डॉ. विकास मानव
कर्म शब्द कृष धातु से निकला है कृष धातु का अर्थ है करना। इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ कर्मफल भी होता है। मनुष्य का शरीर कर्म से बनता है।
आखिर वह कर्म की फाइल होती कहां है?
कर्म का लेखाजोखा जो मनुष्य या फिर चौरासी लाख योनियाँ बनने के लिए जिम्मेदार है। मनुष्य कर्म करता है, इसका कहीं तो कोई रिकार्ड होगा ही!
मनुष्य बनने के लिए कौन से कर्म चाहिए? पेड़ बनने के लिए कौन से कर्म चाहिए? कुत्ता बनने के लिए कौन से कर्म चाहिए? आखिर ये सिस्टम कैसे काम करता है?
एक मान्यता है कोई चित्रगुप्त रिकार्ड रखते हैं जब जीव वहाँ जाता है तो उसका खाता निकाल लिया जाता है। ये नरक जाएगा, वो वाला स्वर्ग जाएगा।
वास्तव में रिकार्ड तो होता है पर इसे कोई चित्रगुप्त नहीं रखता है। ये कर्मों का लेखा जोखा रखने वाली हार्ड ड्राइव आपके हृदय में ही लगा हुआ है।
ये जीव जहां भी जाता है ये हार्ड ड्राइव उसके साथ ही रहती है। आप जब चित्रगुप्त के यहां जाते हैं तो ये कर्मों का लेखा जोखा रखने वाली हार्ड ड्राइव आप ही के अंदर से निकाल ली जाती है। वास्तव में ये सिस्टम पूरा स्वायत्तशासी (autonomous) है.
आप घर बनाते हैं तो उसमें कील भी लगती है, और हथौड़ी भी। कील सही जगह पर लग जाए तो मजबूती प्रदान करती है, और गलत जगह पर लग जाए तो पीड़ा देती है।
इसी प्रकार से मनुष्य शरीर भी है, बुरा कर्म आधार प्रदान करता है, अच्छा कर्म समृद्ध बनाता है। सभी बुरे कर्म गंगा में धो डालेंगे तो, आधार ही समाप्त हो जाएगा, घर भरभरा के गिर जाएगा। किसी जीव ने बहुत बुरे कर्म किये हैं, अगले जन्म में गधा बनकर जन्म लिया।
लेकिन ये गधा किसी गरीब का घर चला रहा है। ये मर गया तो धोबी की दाल रोटी मर जाएगी।अच्छा या बुरा कर्म या पाप पुण्य ये मनुष्य की सोच से निकला है।
आपके दुख के ठोस कारण हैं।
हमें मनुष्य का कुछ नहीं मालूम है, परमात्मा पर खूब बोलते हैं।परमात्मा के बारे में तो चौराहों पर मंच सजाकर बोलते हैं। ध्यान रखिए ताला तो मनुष्य का खोलना है और चाबी लेकर बैठे हैं परमात्मा की। दुकान भी परमात्मा की ही चलाते हैं। सभी सनातनी चिल्ला रहे है, सभी आत्म सम्मोहित हैं,
“मैं ब्रह्म हूँ”
‘तुम ब्रह्म हो”
“ये ज्ञान ब्रह्म है”
“ये ब्रह्मांड ब्रह्म है।”
मैं तो पहले से ही ये सब कुछ माने बैठा हूँ, बस मुझे तो इतना सा जानना है ये धरती का ब्रह्म इतना दुखी क्यों है ?
थोड़ा होश में आओ, सब कुछ ब्रह्म ही तो है; लेकिन फिर ये ब्रह्म इतना दुखी क्यों है?
थोड़ा अपने ज्ञान और अपने परम ज्ञानियों के महा ज्ञान का भी तो अवलोकन करके देखिए। खोजना खुद हो है, बात कर रहे हैं परमात्मा के खोजने की।
खोलना है मनुष्य के अस्तर पंजर, और परमात्मा का पूरा पोस्ट मॉर्टम करके बैठे है | कान का बिच्छू, गले का सांप, त्रिशूल, पर बड़ी-बड़ी व्याख्याएं करेंगे, बस मनुष्य के बारे में कुछ नहीं मालूम है.
