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*इतिहास के आइने में उर्दू,उर्दू किसी धर्म की भाषा नहीं*

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निशांत आनंद

लगभग 225 वर्ष पहले, कलकत्ता (अब कोलकाता) शहर में, उर्दू और हिंदी भाषाओं के बीच विभाजन के बीज बोए गए थे, जब फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने अलग-अलग भाषा-प्रारंभिक पुस्तकें जारी कीं और फ़ारसी व संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद उर्दू और हिंदी में कराया, जिन्हें मुख्यतः लिपि के आधार पर अलग किया गया। इस विभाजन ने आगे चलकर भाषाई राजनीति को जन्म दिया और अंततः उर्दू को इस्लाम से जोड़कर देखा जाने लगा।

विडंबना यह है कि आज, उर्दू के विकास और संवर्धन से जुड़ी सबसे प्रमुख संस्थाओं में से एक, पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी, भी इसी प्रवृत्ति की शिकार हो गई। अकादमी ने 31 अगस्त से 3 सितंबर तक “हिंदी सिनेमा में उर्दू” नामक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदी सिनेमा में उर्दू की जीवंत और प्रभावशाली भूमिका का उत्सव मनाना और उस पर विमर्श करना था।

हिंदी सिनेमा लंबे समय से उर्दू की सुंदरता, मुहावरे और काव्यात्मक समृद्धि को भाषाई और धार्मिक सीमाओं से परे संरक्षित करने का माध्यम रहा है। लेकिन, दो मुस्लिम धार्मिक संगठनों के दबाव के चलते यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। आपत्ति इस बात पर थी कि कार्यक्रम में प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर को शामिल किया गया था, जिनके इस्लाम से संबंधित विवादास्पद और आक्रामक बयान अक्सर विवादों को जन्म देते रहे हैं।

इन आपत्तियों के आधार पर कार्यक्रम को स्थगित करने का निर्णय कई गंभीर प्रश्न उठाता है। पहला, कुछ साहित्यकारों द्वारा उर्दू के सांस्कृतिक मंचों का उपेक्षापूर्ण इस्तेमाल, जो इसकी सहिष्णु और परिष्कृत साहित्यिक परंपरा को प्रभावित करता है। दूसरा, भाषाई और सांस्कृतिक संस्थाओं में धार्मिक संगठनों का हस्तक्षेप। तीसरा, उर्दू के संरक्षण से जुड़ी संस्था की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता। और अंततः, स्वयं उर्दू का भविष्य।

जब आस्था भाषा पर हावी हो जाए

यह मानना होगा कि धार्मिक संगठन अपने धर्म से संबंधित आपत्तिजनक विचारों पर असंतोष प्रकट करने का अधिकार रखते हैं। लेकिन यह कार्य रचनात्मक संवाद और पारस्परिक सम्मान के साथ होना चाहिए, न कि चुनिंदा तौर पर। लोकतंत्र में संवाद, असहमति और आलोचना ही नागरिक समाज की नींव होते हैं। इसी तरह, जावेद अख्तर जैसे सांस्कृतिक हस्तियों पर भी यह ज़िम्मेदारी होती है कि वे सार्वजनिक और संस्थागत मंचों पर धार्मिक मान्यताओं के साथ संवेदनशीलता और सम्मानपूर्वक व्यवहार करें।

असंवेदनशील या उपेक्षापूर्ण टिप्पणियाँ, चाहे अनजाने में हों, श्रोताओं को आहत करती हैं और रचनात्मक संवाद की भावना को कमज़ोर करती हैं। आज के सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकृत माहौल में, ऐसे बयान केवल व्यक्तियों की आलोचना के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समुदाय को बदनाम करने के लिए हथियार बनाए जाते हैं।

इसलिए, एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है और गंभीर साहित्यिक व सांस्कृतिक विमर्श में आस्थाओं के प्रति उपहास से बचना चाहिए। उर्दू से जुड़ी जगहों के संदर्भ में, ऐसी प्रवृत्ति पहले से ही घटते दायरों को और कमजोर करती है और बौद्धिक विमर्श की प्रभावशीलता को सीमित कर देती है।

