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*जातिवाद से तबाह हुआ भारत और डॉ. भीमराव अंबेडकर का चेतावनी*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारत एक ऐसा देश है, जो अपनी सांस्कृतिक विविधता, परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में सम्मानित है। किंतु इस चमकदार विरासत के भीतर एक गहरी दरार भी है, जिसने सदियों से समाज को खंड-खंड कर दिया है—वह है जातिवाद। जातिवाद केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की जड़ों को खोखला करने वाला वह अभिशाप है, जिसने इंसान को इंसान से अलग कर दिया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे भारत की सबसे बड़ी बीमारी बताया और चेतावनी दी—“इसे खत्म करो या खत्म हो जाओ।”

          भारत की सभ्यता और संस्कृति अपनी प्राचीनता, विविधता और आध्यात्मिक ऊंचाइयों के लिए जानी जाती है। यहाँ एक ओर वेदों की ऋचाएँ गूँजती हैं, तो दूसरी ओर बुद्ध और कबीर की करुणा और समानता का संदेश मिलता है। किंतु इस गौरवमयी धरोहर के भीतर एक ऐसी गहरी दरार भी रही, जिसने समाज को खंड-खंड कर दिया—वह है जातिवाद। जातिवाद ने केवल इंसानों को विभाजित नहीं किया, बल्कि उनकी आत्मा को भी बाँध दिया। इसने सदियों तक लाखों-करोड़ों लोगों को शिक्षा, अवसर, सम्मान और समानता से वंचित रखा। गाँव-गाँव में अलग कुएँ, अलग मंदिर, अलग बस्तियाँ और यहाँ तक कि अलग श्मशान—यानी जीवन से लेकर मृत्यु तक यह विभाजन चलता रहा। इसी अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था को देखकर

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने चेतावनी दी थी—“जातिवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसे खत्म करो या यह तुम्हें खत्म कर देगा।”

          उनकी यह चेतावनी केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं थी, बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिए झकझोरने वाली पुकार थी। आज, जब हम डिजिटल युग में प्रवेश कर चुके हैं, अंतरिक्ष में कदम रख चुके हैं, तब भी यदि जातिवाद की जकड़न हमारे समाज में मौजूद है, तो यह न केवल दुखद है बल्कि हमारे विकास के लिए सबसे बड़ा अवरोध भी है।

   

जातिवाद का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव:

          जातिवाद ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को अंदर तक कमजोर किया है। गाँवों में आज भी कुएँ अलग हैं, स्कूलों में बच्चों के बैठने की जगह अलग है, श्मशान और कब्रिस्तान तक बँटे हुए हैं। यह केवल भौतिक विभाजन नहीं है, बल्कि मानसिक गुलामी का प्रतीक है। जातिवाद ने केवल सामाजिक असमानता ही नहीं पैदा की, बल्कि भारत की प्रगति को भी अवरुद्ध कर दिया। जब दलितों और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, व्यापार और रोजगार से वंचित किया गया, तब देश की आधी से अधिक प्रतिभा दबा दी गई। सोचिए, यदि किसी गाँव में दलितों को पढ़ने नहीं दिया गया, तो उस गाँव का डॉक्टर कौन बन पाता? यदि किसी जाति को व्यापार से रोक दिया गया, तो उस क्षेत्र का आर्थिक विकास कैसे होता? इस प्रकार जातिवाद ने समाज को ही नहीं, बल्कि पूरे भारत को पिछड़ेपन की ओर ढकेला।

 

अंबेडकर का संघर्ष और दृष्टिकोण:

          डॉ. अंबेडकर स्वयं उस पीड़ा से गुज़रे थे। अछूत माने जाने वाले परिवार में जन्मे, उन्हें स्कूल में पानी पीने तक की अनुमति नहीं थी। किंतु उन्होंने हार नहीं मानी और विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त की। विदेश में रहते हुए भी वे भारत के दलितों और शोषितों की दशा पर चिंतन करते रहे। भारत लौटने पर उन्होंने आंदोलनों और सत्याग्रहों के माध्यम से हाशिए पर पड़े समाज को अधिकार दिलाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि जातिवाद केवल एक सामाजिक अन्याय नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होगा, जब तक सामाजिक स्वतंत्रता हासिल न की जाए। यही कारण था कि भारतीय संविधान में उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को जोड़ा।

 

मानसिक गुलामी और जातिवाद:

