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*एक बार फिर गांधी केस चलाया जाएगा और गोडसे को बाइज्जत बरी कर दिया जाएगा* 

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राजेंद्र शर्मा

गोडसे कौन था? वही नाथूराम गोडसे। वही नाथूराम गोडसे जिसे महात्मा गांधी की हत्या के लिए फांसी की सजा दी गयी थी। शायद हमसे शुरू से ही गलती हो रही है। हम गोडसे का नाम इस तरह कैसे ले सकते हैं– नाथूराम गोडसे? गोडसे नाम के आगे जी तो लगाया ही जाना चाहिए था। यह अमृत काल है। राम राज्य भी आ चुका है। पुरानी वाली आजादी के बाद लिखा गया झूठा इतिहास बदला जा रहा है। जिन देशभक्तों को पिछले इतिहास में भुला दिया गया था, उन्हें याद किया जा रहा है। जिन देशभक्तों को लोगों की नजरों से छुपा दिया गया था, उन्हें खोजा जा रहा है। सावरकर जी का वीरत्व स्थापित किया जा चुका है। अब चेले, गोडसे जी की देशभक्ति साबित किए जाने की बारी है। 

साध्वी प्रज्ञा ने तो कई साल पहले ही एलान कर दिया था कि अगर गांधी देशभक्त थे, तो गोडसे भी देशभक्त थे। कितनी सही बात है। एकदम समदर्शितापूर्ण। दोनों देशभक्त। अपने-अपने तरीके से दोनों देश की सेवा में रत। क्या हुआ कि एक देशभक्त ने दूसरे देशभक्त को गोली मार दी। एक नहीं तीन गोलियां मारीं, मगर उससे भी क्या? गोलियां खाने वाला देशभक्त मर गया, उससे भी क्या? था तो आखिरकार, दो देशभक्तों के बीच का मामला ही। देशभक्त भी ऐसे-वैसे नहीं, अंगरेजों के जमाने वाले। हमें क्या अधिकार है दो देशभक्तों के झगड़े में टांग अड़ाने का? हमें क्या अधिकार है, किसी को हत्यारा और किसी को मकतूल कहने का? हमें क्या अधिकार है, किसी को खलनायक और किसी को शहीद मानने का?

इस मसले का निपटारा अब हो ही जाना चाहिए। अमृतकाल में इसका निपटारा अब और लटका नहीं रहने दिया जा सकता। देखा नहीं कैसे अमित शाह के संसद में इसका एलान करने भर की देर थी कि ‘हिंदू आंतकवादी नहीं हो सकता है’, सेकुलर बिरादरी ने जवाब के नाम पर नाथूराम गोडसे को आगे कर दिया है। 

उस पर कह रहे हैं कि अमित शाह की बात तो गलत हो नहीं सकती, अभी-अभी कथावाचक, प्रदीप मिश्र ने उन्हें शंकर का अवतार घोषित किया है। जरूर हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता होगा। जरूर हिंदुओं में कोई मैन्यूफैक्चरिंग फॉल्ट होगा, जो उन्हें आतंकवादी बनने से रोकता होगा। शंकर के अवतार से बेहतर यह बात और कौन जान सकता है? फिर इससे तो मोदी जी भी असहमत नहीं हो सकते हैं, जो पहले ही विष्णु के अवतार घोषित हो चुके हैं। अब बस योगी जी ब्रह्मा के अवतार घोषित हो जाएं, फिर तो हिंदुओं के आतंकवादी नहीं हो सकने पर महा-त्रयी की ही मोहर लग जाएगी। इसमें अगर कोई देरी हो रही है तो सिर्फ इसलिए कि योगी जी की उम्र, ब्रह्मा जी से मैच नहीं खाती है। दाढ़ी भी नहीं है। और मोदी जी विष्णु और ब्रह्मा जी के बीच अदला-बदली करने के लिए तैयार होने से रहे। 

खैर! सेकुलरवाले हुज्जत कर रहे हैं कि शाह जी सही हैं, तो गोडसे कौन था? हिंदू था या महात्मा गांधी की हत्या करने वाला आतंकवादी था? अब हिंदू था तो हत्यारा आतंकवादी हो नहीं हो सकता। और हत्यारा आतंकवादी था, तो हिंदू नहीं हो सकता। तब गोडसे था कौन? इस सवाल का जवाब जरूरी है, वर्ना गोडसे की गोली से गांधी का सीना छलनी हुआ सो हुआ, शाह जी का अवतारत्व भी छलनी हो जाएगा! अवतार शंकर का और वचन सरासर झूठे!

