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*नेताओं का अमर्यादित संवाद चिंतनीय और लोकतंत्र के लिए घातक*

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सनत जैन

जिन नेताओं को आम जनता अपना आदर्श मानती है, उनके पीछे चलती है, वहीं जनता अब अपने नेताओं के अमर्यादित बयान और अपशब्दों के प्रयोग पर कटाक्ष कर रहे हैं। अने‎तिक और अमर्या‎दित आचरण पर प्रतिक्रिया जनमानस के बीच में भी देखने को मिलने लगी है। राजनीतिक संवाद और बहस का स्तर लगातार गिरता चला जा रहा है। यह केवल भारत में हो रहा हो, ऐसा नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और एशिया के अन्य लोकतांत्रिक देश में भी मर्यादाएं खत्म होती जा रही हैं। संसद और विधानसभा के अंदर भी जिस तरह से एक दूसरे के खिलाफ हमले किए जा रहे हैं। राजनीतिक बहस का स्तर तू तडाक और हाथापाई ओर मारपीट तक पहुंचने लगा है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के इस युग में नेताओं के बयान और उनकी कही हुई बातें सारे देश एवं दुनिया में वायरल हो जाती हैं। लोकप्रियता पाने के लिए जानबूझकर अमर्यादित आचरण के माध्यम से नेता विवादित मुद्दों को तूल देते हैं। लोगों को भावात्मक या आक्रामक रूप से जोड़ने के लिए इस तरह के बयान सार्वज‎निक रुप से संसद, आम सभाओं, टेलीविजन और सोशल मीडिया के माध्यम से राजनेताओं द्वारा ‎दिए जा रह हैं। उन्होंने इसे सफलता का  मापदंड मान लिया है।

भारत सहित दुनिया के कई देशों में नेताओं द्वारा एक दूसरे के ऊपर व्यक्तिगत आरोप लगाए जा रहे हैं। कई पीढ़ियों को विवाद में घसीटा जा रहा है। झूठ-सच जो भी मन में आता है, वह बोल दिया जाता है। भारत जैसे देश में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों तथा पूर्व के प्रधानमंत्री और नेताओं को लेकर जिस तरह से कपोल कल्पित बातें कहकर वर्तमान में उनको निशाने पर लिया जा रहा है। इससे भारत की प्रतिष्ठा सारी दुनिया के देशों में धूमिल हो रही है जिस महात्मा गांधी को अहिंसा का प्रतीक मानकर सारी दुनिया ने स्वीकार किया गया था।

उन्ही गांधी की छवि को वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व धूमिल करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू जो भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। उनकी सारे विश्व में एक अलग पहचान बनी हुई थी। उन्होंने पंचशील के सिद्धांत और गुटनिरपेक्ष देश के रूप में जो भारत की छवि ‎विदेशों में बनाई थी। स्वतंत्रता के बाद भारत के नव-‎निर्माण ‎मि‎श्रित अर्थ-व्यवस्था का उपयोग करते हुए ‎विकास का रास्ता बनाया। जिस तरह से नेहरू, इंदिरा गांधी या पुराने शासको को वर्तमान में निशाना बनाकर कपोल कल्पित रूप से बदनाम किया जा रहा है।

राजनीतिक विद्वेष के साथ-साथ अब वैचारिक मतभेद भी इस स्थिति पर आकर खड़े हो गए हैं, जिसमें नुकसान ही नुकसान हो रहा है। भावात्मक रूप से समाज के अंदर ही अंदर वेमनस्य बढ़ता चला जा रहा है। धार्मिक ध्रुवीकरण और सत्ता के लिए जिस तरह से एक दूसरे के ऊपर निशाना साधे जा रहे हैं। उससे लोकतांत्रिक व्यवस्था दिन प्रतिदिन कमजोर होती चली जा रही है।

अब राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे हैं, लोकतंत्र के लिए यह सबसे खतरनाक संकेत है। नैतिकता और मर्यादा का राजनीति में अब कोई स्थान नहीं रहा। वर्तमान में लाभ लेने के लिए जिस तरह से एक दूसरे के ऊपर अनै‎तिक और अमर्या‎दित हमले किए जा रहे हैं। उसने भारत स‎हित अन्य लोकतांत्रिक देशों में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से आम जनता का विश्वास घटने लगा है।

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से शासन में बैठे हुए लोगों द्वारा न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं को शासन का अंग बनाने का दबाव बढ़ा है। हाल ही के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और अब फ्रांस में जिस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही हैं, उसने ‎विश्व व्यापी चिंता पैदा कर दी है। फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में भी जिस तरह से राजनेता एक दूसरे के खिलाफ अमर्या‎दित आचरण कर रहे हैं। यह व्यवहार अब दूसरे देशों के शासको के  साथ भी इसी तरह का अमर्यादित हो गया है। जो चिंता का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।

रूस-यूक्रेन, इजरायल-गाजा, भारत-पाकिस्तान लोकतां‎त्रिक व्यवस्था को सुदृण रने के ‎लिये जिस तरह तनाव देखने को ‎मिल हो रहे हैं, उउसे सारी दुनिया ‎चिं‎तित है। जिन देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, वहां की जनता भीड़ के रूप में आती है। नेताओं के साथ मारपीट करने लगती है। राष्ट्रपति भवन संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसे स्थानों पर घुसकर अराजकता मचाती है।

प्रमुख पदों पर बैठे हुए लोगों के घर और जन-धन को हानि पहुंचाने हमला करती है। शासकों और आम जनता के बीच में संवाद खत्म होता जा रहा है। जो संवाद बन भी रहा है, उसमें कोई नैतिकता और संवेदनशीलता नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यदि राजनीतिक संवाद का स्तर, चुनाव की निष्पक्षता एवं न्यायपालिका के ऊपर यदि लोगों को विश्वास नहीं रहेगा, तो भीड़तंत्र, लोकतंत्र पर हावी हो जाएगा। सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। समय रहते तत्काल सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में हिंसा बढ़ना तय है।

वर्तमान ही भविष्य का रास्ता है। पिछले पांच दशक में जो रास्ता लोकतंत्र में बना था। वर्तमान में उस रास्ते से भटक रह हैं। इसराइल और इस्ला‎मिक देशों में राजनीतिक संवाद का स्तर सुधारना होगा। पड़ेगा न्यायपालिका और कार्यपालिका को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। एक बार यदि हमने यह ताकत को दी, तो भीड़ तंत्र अनियंत्रित होकर लोकतां‎त्रिक व्यवस्था को हिंसक समाज में बदल देगा। जो किसी के लिए हितकारी नहीं होगा।

Ramswaroop Mantri

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