
अमित शुक्ला
टॉप डेवलपमेंट इकनॉमिस्ट कार्तिक मुरलीधरन ने गवर्नमेंट सेक्टर के सैलरी स्ट्रक्चर पर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि भारत का सरकारी क्षेत्र वेतन के मामले में बहुत गड़बड़ है। लगभग 95% सरकारी नौकरियों में मार्केट रेट से पांच गुना ज्यादा वेतन मिलता है। वहीं, शीर्ष स्तर के निर्णय लेने वाले लोगों को बाजार के हिसाब से बहुत कम वेतन मिलता है। मुरलीधरन के अनुसार, यह एक बड़ी समस्या है। निचले स्तर के कर्मचारियों को ज्यादा वेतन मिल रहा है। वहीं, टॉप लेवल के अधिकारियों को कम। इस वजह से कई तरह की दिक्कतें हैं। मसलन, भर्ती में परेशानी, गलत लोगों का चयन और युवाओं का सरकारी नौकरी की तैयारी में समय बर्बाद होना। मुरलीधरन ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए भर्ती प्रक्रिया में बदलाव करने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि हमें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए ताकि सही लोगों को सही नौकरी मिल सके।

कार्तिक मुरलीधरन कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उन्होंने भारत के सरकारी क्षेत्र में वेतन को लेकर एक बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों में सैलरी स्ट्रक्चर बहुत बिगड़ा हुआ है। उनके अनुसार, 95% सरकारी नौकरियों में बाजार दर से पांच गुना ज्यादा वेतन मिलता है। लेकिन, जो लोग ऊंचे पदों पर हैं और बड़े फैसले लेते हैं, उन्हें बाजार के हिसाब से बहुत कम वेतन मिलता है।
मुरलीधरन ने कहा, ‘यह सबसे बड़ी समस्या है – सरकारी क्षेत्र में वेतन का दबाव।’ इसका मतलब है कि नीचे के स्तर पर वेतन बहुत ज्यादा है, जबकि ऊपर के स्तर पर बहुत कम। उन्होंने आगे कहा, ‘ऊपर के 1 या 2% लोग ऐसे फैसले लेते हैं जो ज्यादातर सीईओ के फैसलों से भी ज्यादा जटिल होते हैं, उन्हें बाजार के हिसाब से बहुत कम वेतन मिलता है। लेकिन, 95% सरकारी नौकरियों के लिए आप बाजार से पांच गुना ज्यादा वेतन दे रहे हैं।’
यूपी का दिया उदाहरण
मुरलीधरन भारत में नौकरियों के पिरामिड में गड़बड़ी के बारे में बात कर रहे थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण दिया, जहां 368 चपरासी की नौकरियों के लिए 23 लाख लोगों ने आवेदन किया। इनमें PhD वाले भी शामिल थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इन नौकरियों में वेतन बहुत ज्यादा था और काम का बोझ कम था।
मुरलीधरन के अनुसार, वेतन में इस गड़बड़ी के कारण चार बड़ी समस्याएं होती हैं। पहली समस्या यह है कि ज्यादा लोगों को नौकरी पर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा, ‘अर्थशास्त्र का पहला नियम कहता है कि मुझे कम वेतन देना चाहिए और ज्यादा लोगों को नौकरी पर रखना चाहिए।’ लेकिन, सारा पैसा पहले से काम कर रहे लोगों को देने में चला जाता है। ऐसे में नए लोगों को नौकरी पर रखने के लिए पैसा नहीं बचता।
इकनॉमिस्ट ने तमिलनाडु के एक अध्ययन का उदाहरण दिया। इसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को 4,000-5,000 रुपये प्रति माह पर नौकरी पर रखने से बहुत अच्छे परिणाम मिले। उन्होंने कहा, ‘हमने सीखने के परिणामों में बहुत सुधार देखा और कुपोषण में कमी आई।’ उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा करने से लंबे समय में 2,000% का फायदा होता है। यानी 20 गुना ज्यादा फायदा।