वैसे गोडसे और गांधी का यह पूरा किस्सा सच ही है, इसकी क्या गारंटी है? यह किस्सा पुरानी आजादी के टैम का है। उसमें भी नेहरू के राज का। माना कि सरदार पटेल भी इस किस्से की तस्दीक करते थे। सिर्फ तस्दीक ही नहीं करते थे, उन्होंने तो इसे सच मनवाने के चक्कर में, आरएसएस जैसे सच्चरित्र संगठन पर पाबंदी ही लगा दी थी। उनका तो कहना था कि गोली भले गोडसे ने चलायी हो, पर कारतूस में बारूद सावरकर और गोलवालकर के लोगों ने भरा था। पर इसका तो कोई प्रमाण नहीं है कि यही सरदार पटेल के वास्तविक विचार थे। बेचारे सरदार भी क्या करते? नेहरू पीएम बन बैठे और सरदार नंबर-दो रह गए। मामूली गृहमंत्री। बेचारे को नेहरू की हर बात माननी पड़ती थी। उनकी तबियत भी कुछ ठीक नहीं रहती थी। 

नेहरू ने कहा गोडसे ने गांधी को मारा था, सरदार को भी हां में हां मिलाकर कहना पड़ा कि गोडसे ने ही गांधी को मारा था। सारी दुनिया को भी यही मानना पड़ा कि गोडसे ने गांधी को मारा था। और जो आरएसएस देश-दुनिया को बता सकता था कि गोडसे हिंदू था और हिंदू आतंकवादी हत्यारा नहीं हो सकता है, उस पर पाबंदी लगी हुई थी। सच को दबा दिया गया। हिंदू को आतंकवादी हत्यारा बना दिया गया।

लेकिन, अब और नहीं। दूसरी आजादी के बाद नहीं। अमृत काल में नहीं। आज नहीं तो कल, एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकों से सच सामने आ ही जाएगा। दुनिया को पता चल ही जाएगा कि गोडसे ने गांधी को नहीं मारा था। गोडसे गांधी को मार ही नहीं सकता था। गोडसे हिंदू था और हिंदू आतंकी हत्यारा हो ही नहीं सकता। गांधी को किसी और ने मारा होगा और तुष्टीकरण के लिए नेहरू ने गोडसे का नाम लगा दिया, जो एक हिंदू था। वैसे शोध का विषय तो यह भी है कि क्या गांधी को वाकई गोली ही लगी थी? इस पर तो खैर काफी राष्ट्रवादी शोध कर भी चुके हैं कि गोली खाकर गिरते-गिरते गांधी के आखिरी शब्द ‘‘हे राम’’ नहीं थे। जय श्रीराम तो बिल्कुल ही नहीं थे। उनके आखिरी शब्द थे, ‘‘हाय राम’’, जो अचानक चोट लगने पर किसी भी साधारण मनुष्य की प्रतिक्रिया होती है।

वैसे हो तो यह भी सकता है कि गांधी की हत्या के लिए गोडसे पर दोष मढना, एक गहरे हिंदू-विरोधी षडयंत्र का हिस्सा रहा हो। जरूर इसके पीछे मकसद बाद में हिंदुओं को आतंकवादी कहकर बदनाम करना होगा। और यह भी कि असली आजादी के बाद जब अमित शाह यह कहें कि हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता, तो उनकी बात काटने के लिए गोडसे का नाम लिया जा सके। पर अब यह झूठ और नहीं चलेगा। अब तो अदालतों ने भी मानना शुरू कर दिया है कि हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता है। मालेगांव केस में तभी तो साध्वी प्रज्ञा समेत सब छूट गए। वह दिन दूर नहीं है जब एक बार फिर गांधी केस चलाया जाएगा और गोडसे को बाइज्जत बरी कर सारी दुनिया से मनवाया जाएगा कि हिंदू आतंकवाद, आतंकवाद ना भवति। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)

Ramswaroop Mantri

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