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*राजनीतिक शुचिता , मर्यादा और  भाषा की बिताए तोड़ती सियासत*

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श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस संसदीय दल के सदस्यों विशेष तौर पर गुलाम नबी आज़ाद को सख्त लहज़े में प्रम अटल बिहारी वाजपेयी  की निजी जिंदगी की किसी भी बात को संसद में छेडने से मनाही कर दी थी । 

शरद यादव ने जब संसद में अटल बिहारी वाजपेयी की तीखी आलोचना पर लक्ष्मण रेखा लांघी थी तब चंद्रशेखर जी का रौद्र रूप किसी को याद कर लेना चाहिये और संसद में उन शब्दों को भी – “ याद रखना तुम्हारी सात पीढियों में भी कोई गुंडा पैदा न हो सकेगा “ 

पं० नेहरू और डा० लोहिया का आजादी के बाद का राजनीतिक विरोध संसद और बाहर भी अब तक का सबसे तीखा , सख्त और वैचारिकी पर आधारित रहा पर निजी जीवन के हमले किसी भी ओर से नहीं हुये । इसके बावजूद घर परिवार ठिकानाविहीन डा० लोहिया अपने धनाढ्य मित्रों  व अनुयायियों के बजाय नेहरु जी के घर को ही अपनी बीमारी में सबसे बेहतर जगह मानते थे  । 

बडे बडे कम्युनिस्ट नेता और धुर विरोधी जनसंघ ( अब भाजपा ) इसी संसद के सैंट्रल हॉल में गलबहियॉं करते , मजाक करते दिखते रहते थे । निजी जीवन का जिक्र कतई सार्वजनिक जीवन में स्थान नहीं पाता रहा । 

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ही किसी कूटनीतिक बहाने से गंभीर बीमारी के शिकार विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को अमरीका इलाजके लिये भेजा था । सदा विद्रोही , साधनविहीन और फक्कड़ नेता श्री राजनारायण को राजीव गांधी ने ही दिल्ली में एक सरकारी आवास अलॉट किया था कि वे बीमारी में अपने इलाज के लिये रह सकें , यह जानते हुये भी कि श्रीमती इंदिरा गांधी को अदालत व चुनाव दोनों में राजनारायण  जी ने ही हराया था  । 

अटल  बिहारी  वाजपेयी जब प्रधानमंत्री  बने ही थे तो अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा से अतीत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों की पूरी तफसील जानने के बाद ही कहा था कि उनकी सरकार यह सुनिश्चित  करे कि इंदिरा गांधी के वारिस सोनिया गॉंघी के परिवार को कोई  और कैसा भी संकट न झेलना पड़े । 

१९७७ में इंदिरा गांधी को आपातकाल के बाद चुनाव हराने के रचनाकार लोकनायक जयप्रकाश नारायण जनता पार्टी  की विजय सभा में नही जाकर पदच्युत  इंदिरा गाॉधी के घर गये , हालचाल लिया , अतीत की गहरी पारिवारिक  मित्रता को यादकर दोनों ही रोये और जेपी की पत्नी प्रभावती और कमला नेहरू के बीच पत्राचार के नितांत निजी पत्रों का सीलबंद पोथा दे आये थे कि कहीं कोई बाद में उनका दुरुपयोग न कर बैठे । 

भारतीय राजनीति  में धुर विपरीत राजनीतिक विचार हमेशा से रहे हैं । गांधी जी सब कुछ जानते हुये भी सावरकर से मिल कर उनसे कुछ तो सीखने की बात कहते थे । सुभाष बाबू पहले दर्जे के महान देशभक्त हैं और उनकी जय का नारा गांधी जी ने खुद लगवाया था , आजादी पूर्व की सभा में । सुभाष बोस ने ही अपने विपरीत विचारों के महात्मा गांधी को राष्ट्र पिता और कस्तूरबा जी को देश की मॉं घोषित किया था।  शहीद भगत सिंह घनघोर कम्युनिस्ट व नास्तिक थे लेकिन जवाहरलाल नेहरू की प्रशंसा करते थे। 

हमेशा से ही अच्छी  संसदीय व लोकतांत्रिक परम्पराओं की स्थापना और निर्वाह सत्ता दल को ही करना चाहिये करना पडता है और विपक्ष को अपने तीखे विरोध  के साथ साथ मर्यादा पालन भी। मामला इस बार सीमाओं  को तोड चुका है और उस पक्ष के द्वारा जिसकी ऊपर इतिहास और देश  की जनता ने ज़िम्मेदारी डाली कि वे सरकार के संग संग राजनीतिक शुचिता , व्यवहार की मर्यादा और उच्च स्तर की राजनीतिक भाषा की स्थापना करें। अब इस आक्रामकता के नेता खुद प्रधानमंत्री  हैं और पीछे पीछे अंधभक्त मंत्रियों सांसदों प्रवक्ताओ की गालीबाज फौज । विपक्ष इस कीचड़  उछाल में पिछड चुका है हालांकि वे ऐसा चाहते नहीं हैं  । भाजपा को यदि संघ चाहता तो नियंत्रण में रख सकता था  । 

गाली गलौज कीचड़ फैंक राजनीति से जितना वोट मिलना था सो मिल चुका । अब उसका अंत अलोकप्रियता और जबरिया रणछोड़  से संभव दिखता है   । 

कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने वित्तपोषित सोशल इनफ्लुंयंसर्स और कुछ समर्थकों को भी अब वह पुरानी राजनीतिक संस्कृति कैसे सिखा पायेगी जो आज पुराने गड़े लेकिन सड़ चुके मुर्दों को उखाड़ कर गंदगी फैला रहे हैं हालाँकि वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान इसी कब्रखोदू राजनीति को फिर से शुरु करने के लिये ज़िम्मेदार है ।  जैसे को तैसा जवाब देना और दुश्मनों की एक आंख फोड़ कर वैसा ही जवाब देना तो दुनिया को अंधा तो बाद में बनायेगा पहले समूचे वातावरण को इतना दुर्गंधित कर देगा कि साँस लेना दूभर हो जायेगा।

रमाशंकर सिंह 

Ramswaroop Mantri

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