जावेद अख्तर और इतिहास का बोझ

हालांकि, किसी धार्मिक संगठन द्वारा विरोध दर्ज कराने के लिए उर्दू अकादमी को मंच बनाना भी गहन समस्या है। इससे भाषा और उसके संरक्षण तथा संवर्धन के लिए बनी संस्थाएं असुरक्षित स्थिति में आ जाती हैं। उर्दू, अरबी के विपरीत, किसी धार्मिक पवित्रता से जुड़ी भाषा नहीं है। 15 वीं-16 वीं शताब्दियों में जब यह भाषा हिंदवी या दकनी जैसे रूपों में मौजूद थी, तब इसे धार्मिक लेखन के लिए अनुपयुक्त माना जाता था। केवल 18वीं-19वीं शताब्दियों में सुधार आंदोलनों के दौरान उर्दू का इस्तेमाल धार्मिक विमर्श में होना शुरू हुआ।

औपनिवेशिक काल में उर्दू को मुस्लिम पहचान का प्रतीक मानकर इस्लाम से और मजबूती से जोड़ा गया। इस धारणा ने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद विविधताओं-सांप्रदायिक, जातीय, वर्गीय और भाषाई- को नज़रअंदाज़ कर दिया। स्वतंत्रता के बाद भी इन ऐतिहासिक विरासतों ने उर्दू की स्थिति को प्रभावित किया।

पाकिस्तान में, जहाँ 10% से भी कम लोग उर्दू को मातृभाषा के रूप में बोलते थे, उसे राष्ट्रीय भाषा घोषित किया गया और पंजाबी अभिजात वर्ग ने इसका उपयोग अन्य भाषाओं- पश्तो, सिंधी, बलोची, सरायकी और बांग्ला—को दबाने में किया। भारत में भी उर्दू की उपेक्षा हुई क्योंकि इसे धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से जोड़ा गया और इसे इस्लाम की भाषा के रूप में रूढ़िबद्ध किया गया। हालांकि अकादमिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में लगातार प्रयास हुए हैं कि उर्दू को सांप्रदायिक कब्जे से मुक्त रखा जाए।

धार्मिक संस्थानों ने निस्संदेह इस भाषा को जीवित रखने में योगदान दिया है, लेकिन उनका हस्तक्षेप यदि धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं में होता है तो यह उर्दू की प्रासंगिकता को केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित कर देगा। इससे उर्दू के धर्मनिरपेक्ष साहित्यिक और सांस्कृतिक आयाम धार्मिक रंगत में दब जाएंगे। साथ ही, यह उर्दू को “इस्लामी भाषा” मानने की रूढ़ि को और मजबूत करेगा, जिससे गैर-मुस्लिम उर्दूभाषी या उसके समर्थक अलग-थलग पड़ सकते हैं।

यह प्रवृत्ति उर्दू की उस क्षमता को भी बाधित करेगी जिसके जरिए यह समुदायों के बीच सेतु का काम कर सकती है, विशेषकर ऐसे समय में जब बहुसांस्कृतिक स्थान तेजी से सिकुड़ रहे हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रवृत्ति सांस्कृतिक और साहित्यिक विमर्श को धार्मिक संरक्षकत्व (theological gatekeeping) के अधीन कर देने का खतरनाक उदाहरण पेश करती है।

इतिहास के आइने में उर्दू

लेकिन यदि हम इससे पहले के मध्यकालीन परिप्रेक्ष्य में देखें, तो उर्दू का उद्भव किसी संकुचित धार्मिक परिपाटी से नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक मेल-मिलाप से हुआ। 13वीं से 16वीं शताब्दी तक जब दिल्ली सल्तनत और बाद में मुग़ल साम्राज्य की छत्रछाया में विभिन्न जातीय और भाषाई समुदाय आपस में घुलमिल रहे थे, तब “हिंदवी” या “रेख्ता” जैसी बोलियाँ पनपीं। इसमें स्थानीय प्राकृत, अपभ्रंश, ब्रज, अवधी और खड़ीबोली का संगम हुआ। फ़ारसी और तुर्की से आए शब्दों ने इसे और समृद्ध किया। यही मिश्रण आगे चलकर “उर्दू” कहलाया।

