खेतों में उम्मीद की फसल बोने और छोटे किसानों की जिंदगी में नई सुबह लाने वाली ICRISAT की कृषि वैज्ञानिक डॉ. ममता शर्मा का नाम आज हर जुबान पर है। कृषि अनुसंधान एवं तकनीकी विकास में डॉ. ममता शर्मा के समर्पण को सम्मानित करते हुए, उन्हें प्रतिष्ठित M.S. Swaminathan-Grow Further पुरस्कार से नवाजा गया है।

यह उन खेतों की कहानी है, जहां बारिश की बूंदें कम पड़ती हैं, कीट और बीमारियां फसलों को नष्ट कर देती हैं और छोटे किसान हर दिन जलवायु परिवर्तन की मार झेलते हैं। हैदराबाद स्थित अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) की कृषि वैज्ञानिक डॉ. ममता शर्मा ने इन्हीं चुनौतियों को अपनी ताकत बनाया और किसानों के लिए ऐसी फसलें और तकनीकें विकसित कर दिखाई, जो न सिर्फ मौसम की मार झेल सकें, बल्कि उनकी थाली में खाना और जेब में पैसा भी लेकर आएं। 40000 से अधिक किसानों तक रोग-प्रतिरोधी दलहनी किस्में और जलवायु अनुकूल कृषि तकनीक पहुंचाकर डॉ. ममता शर्मा ने खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने में अहम योगदान दिया है।
25,000 अमेरिकी डॉलर का पुरस्कार
हरित क्रांति के जनक Prof. MS Swaminathan की जन्मशती के अवसर पर, डॉ. ममता शर्मा को जलवायु-अनुकूल कृषि अनुसंधान और छोटे किसानों की आजीविका सुधारने वाले उनके कार्यों के लिए एम.एस. स्वामीनाथन-ग्रो फर्दर पुरस्कार (M.S. Swaminathan-Grow Forward Award) से सम्मानित किया गया है। 7-9 अगस्त, 2025 को नई दिल्ली में आयोजित एम.एस. स्वामीनाथन शताब्दी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने उन्हें 25,000 अमेरिकी डॉलर की पुरस्कार राशि के साथ यह सम्मान प्रदान किया। लेकिन, ये कहानी सिर्फ एक पुरस्कार की नहीं है, बल्कि ये कहानी किसानों की जिंदगी में कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों से आने वाले बदलाव की भी है।
छोटे किसानों की चैंपियन डॉ. ममता शर्मा
डॉ. शर्मा का काम चना और अरहर जैसी दलहनी फसलों पर केंद्रित है, जो भारत के छोटे किसानों की आजीविका का बड़ा आधार माने जाती हैं। लेकिन, ये फसलें कीटों और बीमारियों का आसान शिकार बनती हैं। डॉ. शर्मा ने अपने अनुसंधान से 30 से अधिक रोग-प्रतिरोधी दलहन किस्में विकसित की हैं, जो न सिर्फ कीटों से लड़ती हैं, बल्कि सूखे और अनियमित बारिश जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी सह सकती हैं। डॉ. ममता शर्मा ने ICRISAT में जलवायु परिवर्तन अनुसंधान सुविधा की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। ये सुविधा एक ऐसी प्रयोगशाला है, जहां वैज्ञानिक मौसम की मार को समझकर फसलों को बचाने के नए-नए तरीके खोजते हैं। चाहे वह आधुनिक फसल सुरक्षा उपकरण हों या जलवायु-अनुकूल खेती की तकनीकें, डॉ. शर्मा ने हर कदम पर किसानों को मजबूती दी।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. ममता शर्मा ने जलवायु अनुकूल दलहनी फसलों की 30 किस्मों का विकास किया। – फोटो : इक्रीसैट40000 किसानों की जिंदगी में बदलाव
डॉ. शर्मा का काम सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, और तेलंगाना जैसे वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों में 40,000 से अधिक किसानों तक अपनी तकनीकों को पहुंचाया। ये वो इलाके हैं, जहां पानी की कमी और अनिश्चित मौसम किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। डॉ. शर्मा की रोग-प्रतिरोधी फसलें और जलवायु-अनुकूल तकनीकों ने यहां के किसानों को न सिर्फ बेहतर पैदावार दी, बल्कि उनकी आय को भी बढ़ाया।
किसानों की जीत का प्रतीक बना पुरस्कार
एम.एस. स्वामीनाथन-ग्रो फॉरवर्ड पुरस्कार सिर्फ एक सम्मान नहीं, बल्कि उन वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा है, जो खेतों में मेहनत करने वाले किसानों की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन और ग्रो फॉरवर्ड ने इस पुरस्कार को छोटे किसानों, खासकर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित किसानों के लिए काम करने वालों को सम्मानित करने के लिए शुरू किया है। ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने इसे गर्व का पल बताया। उन्होंने कहा, “डॉ. शर्मा का काम उन लाखों किसानों की आवाज है, जो मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। उनकी मेहनत ने न सिर्फ फसलों को बचाया, बल्कि खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत किया।”
वैज्ञानिकों के लिए एक नई प्रेरणा
MSSRF की अध्यक्ष डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने इस पुरस्कार को समय की जरूरत बताया। उन्होंने कहा, “जब वैश्विक स्तर पर अनुसंधान के लिए फंडिंग कम हो रही है, तब ऐसे पुरस्कार युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे भूख, कुपोषण, और खाद्य असुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान खोजें।” ग्रो फॉरवर्ड के संस्थापक डॉ. पीटर केली ने भी डॉ. शर्मा की तारीफ की। उन्होंने कहा, “प्रोफेसर स्वामीनाथन ने हमें सिखाया कि विज्ञान की शुरुआत खेतों से होती है। डॉ. शर्मा का काम इस दर्शन को साकार करता है।”
डॉ. ममता शर्मा की कहानी सिर्फ एक वैज्ञानिक की नहीं, बल्कि उन अनगिनत किसानों की है, जिनके खेतों में उनकी मेहनत ने नई उम्मीदें बोई हैं। ये पुरस्कार न सिर्फ उनकी उपलब्धियों का सम्मान है, बल्कि उन छोटे किसानों की जीत का प्रतीक है, जो हर दिन प्रकृति की मार से लड़कर देश के लोगों की थाली को भरते हैं। डॉ. शर्मा की तरह के वैज्ञानिकों की बदौलत ही भारत का ग्रामीण भविष्य और उज्ज्वल हो रहा है।