जातिवाद का सबसे बड़ा असर यह रहा कि उसने भारतीय समाज की सोचने की क्षमता को ही सीमित कर दिया। बच्चा जब जन्म लेता है, तब वह जाति नहीं जानता, परंतु बड़ा होते-होते उसे सिखा दिया जाता है—“तुम ऊँचे हो, वह नीच है।” यही शिक्षा पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को अंदर से बीमार करती रही।

अंबेडकर ने कहा था कि यदि आपका धर्म आपको दूसरों से नफ़रत करना सिखाता है, तो वह धर्म नहीं, बल्कि गुलामी है। उन्होंने मानसिक गुलामी को सबसे बड़ा खतरा माना, क्योंकि जब तक इंसान अपने भाई-बंधुओं से जाति के नाम पर अलग रहेगा, तब तक समाज एकजुट होकर प्रगति नहीं कर पाएगा।

 

शिक्षा और संगठन—बदलाव का रास्ता:

          डॉ. अंबेडकर का अंतिम संदेश था—“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की कुंजी था। उनका मानना था कि शिक्षा वह हथियार है, जिससे जातिवाद की जड़ें काटी जा सकती हैं। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों को पहचानता है और अन्याय के खिलाफ खड़ा हो सकता है। संगठन का अर्थ उन्होंने केवल जाति या धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि समानता और न्याय के नाम पर एकजुटता से जोड़ा। संघर्ष का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि न्याय और समानता के लिए अडिग रहना था।

          आज भारत डिजिटल युग की ओर बढ़ रहा है। हम अंतरिक्ष में जा रहे हैं, लेकिन अपने ही समाज में जातिवाद की बेड़ियों से जकड़े हुए हैं। यह स्थिति डॉ. अंबेडकर की चेतावनी को सही साबित करती है। यदि जातिवाद का खात्मा नहीं हुआ, तो भारत केवल नक्शे पर एक देश रहेगा, वास्तविक अर्थों में नहीं।

          परिवर्तन का रास्ता हमारे भीतर से ही शुरू होता है। जब हम अपने बच्चों को यह सिखाएंगे कि दोस्ती जाति से नहीं, इंसानियत से होती है; जब हम नौकरी और सम्मान काबिलियत के आधार पर देंगे; और जब हम अपनी सोच से जातिवादी दीवारें गिरा देंगे—तभी डॉ. अंबेडकर का सपना साकार होगा।

भारत का भविष्य हमारे हाथों में है—या तो हम जातियों में बंटे रहेंगे, या एकजुट होकर प्रगति का भारत बनाएँगे। आज समय है कि हम अंबेडकर की उस गूंजती आवाज़ को सुनें—“इसे खत्म करो या खत्म हो जाओ।”

जातिवाद से तबाह हुआ भारत:

          भारत, जिसे “विश्वगुरु” कहा जाता रहा, जहाँ वेद, उपनिषद, गीता और बुद्ध का संदेश गूँजता रहा—वहीं भारत की आत्मा को एक ऐसे अभिशाप ने जकड़ लिया, जिसने इंसान को इंसान से अलग कर दिया। वह अभिशाप है—जातिवाद। यह वह ज़हर है जिसने समाज की नसों में नफ़रत, भेदभाव और विभाजन का ज़हर घोल दिया। यही कारण है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने चेताया था—“जातिवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है, इसे खत्म करो या फिर यह तुम्हें खत्म कर देगा।”

 

जातिवाद की जड़ें और उसका जहर:

          कल्पना कीजिए, वह बच्चा जो मंदिर के बाहर खड़ा है, क्योंकि उसे अंदर जाने का अधिकार नहीं; वह मजदूर जो पसीना बहाता है परंतु कुएँ से पानी तक नहीं पी सकता; वह छात्र जो किताब लेकर बैठा है पर उसकी बेंच अलग रखी जाती है। यही है जातिवाद का असली चेहरा। हज़ारों साल से जातिवाद ने भारतीय समाज को तोड़ दिया। गाँव-गाँव में कुएँ अलग, बस्तियाँ अलग, यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी श्मशान अलग। यह विभाजन केवल सामाजिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है। जब इंसान को इंसान समझने से पहले उसकी जाति पूछी जाती है, तो यह सभ्यता का सबसे बड़ा पतन है।