दक्कनी उर्दू का भी उल्लेख करना आवश्यक है। 15वीं–16वीं शताब्दियों में दक्कन की सल्तनतों में उर्दू का प्रारंभिक रूप “दक्कनी” कहलाया, जिसमें संतों, कवियों और सूफियों ने व्यापक साहित्य रचा। वली दक्कनी को उर्दू का आद्य कवि माना जाता है, जिन्होंने यह दिखाया कि उर्दू केवल राजसत्ता की भाषा नहीं बल्कि साधारण जनमानस की भावनाओं और जीवन की भाषा है।

सूफी और संत परंपराओं ने भी उर्दू को गहराई से धर्मनिरपेक्ष स्वरूप दिया। निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर ख़ुसरो जैसे संतों की रचनाओं ने यह प्रमाणित किया कि भाषा को धर्म की सीमाओं में बाँधना असंभव है। अमीर ख़ुसरो की रचनाओं में फ़ारसी और ब्रजभाषा का अद्भुत संगम मिलता है, जो उर्दू के बहुलतावादी बीज को पोषित करता है।

उर्दू अकादमी की हार और संस्थागत विफलता

पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी द्वारा धार्मिक दबाव में कार्यक्रम को स्थगित करने का निर्णय एक और झटका है। यह अकादमी की विश्वसनीयता और उसके घोषित उद्देश्य—उर्दू भाषा का प्रचार और संरक्षण—को कमजोर करता है। धार्मिक संगठनों के आगे समर्पण संस्थागत ज़िम्मेदारी की विफलता है, जो इन दिनों पश्चिम बंगाल में आम हो गई है।

अकादमी, जिसे राज्य का संरक्षण और पर्याप्त संसाधनों तक पहुँच प्राप्त है, भारत में उर्दू के लिए समर्पित कुछ गिनी-चुनी संस्थाओं में से एक है। उसकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह उर्दू को न केवल राजनीतिक उपेक्षा से बल्कि सांप्रदायिक कब्जे से भी बचाए। ऐसे समय में जब उर्दू अभूतपूर्व राजनीतिकरण का शिकार है और नफरत का निशाना बन रही है, उसकी प्रमुख संस्था का सांप्रदायिक हितों के आगे झुकना अत्यंत चिंताजनक है। यह हर उस आवाज़ को प्रतीकात्मक चोट पहुँचाता है जो उर्दू को भारत की बहुलतावादी और लोकतांत्रिक पहचान के संरक्षण के लिए आवश्यक मानती है।

उर्दू की बहुल परंपरा की रक्षा

इसलिए, भाषा के मामले में धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष-सांस्कृतिक क्षेत्रों को अलग करना अत्यंत आवश्यक है। ऐतिहासिक रूप से, उर्दू किसी धार्मिक पहचान का प्रतीक बनने से पहले धर्मनिरपेक्ष, साझा और मानवीय परंपराओं से गहराई से जुड़ी रही है। इसके धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक आयामों के संतुलन को स्वीकार करना और संरक्षित करना चाहिए, न कि विचारधारात्मक लाभ के लिए इस्तेमाल करना।

उर्दू का दायरा फिर से एक समावेशी, बहुलतावादी क्षेत्र के रूप में स्थापित होना चाहिए, जिसमें तहज़ीब की परंपरा के साथ संवेदनशीलता और सहानुभूति बनी रहे। उर्दू केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर है, जो सभी भारतीयों की है, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। उर्दू संस्थाओं और उर्दू-प्रेमियों को सतर्क और मुखर रहना होगा। सांस्कृतिक कार्यक्रम, साहित्यिक आयोजन और शैक्षिक पहल बिना किसी वैचारिक दबाव के जारी रहने चाहिए।

सबसे अहम बात यह है कि उर्दू को भारत की व्यापक लोकतांत्रिक और बहुलतावादी भावना में पुनः स्थापित किया जाए और इसे सांप्रदायिक अवशेष नहीं बल्कि जीवित, विकसित और समावेशी भाषा के रूप में मनाया जाए।

Ramswaroop Mantri

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