
उपेन्द्र चौधरी
नेपाल की राजनीति लंबे समय से बाहरी प्रभावों पर टिकी रही है। लोकतंत्र का ढांचा विदेशों से लिया गया, संविधान में अधिकार तो दिए गए, लेकिन आम जनता और खासकर आदिवासी समाज की भागीदारी केवल दिखावे तक सीमित रह गई। आज का नेपाल भी उसी संकट से जूझ रहा है,क्योंकि फ़ैसले राजधानी में होते हैं, दूर-दराज़ की जनता केवल दर्शक बनी रहती है। लेकिन इस बार तस्वीर में एक नया बदलाव दिख रहा है। जेंज़ी (Gen Z) यानी नई पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर जागरूक है, सवाल पूछ रही है और बदलाव की आवाज़ बन रही है। यही युवा आंदोलन नेपाल की राजनीति के लिए एक नया मोड़ साबित हो सकता है।

आयातित व्यवस्था और युवा असंतोष
नेपाल में पिछले वर्षों में जो राजनीतिक ढांचा बना, उसमें बाहरी मदद और बड़े नेताओं की नीति अधिक रही। स्थानीय जरूरतों, संस्कृति और विविधताओं को समझे बिना योजनाएं लागू की गईं। इससे युवाओं में असंतोष बढ़ा। शिक्षा और रोजगार की कमी, राजनीतिक भ्रष्टाचार और स्थानीय नेतृत्व की अनुपस्थिति ने उन्हें हताश कर दिया। जब इस हताशा का हल दिखता नहीं मिला,तो सोशल मीडिया पर वे अपनी पीड़ा, असमानता और अधिकारों की मांग को खुलकर सामने ला रहे हैं। कई जगहों पर जेंज़ी युवाओं ने आंदोलन शुरू किए हैं, जहां वे पारदर्शिता, स्थानीय विकास और पर्यावरण संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
प्रतीकात्मक भागीदारी अब स्वीकार नहीं
पहले आदिवासी समाज और युवाओं की भागीदारी कभी एक प्रतिनिधि, कभी एक बयान के ज़रिए सिर्फ़ प्रतीकात्मक बनी रही। लेकिन अब सोशल मीडिया ने सीमाएं तोड़ दी हैं। आज के युवा सवाल पूछते हैं—“हमें सिर्फ़ दिखावे से क्यों छला जा रहा है ? असली निर्णयों में हमारी भूमिका कहां है ?” उन्होंने समझ लिया है कि लोकतंत्र सिर्फ़ वोट देने का नाम नहीं, बल्कि नीति निर्माण में बराबरी की हिस्सेदारी है। जेंज़ी आंदोलन ने यही संदेश दिया है कि यदि आवाज़ नहीं सुनी जाएगी, तो वे सड़कों पर भी उतरेंगे और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर भी। मज़े की रीलें बनाने और पोस्ट करने के इन दोनों ही स्पेस को इन्होंने आंदोलन और असंतोष की अभिव्यक्ति से रिप्लेस कर दिया है।
सोशल मीडिया की ताकत और लोकतांत्रिक जागरूकता
जेंज़ी युवाओं ने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वे भ्रष्टाचार उजागर कर रहे हैं, स्थानीय समस्याओं पर चर्चा कर रहे हैं, और अपने अधिकारों के लिए अभियान चला रहे हैं। कई छोटे-छोटे संगठन और सामुदायिक समूह ऐसे बने हैं, जो शिक्षा, पर्यावरण, महिलाओं के अधिकार और आदिवासी विकास के लिए काम कर रहे हैं। यह राजनीतिक सहभागिता का नया रूप है, जो पारंपरिक दलों को चुनौती दे रहा है।
बाहरी निर्भरता के विरुद्ध जागरूकता
युवाओं ने यह भी समझ लिया है कि विदेशों से मिलने वाली मदद आवश्यक तो है, लेकिन उस पर पूरी निर्भरता नेपाल को कमज़ोर बनाती है। वे आत्मनिर्भरता, स्थानीय संसाधनों के सही उपयोग और पारदर्शी प्रशासन की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि नीतियां नेपाल की ज़रूरतों के आधार पर बनें, न कि बाहरी शक्तियों की शर्तों पर बने।
आदिवासी समाज की भूमिका और जेंज़ी की एकजुटता
आदिवासी समाज की समस्याएं,यानी शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपस्थिति, रोजगार का संकट अब जेंज़ी आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बन रही हैं। युवा आदिवासी नेतृत्व की तलाश कर रहे हैं। कई जगहों पर उन्होंने स्थानीय भाषा में सामग्री तैयार कर समुदाय को जागरूक किया है। जेंज़ी आंदोलन ने परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल बनाने की कोशिश की है, जिससे आदिवासी समाज की असली आवाज़ सामने आ सके।
आगे का रास्ता: बदलाव संभव है
- स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा: युवाओं को पंचायत स्तर तक नेतृत्व में शामिल करना होगा, ताकि वे नीति निर्माण में भाग लें।
- शिक्षा में सुधार: डिजिटल शिक्षा, स्थानीय भाषा में सामग्री और व्यावसायिक प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाए जाएं।
- सोशल मीडिया का ज़िम्मेदार उपयोग: युवाओं को यह सिखाना होगा कि वे जागरूकता अभियान चलाएं, लेकिन गलत सूचनाओं से बचें।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता: स्थानीय उद्यम, कृषि आधारित परियोजनाएं और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देकर विदेशी निर्भरता कम की जा सकती है।
- संवाद की संस्कृति: राजनीतिक दलों और युवाओं के बीच संवाद मंच बनाए जाएं, जहां नीति निर्माण में आम जनता की राय ली जा सके।
अंतत: समझा जा सकता है कि नेपाल की राजनीति आयातित लोकतंत्र और प्रतीकात्मक भागीदारी की समस्याओं से जूझ रही है। लेकिन, अब स्थिति बदल रही है। जेंज़ी युवाओं ने दिखा दिया है कि वे सिर्फ़ मूक दर्शक नहीं रहेंगे, वे अपनी आवाज़, अपने अधिकार और अपने भविष्य के लिए लड़ेंगे। यदि राजनीतिक नेतृत्व उनकी इस ऊर्जा को सही दिशा दे, तो नेपाल एक ऐसा लोकतंत्र बन सकता है, जो न केवल बाहरी ढांचों पर आधारित हो, बल्कि अपने लोगों की पहचान, संस्कृति और आकांक्षाओं के आधार पर खड़ा हो। समय आ गया है कि नेपाल की राजनीति में युवाओं और आदिवासी समाज की भागीदारी को प्रतीक नहीं, बल्कि वास्तविक शक्ति बनाया जाए। तभी नेपाल का लोकतंत्र मजबूत होगा और उसका भविष्य उज्ज्वल हो सकेगा। वर्ना संभव है कि नेपाल की यह चिंगारी उन तमाम देशों की जनता के असंतोष के शोलों को भड़का दे,जहां का लोकतंत्र सिर्फ़ वोट देने तक सीमित रह गयी है।
(उपेन्द्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं




