मंजुल भारद्वाज
आध्यात्मिक आयाम में मनुष्य शांति खोजता है। यह धर्म के ठेकेदार उसे हिंसा,नफ़रत और द्वेष से भर देते हैं। आध्यात्मिक आयाम में मनुष्य प्रकृति,मानवता से जुड़ाव चाहता है। धर्म के ठेकेदार उसे पुनर्जन्म के जंजाल में फंसा देते हैं। स्वर्ग नरक के फेर में फंसा देते हैं। मनुष्य उसे समझ नहीं पाता और राजनैतिक कौम उसे समझाना नहीं चाहती ।चंद मुट्ठी भर लोगों की लूट और ऐशगाह के लिए राजनैतिक कौम काम करती है । हां उसे नाम जनकल्याण का देती है लेकिन युगों युगों तक जन को आस्था, धर्म और देव के चक्रव्यूह में पीसने के छोड़ देती है!
1. आस्था :
आस्था वो दलदल है जो प्रकृति,मानवता,विवेक,प्रगतिशीलता और विज्ञान को लील लेती है। आस्था गटर है जो मानवीय मूल्यों के विकास को बहा ले जाती है।
राजनेता आस्था का सत्ताकरण खूब करते हैं। आस्था का हर समय सत्ता के लिए दोहन करते हैं। पर आस्था को चुनौती नहीं देते। रटा रटाया बयान देते हैं। आस्था निजी मामला है। जब इस निजी बक्से में ज़हर घोल दिया जाता है। नफ़रत भर दी जाती है। भ्रम भर दिया जाता है। उन्माद, हिंसा भर दी जाती है तब वो निजी मामला कैसे रह जाता है?
इसी आस्था के वशीभूत राष्ट्रपिता की हत्या हो गई पर राजनेताओं ने आस्था को चुनौती नहीं दी। आस्था सारी संस्कृति को खा गई। आस्था ही जड़ है पाखंडों की, अंधश्रद्धा की। आस्था आपकी शिक्षा को खा गई। विज्ञान को खा गई। आज विडम्बना यह है कि भारत के वैज्ञानिक आस्था के कर्मकांड करके सेटेलाइट छोड़ते हैं।
जिस संविधान ने हमें मौलिक अधिकार दिए ,न्याय व्यवस्था दी यह आस्था उसी न्याय व्यवस्था को लील गई तभी तो साक्ष्य, तर्क, प्रमाण और दस्तावेज के बिना आस्था के वशीभूत पत्थर को न्याय दिया गया। आस्था ने संविधान की नींव हिला दी फ़िर भी राजनेता चुप हैं।
आस्था ही वर्णवाद को स्वीकारती है। मनुस्मृति का मार्ग प्रशस्त करती है। राजनेताओं का दायित्व होता है जनता के अंधकार को दूर करना। भारत की राजनैतिक कौम आस्था में अंधी है इसलिए भारत की अधोगति हो रही है!
2. धर्म :
राजनैतिक कौम धर्म का सत्ताकरण करने में सिद्धहस्त है। वो धर्म को पालती पोसती है। धर्म का महिमा मंडन करती है। असल में धर्म हिंसा की जड़ है। यह धर्म श्रेष्ठता का विकार है। धर्म हमेशा खतरे में रहता है। कोई यह सवाल नहीं करता अरे जो हमेशा खतरे में होता है वो धर्म कैसा! धर्म के नाम पर युद्ध होता है। नर संहार होता है। कालांतर में नरसंहार करने वाले को अवतार बना कर पूजा जाता है। पर ना धर्म की स्थापना होती है ना इंसानियत बचती है। हां सत्ता ज़रूर प्राप्त हो जाती है।
इतिहास में दर्ज़ है धर्म के नाम हुई कत्ल ओ ग़ारत फ़िर भी राजनैतिक कौम उससे निजात नहीं पाती। साम्यवादी शासक ने भी धर्म को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई। धर्म की समानांतर सत्ता चलती है। अनेक धार्मिक स्थलों की कमाई कई जगह के सरकारी बजट से ज्यादा है। भारत में भी न्याय व्यवस्था ने एक महिला के जीवन निर्वाह के सवाल पर निर्णय दिया तो संसद ने उसे धर्म में दखलंदाजी मान कर निर्णय को पलट दिया। नतीजा आपके सामने है अब संविधान ही समाप्ति की ओर है।
3. आध्यात्मिक ज़रूरतों को अनदेखा करना :
राजनैतिक कौम धर्म और आस्था के हवाले जनता की आध्यात्मिक ज़रूरतों को छोड़ देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य,जीवन यापन के मुद्दों को अपने एजेंडे में रखती है पर आध्यात्मिक मसले से मुंह मोड़ लेती है।
दरअसल राजनैतिक कौम मनुष्य की संपूर्ण ज़रूरतों से अनभिज्ञ है। एक मनुष्य के चार आयाम होते हैं शारीरिक, भावनात्मक, वैचारिक और आध्यात्मिक। पहले तीन आयामों पर सत्ता कुछ कार्यक्रम बनाती है पर आध्यात्मिक आयाम का ठेका धर्म के ठेकेदार को दे देती है। और धर्म के ठेकेदार देव, धर्म और आस्था के नाम पर जनता का खून चूसते हैं। संविधान की जड़ खोदते हैं।
आध्यात्मिक आयाम में मनुष्य शांति खोजता है। यह धर्म के ठेकेदार उसे हिंसा,नफ़रत और द्वेष से भर देते हैं। आध्यात्मिक आयाम में मनुष्य प्रकृति,मानवता से जुड़ाव चाहता है। धर्म के ठेकेदार उसे पुनर्जन्म के जंजाल में फंसा देते हैं। स्वर्ग नरक के फेर में फंसा देते हैं। मनुष्य उसे समझ नहीं पाता और राजनैतिक कौम उसे समझाना नहीं चाहती ।चंद मुट्ठी भर लोगों की लूट और ऐशगाह के लिए राजनैतिक कौम काम करती है । हां उसे नाम जनकल्याण का देती है लेकिन युगों युगों तक जन को आस्था, धर्म और देव के चक्रव्यूह में पीसने के छोड़ देती है!





