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*भगत सिंह बनाम सरकार; सत्ता चाहती है न पूछो न जानो और भगत सिंह कहते हैं निरा या कोरा विश्वास नहीं अध्ययन और मनन करो* 

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(भाष्कर गुहा नियोगी

बात तीन साल पहले की है। भगत सिंह के शहादत दिवस यानी 23 मार्च पर उनकी और उनके साथियों की शहादत को सलाम करने के लिए अस्सी घाट पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहता था। देश में अमृत महोत्सव की धूम थी। लगा 23 साल की उम्र में इंकलाब- जिंदाबाद का नारा बुलंद कर अंग्रेजी हुकूमत को औकात बताने वाले युवाओं के आईकॉन भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत को शानदार ढंग से सलाम कहेंगे क्योंकि शहीदों के लिए हम सभी का इतना करना तो बनता है। लेकिन पुलिस- प्रशासन को घोर आपत्ति थी।   

प्रशासन से इजाजत के लिए आवेदन किया। आवेदन पत्र पुलिस विभाग में दौड़ता रहा साथ में हम। लेकिन अंत तक पुलिस प्रशासन ने इजाजत नहीं दी। कार्यक्रम न करने के सैकड़ों अजूहात हमें गिनाए गए। कहा गया आपको नई परम्परा शुरू करने की इजाजत नहीं है। अमृत महोत्सव की बेला में शहीदों की शहादत को सलाम करना नई परम्परा भला कैसे हो सकती है? सोचा तो पाया कि भगत सिंह बनाम सरकार मुकदमा तो आज भी जारी है। जारी है सत्ता का मनमानापन।

सत्ता चाहती है न पूछो न जानो और भगत सिंह कहते हैं निरा या कोरा विश्वास नहीं अध्ययन और मनन करो। इसलिए विचार वाले भगत सिंह से खतरा बड़ा है।  क्योंकि सत्ता लार्ड रीडिंग या लार्ड इरविन के स्थान पर ठाकुर दास या तेज बहादुर  जैसों के साथ आना एक ही बात है। भगत सिंह का कहा याद आया हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक शोषण पर टिकी व्यवस्था का अंत नहीं हो जाता। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि हमें लूटने वाले गोरे अंग्रेज हैं या विशुद्ध भारतीय।

भगत सिंह अन्याय और असत्य के सामने कभी नहीं झुके और फांसी के फंदे तक इंकलाब जिंदाबाद कहते गए। बचपन में जालियांवाला बाग की मिट्टी उठाकर सिर से लगाने से लेकर जेल में राजनैतिक बंदियों के अधिकारों के लिए अनशन करने वाले भगत सिंह मानते थे जिंदगी में सबसे पवित्र कर्म है दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना। 

एक ऐसे समाज के निर्माण में खुद को लगाना जो समता-समानता पर आधारित हो। जेल में लिखे भगत सिंह के डायरी के पन्ने क्रान्ति का खाका हैं, एक युगदृष्टा का शोषण विहीन भारत बनाने का दस्तावेज है। भगत सिंह को अपना बड़ा भाई साथी या हमसफर इनमें से जो चाहे मान ले उनका आह्वान है, कि चले चलो कि वो मंजिल अभी आयी नहीं। एक बार आप उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जगह दे तो सही देखिएगा। आप के सपनों की दहलीज पर वो दस्तक देकर आपको कहते हुए मिलेंगे …यार जिंदगी तो अपने दम पर जी जाती है, दूसरों के कंधे पर तो सिर्फ जनाजा उठता है। या फिर अपनी मुश्किलों की घड़ियों में उन्हें याद कीजिए वो हंसते हुए कहेंगे दुःख, तकलीफ तो जिंदगी का हिस्सा है, हमें चुनौतियों से भागना नहीं उनका मुकाबला करना चाहिए। अंधी श्रद्धा या फिर दिन विशेष पर चंद नारे उछाल कर उन तक नहीं पहुंचा जा सकता।

उनके क्रांति का मनोविज्ञान युवा मन को बखूबी समझता है। एक जगह वो लिखते हैं… समाज पर घुन की तरह जीने वाले लोग अपनी सनक पूरी करने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं। यह भयंकर विषमताएं और विकास के अवसरों की कृत्रिम समानताएं समाज को अराजकता की ओर ले जा रही हैं।… वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक ज्वालामुखी के मुख पर बैठी हुई आनन्द मना रही है…. सभ्यता का यह महल यदि वक्त रहते संभाला न गया तो शीघ्र ही चरमरा कर बैठ जायेगा।

देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात को महसूस कर रहे हैं उनका कर्तव्य है कि समाजवादी सि़द्धान्तों पर समाज का पुनर्निमाण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य और राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है। क्या शोषण का चेहरा आज भी मौजूद नहीं है?

मजहब, जाति, भाषा, अपने-पराये के नाम पर बंट कर लड़ रहे समाज को भगत सिंह एक बात और सिखा जाते हैं। जेल में कारावास भोग रहे सोहन सिंह भाकना ने भगत सिंह से जब पूछा क्या बात है भगत तुम्हारा कोई रिश्तेदार तुमसे मिलने नहीं आता तो भगत सिंह ने कहा था, बाबा जी असली रिश्ता तो खून का होता है। मेरे रिश्तेदार तो वो हैं जिनके जैसा खून मेरी रगों में बहता है। शहीद खुदीराम बोस, करतार सिंह सराभा मेरे रिश्तेदार थे। दूसरा रिश्ता आप जैसे लोगों के साथ है, जिनसे मैंने क्रांतिपथ पर चलने की प्रेरणा ली। और तीसरे रिश्तेदार वो होंगे जो अभी जन्म लेंगे…. क्रांतिपथ को अपने खून से सींचकर अपने लक्ष्य तक पहुंचाएंगे इसके अलावा और कोई रिश्तेदार हमारा हो नहीं सकता।

भगत सिंह का तीसरे रिश्तेदार वो है, जो शोषण विहीन समाज का सपना देखते हैं। जिन्हें अन्याय पल भर के लिए बर्दाश्त नहीं। अपने समय को जीते हुए हम किसी बड़े परिर्वतन की जरूरत शिद्दत से महसूस तो कर रहे हैं, शोर और नारों की क्षणिक उत्तेजना के बीच भगत सिंह तक नहीं पहुंचा जा सकता। अवसरवाद और मतलब परस्त राजनीति के उलट-फेर में फंसे हम लोगों के लिए भगत सिंह के विचार रोड मैप की तरह हैं। इंकलाब से परिर्वतन तक पहुंचने के लिए पहले भगत सिंह को समझना होगा, सीखना होगा।

भगत सिंह बनाम सरकार मुकदमा जारी है तो हमें भी भगत सिंह के विचारों और उनकी विरासत को खुद में जिंदा रखने की हर संभव कोशिश करनी ही होगी। 

 

Ramswaroop Mantri

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