          जातिवाद ने न केवल सामाजिक ताने-बाने को खंडित किया, बल्कि भारत की प्रगति को भी रोक दिया। जब आधी से अधिक प्रतिभाओं को शिक्षा और अवसर से वंचित कर दिया गया, तब विकास का पहिया लंगड़ा हो गया। यही कारण है कि अंबेडकर कहते थे—“जिस समाज में प्रतिभा को जाति से आँका जाए, वह कभी प्रगति नहीं कर सकता।”

 

अंबेडकर: एक मशाल:

          भीमराव अंबेडकर का जन्म उस जाति में हुआ, जिसे “अछूत” कहा जाता था। स्कूल में उनके लिए पानी का घड़ा अलग रखा जाता, और कई बार तो शिक्षक भी उन्हें छूने से डरते थे। किंतु यही बच्चा आगे चलकर करोड़ों शोषितों का स्वर बना। अंबेडकर ने अमेरिका और इंग्लैंड की श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की। वहाँ उन्हें जाति का भेदभाव नहीं झेलना पड़ा, लेकिन उनका हृदय भारत के शोषितों के लिए धड़कता रहा। लौटकर उन्होंने न केवल लेखनी से, बल्कि आंदोलन और सत्याग्रहों से भी जातिवाद की जंजीरें तोड़ने का काम किया। महाड़ सत्याग्रह में उन्होंने दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी पीने का अधिकार दिलाया। नासिक मंदिर प्रवेश आंदोलन में उन्होंने उस धार्मिक ढोंग को चुनौती दी, जो इंसान को भगवान तक पहुँचने से रोकता था। वे कहते थे—“अगर आपका धर्म आपको इंसानों से नफ़रत करना सिखाता है, तो वह धर्म नहीं, बल्कि गुलामी है।”

 

संविधान: समानता का शिलालेख:

भारतीय संविधान अंबेडकर की दूरदृष्टि का प्रतिफल है। उसमें लिखा हर अनुच्छेद, हर शब्द सामाजिक न्याय का प्रतीक है। उन्होंने स्पष्ट कहा था—“राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है यदि समाज में असमानता और जातिवाद जीवित है।” इसलिए संविधान में जाति, धर्म, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को अपराध घोषित किया गया। परंतु अंबेडकर यह भी जानते थे कि केवल क़ानून से जातिवाद खत्म नहीं होगा, इसके लिए समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी।

 

मानसिक गुलामी और आज का भारत:

आज हम 21वीं सदी में हैं। भारत डिजिटल हो रहा है, चाँद और मंगल तक पहुँच रहा है। लेकिन दिलों में जातिवाद की बेड़ियाँ अब भी कसी हुई हैं। शादी से पहले जाति पूछी जाती है, मकान किराए पर देने से पहले जाति जानी जाती है, दफ्तरों और कॉलेजों में जातिगत गुटबाजी देखी जाती है। यह वही “मानसिक गुलामी” है, जिसे अंबेडकर सबसे खतरनाक मानते थे। क्योंकि जब तक इंसान जाति की दीवारें नहीं तोड़ेगा, तब तक वह असली स्वतंत्रता का स्वाद नहीं चख पाएगा।

 

अंबेडकर का अंतिम संदेश: शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो:

          अंबेडकर ने कहा था–“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” शिक्षा वह हथियार है जिससे जातिवाद की जड़ें काटी जा सकती हैं। संगठन वह शक्ति है जिससे शोषित अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं। और संघर्ष वह मार्ग है जिससे न्याय और समानता हासिल की जा सकती है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत के पुनर्निर्माण की कुंजी है।

  

फैसला हमारे हाथ में:                                                                                                    
          आज प्रश्न केवल यही है—क्या हम डॉ. अंबेडकर का सपना पूरा कर पाएंगे? क्या हम ऐसा भारत बना पाएंगे जहाँ जाति नहीं, केवल काबिलियत देखी जाए? जहाँ दोस्ती जाति से नहीं, इंसानियत से तय हो? जहाँ हर बच्चा बिना जाति का ठप्पा लिए अपने सपनों की उड़ान भर सके? डॉ. अंबेडकर ने कहा था—“इसे खत्म करो या खत्म हो जाओ।” अब यह चुनाव हमारा है। या तो हम जातिवाद में बँटे रहेंगे, या एकजुट होकर सच्चा भारत बनाएँगे। यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। पर यदि हम एक हो जाएँ, तो वही भारत बनेगा जिसका सपना अंबेडकर ने देखा था—एक ऐसा भारत जहां जाति नहीं, केवल मानवता की पहचान हो।

