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*हिंदी और तेलुगु की आधुनिक कविता में बिंब विधान – डॉ. तक्कोलू माचि रेड्डी*

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हरनाम सिंह

      कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रतीक और बिम्ब के महत्व को कवि, लेखक बेहतर जानते हैं। साहित्य के पाठक उनकी रचनाओं को पढ़ते हैं, सराहते हैं कई बार खारिज भी करते हैं। लेखन में व्याकरण के नियमों का पालन हुआ है अथवा नहीं हुआ है, इसके बारे में विषय विशेषज्ञ ही बता सकते हैं। एक आम पाठक के लिए आधुनिक बिंब विधान विषय गूढ़ और उसके लिए असंबद्ध हो सकता है। मुझे प्रगतिशील लेखक संघ की आंध्र प्रदेश स्थित कडपा इकाई द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक मिली *हिंदी और तेलुगु की आधुनिक कविता में बिंब विधान*  लेखक हैं डॉक्टर तक्कोलू माचि रेड्डी।
        साहित्य में बिंब किसी विचार भावना को इस तरह प्रस्तुत  करता है, जिससे पाठक के मन में सजीव चित्र उभर सके। बिंब केवल इसी परिभाषा में सीमित नहीं है।लेखक के अनुसार भाषा, प्रतीक, वस्तु, रूप, कल्पना, युग चेतना का बिंब के साथ परस्पर संबंध है। कवि की सामाजिक चेतना और जीवन दृष्टि उसकी सौंदर्य भावना को कविता में प्रकट करती है। लेखक ने बिंबो का वर्गीकरण किया है। उसके अनुसार बिंब चार भागों में विभाजित है‌ जीवन बिंब, युग बिंब, भाव बिंब एवं सौंदर्य बिंब।छायावादी कविता और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में बिंबो का अधिक उपयोग हुआ है।
            मार्क्सवादी दर्शन में पदार्थ का चेतना से स्वतंत्र अस्तित्व माना गया है। लेनिन के अनुसार हमारी संवेदना और चेतना का बाह्य विश्व मात्र एक बिंब है। स्पष्ट है कि पदार्थ के बिना बिंब का कोई अस्तित्व नहीं होता। इस दर्शन के अनुसार बिंब अचेतन और अवचेतन का उत्पाद है। मार्क्स और एंगेल्स का एक प्रसिद्ध कथन है कि *जीवन चेतना से नहीं चेतना जीवन से निर्धारित होती है।* सामाजिक चेतना, सामाजिक जीवन या समाज का प्रतिबिम्ब होता है।
         हर्बर्ट रीड की मान्यता है कि विचारों के विकास के समानांतर ही कलाओं का भी विकास हुआ है। इन दोनों का विकास सामाजिक गतिविधियों और संघर्षों से गहरे स्तर पर जुड़ा है। हम यह मान सकते हैं कि विचारधारा का बिंब विधान पर प्रभाव होता है, साथ ही कलाकार की जीवन दृष्टि, उसका व्यक्तित्व भी बिंब को प्रभावित करता है।
            विविध कलाओं में बिंब के माध्यम अलग-अलग होते हैं। संगीत में की धुन, चित्रकला में दृश्य और काव्य में शब्द चित्र की भूमिका रहती है। बिंब की इस गूढ़ व्याख्या के साथ लेखक को कुछ उदाहरण भी देना चाहिए थे,ताकि पाठक आसानी से समझ सके।
           सामंती समाज व्यवस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में अलंकार की बड़ी भूमिका होती थी। बदलते समय ने उसका स्थान बिंब ने ले लिया है। विचारधारा एवं जीवन दृष्टि को पर्याप्त महत्व देने वाली प्रगतिशील कविता का वैचारिक स्त्रोत मार्क्सवाद रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि मार्क्सवाद से प्रभावित कलाकार, साहित्यकार विचारधारा का मर्मज्ञ होना चाहिए। प्रगतिशील कवि आशावादी होता है। उसकी कविता में समाज से संबंधित इच्छा बिंब होते हैं। प्रगतिशील कविता समाजवादी व्यवस्था के लिए लड़ने वाली सामाजिक शक्तियों को प्रोत्साहित करती है, प्रेरित करती है, उसके साथ एक जुटता व्यक्त करती है और जनता को अपने ऐतिहासिक कर्तव्य से अवगत कराती है। हिंदी कविता में नागार्जुन, शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी, दुष्यंत कुमार से लेकर एक लंबी सूची है। पुस्तक का लेखक उन तक नहीं पहुंच पाया है। प्रगतिशील कविता में बिंब विधान के केंद्र में मानव जीवन का यथार्थ है। भाव बिंबो में मुख्यतः दलितों पीड़ितों वंचितों के प्रति सहानुभूति कलात्मक बिंबो के रूप में व्यक्त होती है। 
         विख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल अमानवीकरण को सशक्त बिंब के माध्यम से व्यक्त करते हैं 

