को संविधान में पहले से मान्यता और अधिकार प्राप्त हैं।

2. ILO कन्वेंशन 169 (1989) – इसमें देशज और आदिवासी समुदाय को कई अतिरिक्त अधिकार देने की बात है:

आत्मनिर्णय और स्वशासन

भूमि, वन और जल संसाधनों पर एकाधिकार

सांस्कृतिक एवं धार्मिक संरक्षण

शिक्षा और सूचना पर नियंत्रण

पूर्व सूचना और दबाव-मुक्त सहमति (Free, Prior and Informed Consent)

यह अंतिम प्रावधान भारत के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि आदिवासी क्षेत्रों में मौजूद खनिज, वन और जल संसाधनों का औद्योगिक दोहन इस अनुमति के बिना संभव नहीं।

‘देशज आदिवासी’ की परिभाषा

जोस आर. मार्टिनेज़ कोबो के अनुसार, देशज आदिवासी वे हैं:

जो आदिकाल से किसी क्षेत्र में निवासरत हों,

जिनकी भाषा, संस्कृति, और जातीय पहचान मुख्यधारा से भिन्न हो,

जिनका इतिहास औपनिवेशिक हस्तक्षेप से पहले से स्थापित समाज का हो,

और जो अपनी भूमि को सामूहिक धरोहर मानते हों।

जैविक विविधता के कन्वेंशन के अनुच्छेद 8(ज) में भी यही दृष्टिकोण दोहराया गया है।

 आदिवासी जीवन-दर्शन और मौजूदा विकास मॉडल का टकराव

सहजीवन और सामूहिकता का आधार

हर आदिवासी समुदाय ने अपनी आजीविका, स्वास्थ्य, औषधि और आवास की जरूरतें प्राकृतिक संसाधनों के सहजीवन से पूरी की हैं।

उनका विश्वास है कि जल, जंगल और जमीन उनकी जरूरतें पूरी करेंगे, इसलिए वे इनका दोहन नहीं, संरक्षण करते हैं। जंगल उनके लिए मंदिर है और पेड़ देवता।

आर्थिक ‘पिछड़ेपन’ की गलत परिभाषा

मुख्यधारा का विकासवादी नजरिया अक्सर आदिवासियों को ‘आर्थिक रूप से कमजोर’ बताता है, जबकि उनका समतामूलक और आत्मनिर्भर जीवन ही असल में स्थायी विकास का उदाहरण है।

उनकी संस्कृति में शासक-शोषित की वर्गीय अवधारणा नहीं पनपी।

औपनिवेशिक काल से संसाधनों पर कब्जा

ब्रिटिश शासन हो या स्वतंत्र भारत—सत्ताधारी वर्गों ने आदिवासी समाज को उनके जल, जंगल, जमीन से वंचित किया।

खनन, बांध, अभयारण्य और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर उनकी भूमि का अधिग्रहण हुआ।

1950 से 1990 के बीच 87 लाख आदिवासी विस्थापित हुए (जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 2016 की रिपोर्ट)।

‘मुख्यधारा’ में जोड़ने की अवधारणा – एक साजिश

कथित ‘मुख्यधारा’ में जोड़ने का अर्थ कई बार उन्हें उनकी संस्कृति और संसाधनों से दूर करना रहा है। यह श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त सोच है, जो उन्हें आत्मनिर्भरता से परनिर्भरता की ओर धकेलती है।

 लोकतांत्रिक भागीदारी और स्वशासन के प्रश्न

लोकतंत्र की बहुमत-आधारित संरचना में आदिवासी समुदाय छोटी जनसंख्या इकाई होने के कारण हाशिये पर चले जाते हैं। उनकी सोच ‘बहुमत’ नहीं, ‘सर्वमत’ पर आधारित है।

भारत के संविधान में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम – PESA और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रावधान आदिवासी स्वशासन को मान्यता देते हैं, लेकिन इनका पालन ढीला है।

गांव गणराज्य की अवधारणा

कई आदिवासी इलाकों में ‘हमारे गांव में हमारा राज’ का नारा गूंज रहा है। गांव-गांव में गांव गणराज्यों की स्थापना को वे स्वायत्तता और संसाधन संरक्षण का मार्ग मानते हैं।

 वैश्वीकरण और संसाधनों पर हमला

वैश्वीकरण और पूंजीवादी विकास मॉडल ने वनों, जल और खनिज संपदा को ‘बाजार’ के रूप में देखा।

खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण ने आदिवासी जीवन-दर्शन पर सीधा आघात किया।

उन्हें बिना पूछे ‘विकास’ की अंधी दौड़ में घसीटा गया।

 अस्तित्व का संकट और दुनिया के लिए सबक

आदिवासी दर्शन प्रकृति को पूरक मानता है, संसाधन मानकर शोषण का साधन नहीं।

उनका अस्तित्व खत्म होना केवल एक समुदाय का अंत नहीं होगा—यह मानव सभ्यता के स्थायी विकास के ज्ञान का अंत होगा।

दुनिया भर के जलवायु संकट, जैव विविधता ह्रास और सामाजिक असमानता के बीच आदिवासी जीवन-पद्धति ही एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है।

 अधिकार से अस्तित्व तक की लड़ाई

संयुक्त राष्ट्र का घोषणा पत्र, ILO कन्वेंशन और भारतीय संविधान सभी आदिवासी अधिकारों को मान्यता देते हैं,

लेकिन जमीनी हकीकत में आदिवासी समुदाय आज भी विस्थापन, संसाधन लूट और सांस्कृतिक हमलों का सामना कर रहे हैं।

यदि आदिवासी जीवन-दर्शन—सहजीवन, सामूहिकता और प्रकृति-सम्मान—को विकास की मुख्य धारा में नहीं लाया गया,

तो न केवल आदिवासी अस्तित्व खतरे में होगा, बल्कि हमारे ग्रह का भविष्य भी।

Ramswaroop Mantri

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