          भारत की सभ्यता और संस्कृति अपनी प्राचीनता, विविधता और आध्यात्मिक ऊंचाइयों के लिए जानी जाती है। यहाँ एक ओर वेदों की ऋचाएँ गूंजती हैं, तो दूसरी ओर बुद्ध, कबीर और नानक का समरसता का संदेश बहता है। किंतु इस गौरवमयी धरोहर के भीतर एक ऐसी गहरी दरार भी रही, जिसने समाज को खंड-खंड कर दिया—वह है जातिवाद।

          जातिवाद ने केवल इंसानों को विभाजित नहीं किया, बल्कि उनकी आत्मा को भी बांध दिया। इसने सदियों तक लाखों-करोड़ों लोगों को शिक्षा, अवसर, सम्मान और समानता से वंचित रखा। गाँव-गाँव में अलग कुएँ, अलग मंदिर, अलग बस्तियाँ और यहाँ तक कि अलग श्मशान—यानी जीवन से लेकर मृत्यु तक यह विभाजन चलता रहा।

इसी अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था को देखकर डॉ. भीमराव अंबेडकर ने चेतावनी दी थी—“जातिवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसे खत्म करो या यह तुम्हें खत्म कर देगा।” उनकी यह चेतावनी केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं थी, बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिए झकझोरने वाली पुकार थी।

जातिवाद का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव:

          जातिवाद ने भारतीय समाज के ताने-बाने को गहराई तक तोड़ा। यह केवल भेदभाव की दीवार नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी का ऐसा जाल है, जिसमें इंसान इंसान को नीचा दिखाने में गर्व महसूस करता रहा।

गाँवों में अलग-अलग कुएँ, अलग स्कूल और अलग बस्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि जातिवाद ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया। “अछूत” कहे जाने वाले वर्गों को शिक्षा, व्यापार और रोजगार से वंचित रखा गया। इससे न केवल सामाजिक अन्याय फैला, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक प्रगति भी बाधित हुई। जब समाज के 40-50% लोगों को अवसर ही नहीं दिए गए, तो देश की प्रतिभा आधी रह गई। डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक या उद्यमी बनने की योग्यता जाति की दीवारों में कैद हो गई। यही कारण है कि अंबेडकर कहते थे—“जिस समाज में प्रतिभा को जाति से आँका जाए, वह कभी प्रगति नहीं कर सकता।”

 

अंबेडकर का संघर्ष और दृष्टिकोण:

          डॉ. अंबेडकर का जीवन स्वयं इस अन्याय का जीवित उदाहरण था। स्कूल में उन्हें पानी तक छूने की अनुमति नहीं थी। किंतु यही बालक आगे चलकर करोड़ों शोषितों की आवाज़ बना।

अमेरिका और इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटने के बाद उन्होंने केवल लेखनी से ही नहीं, बल्कि आंदोलनों से भी जातिवाद को चुनौती दी। महाड़ सत्याग्रह में उन्होंने दलितों को सार्वजनिक जलस्रोतों का अधिकार दिलाया, और नासिक मंदिर प्रवेश आंदोलन में उन्होंने धार्मिक ढोंग को चुनौती दी।

उनका मानना था कि जातिवाद केवल सामाजिक अन्याय नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है। इसलिए उन्होंने संविधान में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को स्थान दिया।

मानसिक गुलामी और आज का भारत:

आज भारत तकनीकी और अंतरिक्ष शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन जातिवाद अब भी हमारे रिश्तों और सोच में गहराई से मौजूद है। शादी से पहले जाति पूछी जाती है, मकान किराए पर देने से पहले जाति जानी जाती है, स्कूलों और कॉलेजों में गुट जाति के आधार पर बनते हैं। यही “मानसिक गुलामी” अंबेडकर के अनुसार सबसे बड़ी बाधा है। जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक केवल कानून से जातिवाद का अंत संभव नहीं है।

अंबेडकर का अंतिम संदेश”:

डॉ. अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष करते हुए हमें यह तीन सूत्र दिए—“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” शिक्षा वह हथियार है जिससे बेड़ियाँ तोड़ी जा सकती हैं। संगठन वह शक्ति है जिससे शोषित अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं। और संघर्ष वह मार्ग है जिससे अन्याय मिटाया जा सकता है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत के पुनर्निर्माण का मंत्र है। अंबेडकर का अंतिम संदेश