इसके उलट उनके एक पेपर में यह दिखाया गया कि मौजूदा कर्मचारियों का वेतन दोगुना करने से कोई फायदा नहीं हुआ। उनके पेपर का टाइटल था ‘डबल फॉर नथिंग’।
भर्ती में आती है मुश्किल
दूसरी समस्या यह है कि इन नौकरियों में वेतन इतना ज्यादा है कि भर्ती करना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा, ‘आपके पास 100 गुना ज्यादा आवेदन आते हैं।’ इसलिए भर्ती प्रक्रिया इतनी मुश्किल हो जाती है कि हर साल भर्ती करने के बजाय आप इसे तीन, चार या पांच साल में एक बार करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में पेपर लीक होने की घटनाएं होती हैं। कारण है कि इन नौकरियों में बहुत ज्यादा पैसा मिलता है। पेपर लीक होने का खतरा इतना ज्यादा होता है कि आप इतना ज्यादा वेतन देकर अपनी व्यवस्था को पंगु बना देते हैं।
तीसरी समस्या यह है कि लोगों की दिलचस्पी सही नहीं होती। उन्होंने कहा, ‘लोग कहते हैं कि मैं वन रक्षक के लिए आवेदन करूंगा, मैं शिक्षक के लिए आवेदन करूंगा, मैं चपरासी के लिए आवेदन करूंगा।’ जिस व्यक्ति का चयन होता है, उसकी अक्सर उस क्षेत्र में कोई रुचि नहीं होती है। उन्होंने सिर्फ हर संभव लॉटरी के लिए आवेदन किया होता है।
चौथी सबसे अनदेखी समस्या यह है कि सरकारी परीक्षा की तैयारी के कारण बेरोजगारी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा, ‘तमिलनाडु जैसे तेजी से बढ़ते राज्य में भी शिक्षित युवाओं की 80% बेरोजगारी इसलिए है क्योंकि वे सरकारी परीक्षा के बाद सरकारी परीक्षा लिख रहे हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘अगर आप समय के नुकसान के हिसाब से देखें तो हर व्यक्ति जिसे नौकरी मिलती है, उसके लिए हजारों लोगों का समय बर्बाद होता है।’
उन्होंने यह भी कहा कि इससे कौशल विकास भी प्रभावित होता है। अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा वेतन देने वाले नियोक्ता को कौशल की परवाह नहीं है। उन्हें सिर्फ परीक्षा पास करने की परवाह है। उन्होंने समझाया, ‘आपने एक पूरी शिक्षा प्रणाली बना ली है। रट्टा मार मार के, जुगाड़ कर के एग्जाम पास हो जाता है। लेकिन, लोग कौशल विकास कार्यक्रमों से बाहर हो जाते हैं क्योंकि कौन जवाबदेह होने की मेहनत करना चाहता है?’
भर्ती प्रक्रिया बदलने का दिया सुझाव
मुरलीधरन ने इस बात को खारिज कर दिया कि निजी क्षेत्र में नौकरियां पैदा करना समस्या है। उन्होंने कहा, ‘निजी क्षेत्र नौकरियां पैदा करता है। लेकिन, बाजार के वेतन पर। सरकारी क्षेत्र ही बाजार की हकीकत से बाहर है।’
आगे बढ़ने के रास्ते के रूप में मुरलीधरन ने एजुकेशन, नर्सिंग और पुलिसिंग जैसे क्षेत्रों में फ्रंटलाइन भूमिकाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया को बदलने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, ’12वीं के बाद आप एक प्रैक्टिकल-आधारित नर्स या शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हों। तीन महीने का सिद्धांत और नौ महीने का अभ्यास। चार साल के अंत में नियमित सरकारी भर्ती के लिए आप उन लोगों को अतिरिक्त अंक देना शुरू कर दें जिन्होंने उस क्षेत्र में काम किया है।’
इकनॉमिस्ट ने कहा कि इससे यह मॉडल ‘एक सामान्य लॉटरी’ से बदलकर ऐसा हो जाएगा जो रुचि, अनुभव और वास्तविक क्षमता को पुरस्कृत करता है। इसका मतलब है कि जो लोग वास्तव में काम करना चाहते हैं और जिनके पास उस काम का अनुभव है, उन्हें नौकरी मिलने की संभावना ज्यादा होगी।