यदि मनुष्य को शांति समृद्धि चाहिए तो मनुष्य को जानना होगा, परमात्मा को नहीं। यदि मनुष्य को मुक्त होना है तो मनुष्य को खुद ही प्रयास करने होंगे। खुद के प्रयास तभी सफल हो सकते हैं जब आप मनुष्य सिस्टम की सही जानकारी रखते हों। मन अशांत है तो इसका मतलब हुआ, अंदर गलत जगह पर गाँठे लग गई हैं।
अब ये गुत्थियाँ सुलझें तभी मन शांत हो सकता है। मन शांत हो इसके लिए जरूरी है शांति से बैठकर समाधान निकाला जाए।
कितना अजीब है ये सब कुछ?
एक छोटे उदाहरण से बात को समझते हैं। आपका टी वी खराब हो गया है, अब इंजीनियर आकर कहे इसके सामने बैठकर “ॐ नमो भगवते” बोलिए।
इससे क्या होने वाला है?
मनुष्य भी एक टी वी जैसा ही है। मंत्र नहीं समाधान चाहिए।समाधान के लिए जरूरी है, मनुष्य को सही तरीके से जाना जाए।
ध्यानयोगतंत्र के सिद्धजनों ने यही सब कुछ किया। जब अर्धनारीश्वर का प्रादुर्भाव हुआ तो मनुष्य की शुरुआत हुई।परमात्मा के साथ प्रकृति मिली और सृष्टि चक्र आरंभ हो गया।पता चल गया मनुष्य कैसे बनता है। योगतंत्र के संन्यासियों ने ऐसी साधना विकसित की और व्यक्ति को अजर अमर भी बनाया।
इसीलिए साधक से कहा जाता अंतर दृष्टि खोलिए। बाहर देखने वाली दो आँखों के अलावा भी एक आँख होती है, जो अदृश्य को भी देख लेती है। इस मनुष्य नाम की बिल्डिंग को गिराना है, किस तरह से हम आधार को गिराएं कि बिना कोई नुकसान हुए आत्मा को मुक्त कर पाएं।
ये एक तरह का अपने ही शरीर पर रेस्क्यू ऑपरेशन है। आत्मा को स्वतंत्र करवाने के लिए। तो संन्यासी आँख बंद करके बैठा है, अंदर की पहले आँख खोलेगा। फिर अंदर से ही भवन को गिराने का काम करेगा। इसी को कहते हैं कर्म शून्य करना।
जब सभी कर्म गिर जाएंगे तो भवन भी अपने आप ही गिर जाएगा। गृहस्थ कर्म का बोझा अपने ऊपर रखकर घूम रहा है, इसलिए दुखी है। गृहस्थ रिश्तों को लेकर भावुक है, उसे ये नहीं समझ में आ रहा है कि ये रिश्ते ही तो बंधन का कारण है।
या फिर बंधन है इसीलिए ये रिश्ते हैं। योगतंत्र के सन्यासी संन्यासी अंदर से कर्मों के जोड़ को खोल देता है। रिश्ते अपने आप ही मर जाएंगे। जब सभी जोड़ अंदर से खुल गए तो आत्मा मुक्त हो गई।
मां धरती से भारी हैं, तो बेटे की छाती पर बैठीं हैं, न मां मुक्त न बेटा मुक्त, दोनों नरक में पड़े हैं। संन्यासी ने संन्यास लेने से पहले अम्मा का पिंडदान कर दिया, अम्मा भी मुक्त बेटा भी मुक्त। अब रही खुद की बात एक-एक करके सभी कल पुर्जे खोल देंगे।
जब कुछ बचा ही नहीं तो हो गया मोक्ष।
‘कृष्ण’ शब्द में कृष शब्द का अर्थ समस्त और ‘न’ का अर्थ मैं आत्मा है. इसीलिये वह सर्वआत्मा परमब्रह्म कृष्ण नाम से कहे जाते हैं। कृष का अर्थ आड़े’ और न का अर्थ आत्मा होने से वे सबके आदि पुरुष हैं।
अर्थात कृष का अर्थ आड़े-तिरछा और न (न:=मैं, हम नाम) का अर्थ आत्मा (आत्म) होने से वे सबके आदि पुरुष हैं कृष्ण हैं. क्रिष्ट क्लिष्ट टेढ़े त्रिभंगी. कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा का यही तत्व-अर्थ है.