डॉ. अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष करते हुए हमें यह तीन सूत्र दिए—शिक्षित बनोसंगठित रहो और संघर्ष करो।

·        शिक्षा वह हथियार है जिससे बेड़ियाँ तोड़ी जा सकती हैं।

·        संगठन वह शक्ति है जिससे शोषित अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं।
और संघर्ष वह मार्ग है जिससे अन्याय मिटाया जा सकता है।

·        यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत के पुनर्निर्माण का मंत्र है।

          जातिवाद का ज़हर केवल अतीत की समस्या नहीं, बल्कि आज भी जीवित सच्चाई है। यदि भारत को वास्तव में प्रगति और समानता की दिशा में आगे बढ़ना है, तो जातिवाद का उन्मूलन अपरिहार्य है। अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से कानूनी रास्ता दिखाया, किंतु उन्होंने स्पष्ट कहा था कि असली बदलाव समाज के भीतर से आएगा। जब हम अपने बच्चों को सिखाएँगे कि दोस्ती जाति से नहीं, इंसानियत से होती है; जब नौकरी और सम्मान केवल काबिलियत के आधार पर मिलेगा; और जब हमारी सोच जाति की दीवारें तोड़ देगी—तभी भारत सचमुच स्वतंत्र कहलाएगा। आज प्रश्न यही है—क्या हम अंबेडकर के सपनों का भारत बना पाएँगे? एक ऐसा भारत, जहाँ जाति नहीं, केवल मानवता की पहचान हो। यदि हमने इस ज़हर को नहीं मिटाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

          डॉ. अंबेडकर ने संविधान में समानता का अधिकार देकर जातिवाद के कानूनी उपचार की नींव रखी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि केवल क़ानून से बदलाव संभव नहीं है। असली बदलाव तब होगा जब समाज अपने भीतर झाँकेगा, अपनी सोच बदलेगा और हर इंसान को पहले इंसान मानेगा, न कि उसकी जाति को।आज आवश्यकता है कि हम अंबेडकर के अंतिम संदेश को आत्मसात करें— “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।”

          यही मंत्र जातिवाद की जड़ों को काट सकता है। अब निर्णय हमारे हाथों में है—क्या हम आने वाली पीढ़ी को वही ज़हरीली जातिवादी विरासत देंगे, या उन्हें एक ऐसा भारत देंगे जहाँ जाति नहीं, बल्कि मानवता की पहचान हो? यदि हम अंबेडकर के सपनों का भारत बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने घर से, अपनी सोच से और अपने आचरण से शुरुआत करनी होगी। यही उस क्रांति का वास्तविक स्वरूप होगा, जिसकी कल्पना अंबेडकर ने की थी।जातिवाद के खात्मे की लड़ाई कठिन अवश्य है, लेकिन यह वही लड़ाई है जिसे जीतना हमारी नियति है। तभी हम कह पाएँगे कि भारत केवल भौगोलिक रूप से स्वतंत्र नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक रूप से भी स्वतंत्र है।

          जातिवाद का ज़हर केवल अतीत की समस्या नहीं, बल्कि आज भी जीवित सच्चाई है। यदि भारत को वास्तव में प्रगति और समानता की दिशा में आगे बढ़ना है, तो जातिवाद का उन्मूलन अपरिहार्य है। अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से कानूनी रास्ता दिखाया, किंतु उन्होंने स्पष्ट कहा था कि असली बदलाव समाज के भीतर से आएगा। जब हम अपने बच्चों को सिखाएँगे कि दोस्ती जाति से नहीं, इंसानियत से होती है; जब नौकरी और सम्मान केवल काबिलियत के आधार पर मिलेगा; और जब हमारी सोच जाति की दीवारें तोड़ देगी—तभी भारत सचमुच स्वतंत्र कहलाएगा। आज प्रश्न यही है—क्या हम अंबेडकर के सपनों का भारत बना पाएँगे? एक ऐसा भारत, जहाँ जाति नहीं, केवल मानवता की पहचान हो। यदि हमने इस ज़हर को नहीं मिटाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।याद रखिए—फैसला हमारे हाथ में है। या तो हम जातियों में बँटे रहेंगे, या एकजुट होकर सच्चा भारत बनाएँगे।

Ramswaroop Mantri

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