कोई है कि देखे

मेरा मनुष्य पत्थर हो गया है

बहार के दिनों में

           जिंदगी के बारे में मुक्तिबोध का जीवन बिंब देखें 

भई सांझ*

कदम्ब वृक्ष पास*

मंदिर- चबूतरे पर बैठकर*

जब कभी देखता हूं, तुझको*

मुझे याद आते हैं-*

भयभीत आंखों के हंस*

घाव भरे कबूतर*

मुझे याद आते हैं मेरे लोग*

उनके सब हृदय रोग*

           लेखक के अनुसार नगर जीवन के वे बिंब प्रगतिशील कविता में मिलते हैं जो सामाजिक दमन, आर्थिक शोषण व्यक्त करते हैं।
           शिवमंगल सिंह सुमन फुटपाथ वासियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहते हैं -

कुछ दमा तपेदिक से बेदम*

कुछ खांस रहे हैं पड़े- पड़े*

संपत्ति फटी मिरजई और*

अधजली बीड़ियों के टुकड़े*

सोई है उनकी आशाएं*

कंकड़ पत्थर पर आज विवश*

           नगर जीवन के खोखलेपन पर मुक्तिबोध कहते हैं -

पाउडर में सफेद अथवा गुलाबी* छिपे बड़े-बड़े चेचक के दाग मुझे दीखते हैं

सभ्यता के चेहरे पर*

तेलुगु कवि श्री श्री का एक भावभीना बिंब

नस-नस के वेदन में*

युग- युग के रोदन में*

दुबली_हो

पतली हो*

गिर पड़ी जिंदगी की दीवारें*

उजड़ गई बस्तियां*

निराला की कविता #भिक्षुक* में भी ऐसे ही बिंब हैं –

भूख से सूखे ओंठ जब जाते*

दाता भाग्य विधाता से क्या पाते ?*

घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते*
लेखक के अनुसार युगीन चेतना को व्यक्त करने वाले बिंब विचारधारा से प्रभावित हैं। मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार #निषेध का निषेध* का सामाजिक स्तर पर अर्थ है। पुराने का ध्वंस और नए का निर्माण। पुरानी व्यवस्था के प्रति प्रगतिशील कवियों ने पौराणिक प्रतीकों का भी उपयोग किया है।

            शमशेर बहादुर सिंह ने अपनी कविता -

वाम- वाम -वाम दिशा
समय साम्यवादी….
में मध्य वर्ग की तुलना श्रमिक वर्ग से करते हैं। वे कहते हैं
मध्य वर्ग का समाज दीन
किंतु उधर
पथ प्रदर्शिका मशाल
कमकर की मुट्ठी में…
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शमशेर की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति कविता अमन का राग में सामने आती है। वे कहते हैं –

मुझे अमेरिका का लिबर्टी- स्टैचू उतना ही प्यारा है
जितना मास्को का लाल तारा
विश्व प्रेम कवि के लिए कोई सपना नहीं मानसिक यथार्थ है।
कवि नीरज कहते हैं –

कोई नहीं पराया, सारी धरती एक बसेरा है
इसकी सीमा पश्चिम में तो मन का पूरब डेरा है
बंगाल जब अकाल ग्रस्त हुआ तो जगह-जगह चंदा इकट्ठा किया जाने लगा। कवि हरिवंश राय बच्चन भावावेश में आकर कहते हैं –

इसलिए वह अपनी वाणी
तुम्हें भेजता हूं चंदे में
संभव है तुमको कुछ बल दे
निकल पड़ो तुम सहसा कह कर अपनी रोटी अपना राज
इंकलाब जिंदाबाद
लेखक माची रेड्डी के अनुसार तेलुगु के मुकाबले हिंदी में प्रगतिशील आंदोलन कम चले हैं। इसलिए हिंदी साहित्य जनता तक नहीं पहुंच पाया है। जबकि तेलंगाना में सामंतवाद से मुक्ति के लिए चले संघर्ष ने प्रगतिशील कविता को प्रोत्साहित किया, उसे एक आवश्यकता के रूप में लिया गया। पुस्तक में लेखक ने मुक्तिबोध के संग्रह चांद का मुंह टेढ़ा से बिंबो के कुछ उदाहरण दिए हैं मसलन
सुगंधित प्रकाश में चमचमाता ईमान
उभरते कांपते वायलिन के स्वर, सहसा गुंजारती झनकार, गहरे स्नेह सी
चांदनी के होंठ काले पड़ गए जमाना सांप का काटा
बरगद के खुरदुरे अजगरी तने पर
माचि रेड्डी के अनुसार मुक्तिबोध के कुछ बिंब बौद्धिक अधिक हैं, कलात्मक स्तर पर कम है। हिंदी और तेलुगू की प्रगतिशील कविता के अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि इनका केंद्रीय बिंब मानव जीवन है। प्रगतिशील कविता के जीवन बिंबो में सामाजिक परिपेक्ष स्पष्ट परिलक्षित होता है।
लेखक का यह शोध प्रबंध वर्ष 1976 तक के साहित्य पर आधारित है। स्वाभाविक है कि बीते लगभग 50 वर्षों में साहित्य में बहुत कुछ बदला है। तेलुगु भाषी लेखक ने हिंदी कविता पर, उसके बिंब पर श्रम साध्य कार्य किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनका यह प्रयास भाषाई अज़नबी पन को कम करेगा।

Ramswaroop Mantri

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