कृष धातु का अर्थ है विलेखण.
संसिद्धि: फल संपत्ति:.
अर्थात फल के रूप में परिणत होना ही संसिद्धि है और ‘विलेखनं हलोत्कीरणं.
विलेखन शब्द का अर्थ है हल जोतना। जो तत्पश्चात अन्नोत्पत्ति के कारण. मानव जीवन के सुख-आनंद का कारण. अतः कृष्ण का अर्थ कृष्णन, कर्षण,आकर्षक, आकर्षण व आनंद स्वरूप हुआ।
‘संस्कृति’ शब्द भी ‘कृष्टि’ शब्द से बना है, जिसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘कृष’ धातु से मानी जाती है. इसका अर्थ है- ‘खेती करना’, संवर्धन करना, बोना आदि होता है।
सांकेतिक अथवा लाक्षणिक अर्थ होगा- जीवन की मिट्टी को जोतना और बोना।
‘संस्कृति’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय”कल्चर” शब्द (कृष्टि -कल्ट – कल्चर ) भी वही अर्थ देता है।
कृषि के लिए जिस प्रकार भूमि शोधन और निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है, उसी प्रकार संस्कृति के लिए भी मन के संस्कार–परिष्कार की अपेक्षा होती है।
अत: जो कर्म द्वारा मन के, समाज के परिष्करण का मार्ग प्रशस्त करता है वह कृष्ण है | ‘कृष’ धातु में ‘ण’ प्रत्यय जोड़ कर ‘कृष्ण’ बना है जिसका अर्थ आकर्षक व आनंद स्वरूप कृष्ण है।
गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः।।
कृष्ण = क्र या कृ = करना, कार्य = कर्म.
राधो = आराधना, राधन, रांधना, गूंथना, शोध, नियमितता , साधना….राधा.
ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि. कृष्ण-राधा द्वारा हुई = कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई.
राधा का चरित्र-वर्णन श्रीमद भागवत में स्पष्ट नहीं मिलता. वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है. राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ‘गीत-गोविन्द’ से मिलता है।
व्याकरण की प्रक्रिया के अनुसार राध धातु से राधा और कृष धातु से कृष्ण नाम व्युत्पन्न हुये। राध धातु का अर्थ है संसिद्धि (वैदिक रयि = संसार..धन, समृद्धि एवं धा = धारक)।
सर्व प्रथम ऋग्वेद के मंडल १ में .राधस शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसे वैभव के अर्थ में प्रयोग किया गया है.
ऋग्वेद के २ में .३-४-५ में सुराधा शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकी अपनी संरक्षक शक्ति का उपयोग करके धनों की प्राप्ति व प्राकृतिक साधनों के उचित प्रयोग की प्रार्थना की गयी है।
ऋग्वेद- ५/५२/४०९४ में राधो व आराधना शब्द..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं.
यथा :
“यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे|”
अर्थात यमुना के किनारे गाय. घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है।
पूर्व वैदिक काल में समस्त संसिद्धियों का स्वामी, देवता इंद्र था जिसका तत्पश्चात परवर्ती काल में उपेन्द्र फिर विष्णु एवं कृष्ण के रूप में आविर्भाव हुआ।





